Friday, July 3, 2026

अयोध्या महन्त परिवार के सदस्य ने बताया चम्पत राय द्वारा तुरन्त FIR न करवाने का सच

अयोध्या

नाना पक्ष और दादा पक्ष की तरफ से हमारा परिवार भारत के तीन प्रतिष्ठित मंदिरों के गर्भ गृहों से जुडा हुआ है

बडे मंदिरों की चढावा व्यवस्था और उस चढ़ावे के प्रति भाव को बहुत करीब से देखा है

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बडे मंदिरों के पूजा खर्च और चढ़ावे का पूरा ब्योरा लिखा पढत में नहीं होता
मंदिरों में जो उस व्यवस्था को सम्भाल रहे होते हैं उनके उस धन के प्रति भाव का ही महत्व है बस

सारी घटनाओं का एक ही पोस्ट में जिक्र करना तो मुश्किल है पर एक घटना के द्वारा बताता हूँ कि चम्पतराय जी के साथ क्या हुआ होगा

जब ताऊ जी अयोध्या की एक महत्वपूर्ण गद्दी के मुख्य पुजारी का जिम्मा संभालते थे तो मैं अक्सर गर्मियों की छुट्टी में उनके पास चला जाता था, ताऊ जी मुख्य पुजारी थे और उनके शिष्यों में उनके ज्ञान की प्रतिष्ठा बहुत थी तो उनके शिष्य जो भी धन भेंट देते थे वो उनके ही कमरे पर रहती थी क्यों कि मंदिर के गर्भ गृह में इतनी जगह नहीं होती कि सब कुछ वहाँ रखा जा सके

ताऊ जी बहुत ही साधारण जीवन जीते थे
एक कमरा जो दो हिस्सों में बँटा था जिसके एक हिस्से में रसोई थी और एक हिस्से में उनके सोने की व्यवस्था थी
ताऊ जी मंदिर के विशाल प्रांगड़ की जिस एक इमारत में रहते थे उसके सभी कमरों पर ताला ही रहता था जो अक्सर तभी खुलते थे जब हमारे परिवार का कोई सद्स्य अयोध्या जी पहुँचता था या फिर कोई शिष्य परिवार सहित मंदिर में आता था , अन्यथा की स्थिति में ताऊ जी उन कमरों का प्रयोग खुद के लिए नहीं करते थे

उनके कमरे में न तो कोई फ्रिज था , न कुलर , न एसी , न बिजली की जगमगाहट और न कोई अन्य लक्जरी सुविधा साधन , साधारण एक पंखा था बस और एक तख्त और पुस्तकें और कोई उनसे मिलने आ जाये तो उसके बैठने के लिए कुर्सियां

धन की कोई कमी नहीं थी
तिजोरी तो थी नहीं तो शिष्यों का दिया चढावा ताऊ जी के तकियों या गद्दों के नीचे बिछा रहता था , जब वो अधिक हो जाता तो ताऊ जी या तो बैंक में जमा करवा देते या फिर उसे मंदिर की इमारतों के रख रखाव में खर्च कर देते या फिर उनके पास मदद के लिए कोई मंदिर परिसर से आ जाता तो उसको दे देते थे, कोई हिसाब किताब किसी की मदद का वो नहीं रखते थे

मैने एक दिन ताऊ जी से बोला कि ताऊ जी टीवी तो लगा लो एक, फ्रिज रख लो ( बच्चा ही था मै उस समय ) तो ताऊ जी ने मुझे डपटते हुए कहा कि यहाँ राम जी को याद करने आते हो या टीवी देखने, फ्रिज की क्या जरुरत है , कुए से पानी लाओ ठण्डा ( मंदिर परिसर में ही कुआ था)

शिष्यों ने बहुत जिद की तब ताऊ जी ने एक फोन ( नोकिया का कीपेड मोबाईल ) अपने पास रखना स्वीकार किया और वो भी इस शर्त पर कि अनावश्यक और पूजा पाठ के समय कोई फोन नहीं करेगा,

एक दिन मैं भोजन के बाद ताऊ जी के पैर दबा रहा था
तो एक सज्जन ताऊ जी के पास आये , चर्चा में हिचकते हुए उन्होने बेटी के विवाह के लिए धन की आवश्यक्ता बताई, ताऊ जी ने सिर्फ इतना पुछा कि कितना चाहिये उन्होने अपनी आवश्यक्ता बताई , ताऊ जी ने उनसे तकिया उठाने को बोला ,
कहा उठाओ और गिनो
फिर दूसरा तकिया उठाने को बोला और कहा उठाओ और गिनो, फिर गद्दा उठाने को बोला
जब आवश्यक धन हो गया तो
धन वापस करने की कह कर वो सज्जन चले गये ( अच्छी खासी धन राशि थी वो , और यह घटना करीब 25 बरस पुरानी है तब उस धनराशि का मह्त्व क्या रहा होगा आप खुद समझ लो )

