बांग्लादेश शक्तिपीठ: बांग्लादेश आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह केवल राजनीतिक या प्रशासनिक संकट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों पर हमला है।
चरमपंथ की आग में झुलसते इस देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ चुकी हैं और उसके साथ ही सदियों पुरानी परंपराएं भी बिखरती नजर आ रही हैं।
जो भूमि कभी अखंड भारत का हिस्सा थी और जहां बंगाली संस्कृति व सनातन परंपरा फली-फूली, आज वहीं हिंदू धार्मिक स्थलों का अस्तित्व सवालों के घेरे में है।
विशेष रूप से बांग्लादेश में स्थित 7 प्रमुख शक्तिपीठ, जो देवी सती के अंगों से जुड़े माने जाते हैं, आज असुरक्षा, अतिक्रमण और हिंसा का सामना कर रहे हैं।
जेसोरेश्वरी शक्तिपीठ, आस्था का केंद्र, हिंसा का शिकार
बांग्लादेश शक्तिपीठ: जेसोरेश्वरी शक्तिपीठ, जिसे ज्येष्ठोरेश्वरी या ज्येष्ठा काली मंदिर भी कहा जाता है, बांग्लादेश के सबसे प्राचीन हिंदू मंदिरों में गिना जाता है।
यह सतखिरा जिले के श्यामनगर उपजिले के ईश्वरपुर गांव में स्थित है और 51 शक्तिपीठों में शामिल है।
मान्यता है कि यहां देवी सती की हथेलियां गिरी थीं, इसलिए यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है।
इस मंदिर का महत्व आधुनिक राजनीति में भी देखा गया, जब 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां दर्शन कर देवी को सोने का मुकुट अर्पित किया।
हालांकि, 2024 में बांग्लादेश में हुई हिंदू-विरोधी हिंसा के दौरान यह मुकुट चोरी हो गया था।

सुगंधा शक्तिपीठ, पवित्र नदी के तट पर संघर्ष की कहानी
बांग्लादेश शक्तिपीठ: सुगंधा शक्तिपीठ बांग्लादेश के शिकारपुर क्षेत्र में सुगंधा नदी के तट पर स्थित है।
यह देवी सुनंदा या उग्रतारा को समर्पित मंदिर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां देवी सती की नाक गिरी थी और इसके भैरव त्रियंबक माने जाते हैं।

1971 के बाद से इस शक्तिपीठ को कई बार लूट और तोड़फोड़ का सामना करना पड़ा। बाद में मूर्तियों की पुनः स्थापना तो हुई, लेकिन अतिक्रमण और स्थानीय विवाद इस स्थल की सबसे बड़ी समस्या बने रहे।
पद्मा ब्रिज बनने से यहां पहुंच आसान हुई, मगर सुरक्षा और संरक्षण की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है।

चट्टल मां भवानी शक्तिपीठ, पहाड़ की चोटी पर स्थित आस्था
बांग्लादेश शक्तिपीठ: चट्टल मां भवानी शक्तिपीठ बांग्लादेश के चटगांव जिले में, सीताकुंड स्टेशन के पास चंद्रनाथ पर्वत की चोटी पर स्थित है। मान्यता है कि यहां देवी सती की ठुड्डी गिरी थी और इसी कारण यहां माता की पूजा ‘भवानी’ के रूप में की जाती है।
यह शक्तिपीठ कठिन भौगोलिक स्थिति के बावजूद श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। भैरव चंद्रशेखर का मंदिर भी इसी पर्वत शिखर पर स्थित है, जो इस स्थल की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाता है।

जयंती शक्तिपीठ, दो देशों में बंटी आस्था
बांग्लादेश शक्तिपीठ: जयंती शक्तिपीठ सिलहट जिले के कनाईघाट उपजिले के बौरबाग गांव में स्थित है। मान्यता है कि यहां देवी सती की बाईं जांघ गिरी थी। इस शक्तिपीठ का एक वैकल्पिक स्थल भारत के मेघालय में नर्तियांग दुर्गा मंदिर को भी माना जाता है।
करीब 5.90 एकड़ में फैला यह मंदिर शांत वातावरण में स्थित है और आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है, हालांकि बदलते हालात में इसकी सुरक्षा पर सवाल उठते रहे हैं।


महालक्ष्मी शक्तिपीठ, समृद्धि की देवी, असुरक्षा का साया
बांग्लादेश शक्तिपीठ: महालक्ष्मी शक्तिपीठ सिलहट जिले के जोइनपुर गांव में दक्षिण सुरमा क्षेत्र के पास स्थित है।
इसे श्रीशैल महालक्ष्मी शक्तिपीठ भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां देवी सती की गर्दन गिरी थी और यहां देवी महालक्ष्मी के साथ भैरव संभरानंद की पूजा होती है।
‘शक्ति पीठ स्तोत्र’ में भी इस स्थल का उल्लेख मिलता है। आज स्थानीय पाटरा समुदाय इस मंदिर को बचाने और इसकी परंपराओं को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है।


स्रवानी शक्तिपीठ: गुप्त पीठ की गूढ़ परंपरा
बांग्लादेश शक्तिपीठ: स्रवानी शक्तिपीठ, जिसे कुमारी कुंड शक्तिपीठ भी कहा जाता है, चटगांव जिले के कुमीरा रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। मान्यता है कि यहां देवी सती की रीढ़ की हड्डी गिरी थी। इसे गुप्त शक्तिपीठों में शामिल किया जाता है।
यहां देवी को सर्वाणी या श्रावणी के रूप में पूजा जाता है और भैरव निमिषवैभव माने जाते हैं।
इस स्थल का संबंध तंत्र परंपराओं से भी जोड़ा जाता है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

अपर्णा शक्तिपीठ, तीन नदियों के संगम पर स्थित देवीधाम
बांग्लादेश शक्तिपीठ: अपर्णा शक्तिपीठ बांग्लादेश के शेरपुर जिले के भवानीपुर गांव में करतोया नदी के तट पर स्थित है। यहां देवी अपर्णा, जिन्हें भवानी भी कहा जाता है, की पूजा होती है और इनके भैरव वामन माने जाते हैं।
यह स्थल करतोया, यमुनेश्वरी और बूढ़ी तीस्ता, तीन नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण ‘त्रिस्रोता’ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहां देवी सती का बायां पैर या पैर का आभूषण गिरा था।


बांग्लादेश में स्थित ये सातों शक्तिपीठ केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि सनातन संस्कृति, इतिहास और पहचान के प्रतीक हैं।
लेकिन लगातार बढ़ती हिंसा, अराजकता और उपेक्षा के चलते इनकी सुरक्षा और भविष्य दोनों खतरे में हैं।
यह संकट केवल बांग्लादेशी हिंदुओं का नहीं, बल्कि समूची सनातन विरासत का है, जिसे बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है।