मैने ताऊ जी को पुछा

ताऊ जी ये कौन थे ??
तो उनके हाव भाव से समझ आया कि कोई खास परिचित नहीं थे

फिर मैने पुछा कि आपने कितना दिया वो भी उसी से गिनवाया आपने तो गिना ही नहीं ?? अगर उसने झूठ बोला हो तब

तो ताऊ जी बोले
” राम जी का धन है, उसको क्या गिनना
वो ज्यादा ले गया तो हमारे किसी काम का नहीं और वो कम ले जाता तो भी वो हमारे किसी काम का नहीं “

मैने फिर पुछा

“ताऊ जी वो वापस करेगा, कोई लिखा पढत तो आपने की नहीं , वापस नहीं किया उसने तो “

ताऊ जी बोले
राम जी का नमक था
राम के नमक में जो नमक हरामी करेगा उसका हिसाब राम जी करेंगे, हम कौन होते हैं उसके धन का हिसाब लेने वाले, राम जी ने ही धन भेजा था और राम जी ने ही इसे भेजा तो बस हो गया हिसाब किताब

मैं अयोध्या जी खूब रहा
ताऊ जी को उस धन को खुद के ऊपर खर्च करते कभी नहीं देखा
मंदिर परिसर में कोई गड़बड़ हो भी जाती थी तो ताऊ जी की पूरी कोशिश रहती थी कि मामले में पुलिस का हस्तक्षेप न हो

वो एक ही बात कहते थे
राम जी को मानो तो पूरा मानो
अगर राम जी को मान रहे हो तो यह भी फिर मानो कि चोरी भी राम जी ने ही करवाई और फिर चोर को पुलिस के हवाले नहीं बल्कि राम जी के ही हवाले कर दो, राम जी खुद हिसाब करेंगे

एक बार मेरी खूब लम्बी बहश हुई ताऊ जी से
कि जब सारे काम राम जी करवाते हैं तो फिर तो ये चोरी डकैती भी आपके राम जी ही करवाते होंगे

तो उन्होने कहा कि हाँ बिल्कुल वही करवाते हैं,
तो मैने फिर कहा तो फिर अगर चोरी डकैती भी वही करवाते हैं तो फिर उन्हे पकड़ने और दण्डित करने की जिम्मेदारी भी तो फिर उनकी ही हुई ना

तो ताऊ जी बोले
हाँ उनकी हुई
पर उनकी तब होगी न जब तुम FIR राम जी के दरवार में लगाओगे , तुम तो पहुँच जाते हो थाने , पुलिस के पास
तो फिर अब राम जी क्यों इन्वोल्व हों

उन्होने आगे कहा कि जब तुम प्रधानमंत्री को पत्र लिखोगे तब न प्रधानमंत्री के कार्यालय से जबाब आयेगा , जब तुम दरोगा को पत्र लिखोगे तो दरोगा के कार्यालय से जबाब आयेगा

उनकी बात आज तक याद है
जो उन्होने कही थी
कि राम के नमक में जो नमक हरामी करेगा उसका हिसाब राम जी ही करेंगे

खैर ताऊ जी फिर बैकुंठ चले गये
और मेरा अयोध्या जी जाना भी फिर बन्द हो गया
परन्तु उनकी बातें याद हैं

उनको मधुमेय हो गया था जीवन के आखिरी दौर में
उनके घाव जब नहीं भरते थे
तो मैने एक दिन उनसे पुछा कि इसका ईलाज ढंग से क्यों नहीं करवाते, ये घाव रिसते रहते हैं
तो वो बोले ” हो गयी होगी भूल से कोई नमक हरामी राम जी के नमक से तो बस वही नमक निकल रहा है, जितना निकल जाये उतना अच्छा “

जब आज चम्पत राय जी की घटना सुनता हूँ
कि उन्होने चोरी की शिकायत क्यों नहीं की ??
क्यों वो छुपाते रहे?? , क्यों वो चोरों को पुलिस में देना नहीं चाहते थे , तब मुझे ताऊ जी की बातें याद आती हैं

जैसे ताऊ जी राम जी के न्याय पर भरोसा रखते थे हो सकता है कि चम्पतराय जी भी उसी पथ के राही हों

― डॉ. कौशलेन्द्र दूबे

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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