चंपत राय
जब चंपत राय ने फाड़ दिया था एक लाख रुपये का चेक
यह रामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के जीवन से जुड़ा पुराना प्रसंग है। अयोध्या की भूमि ही पर हुआ यह छोटा सा दृश्य, उनके व्यक्तित्व की उस सादगी को सामने रखता है, जो केवल कही नहीं जाती, जी जाती है।
अयोध्या का सम्मान समारोह और अचानक बदलता माहौल
अयोध्या में वैश्य फेडरेशन की ओर से सम्मान समारोह आयोजित हुआ था। मंच सजा हुआ था, समाज के प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे और वातावरण आदर से भरा था। इसी कार्यक्रम में चंपत राय को सम्मान स्वरूप एक लाख रुपये का चेक भेंट किया गया।

सामान्य रूप से ऐसे अवसरों पर लोग सम्मान राशि ग्रहण करते हैं, धन्यवाद देते हैं और बात समाप्त हो जाती है। लेकिन यहां मामला अलग था। जैसे ही चेक चंपत राय के हाथ में आया, उन्होंने उसे देखा और वहीं पूरी स्थिति बदल गई।
एक वाक्य ने पूरे सभागार को चौंका दिया
चंपत राय ने बिना किसी दिखावे और बिना किसी औपचारिक भाषण के सीधे कहा कि उन्होंने आज तक अपना बैंक खाता ही नहीं खुलवाया।
फिर इस चेक का वे करेंगे क्या। यह सुनते ही वहां मौजूद लोग कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए। यह जवाब केवल चेक न लेने का उत्तर नहीं था।
यह उस आदमी का उत्तर था, जिसने जीवन में सेवा को अपना केंद्र बनाया और निजी संचय को कभी प्राथमिकता नहीं दी। मंच पर बैठे लोगों को लगा कि आग्रह से वो मान जाएंगे।
अशोक अग्रवाल और श्याम जाजू ने किया आग्रह
वैश्य फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल ने उनसे चेक स्वीकार करने का आग्रह किया।
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम जाजू ने भी विनम्रता से कहा कि यह समाज की ओर से सम्मान है। नृपेंद्र मिश्र के पुत्र साकेत मिश्र भी वहां उपस्थित थे।
मंच पर बैठे लोगों की इच्छा थी कि चंपत राय जी यह सम्मान राशि स्वीकार कर लें। बार बार आग्रह हुआ।
समझाया गया कि यह व्यक्तिगत लाभ नहीं, समाज की श्रद्धा है। लेकिन चंपत राय जी अपनी बात पर अडिग रहे और पीछे हटने को तैयार नहीं हुए।
फिर वही हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी
जब समझाने के सारे प्रयास असफल हो गए, तब चंपत राय जी ने वह कदम उठा लिया, जिसे देखकर लोग भीतर तक हिल गए।
उन्होंने चेक स्वीकार करने के बजाय उसे फाड़ दिया और साफ शब्दों में कह दिया कि यह उन्हें मंजूर नहीं है।
उस क्षण मंच पर कोई लंबा प्रवचन नहीं था, कोई नारा नहीं था, कोई अभिनय नहीं था। केवल एक व्यक्ति था, जिसके लिए सेवा सम्मान से बड़ी थी और त्याग धनराशि से बड़ा। यही कारण है कि यह घटना आज भी याद की जाती है।
इमरजेंसी की जेल, लेकिन पेंशन से दूरी
चंपत राय के जीवन का एक दूसरा प्रसंग भी इसी स्वभाव को समझाता है। इमरजेंसी के दौर में वे 18 महीने जेल में रहे।
ऐसे अनेक लोग बाद में लोकतंत्र सेनानी के रूप में पेंशन लेने लगे, लेकिन चंपत राय जी ने वह रास्ता नहीं चुना।
उत्तर प्रदेश में इमरजेंसी से जुड़े अनेक लोकतंत्र सेनानी आज भी पच्चीस हजार रुपये मासिक पेंशन लेते हैं।
इसके बावजूद चंपत राय ने इस आधार पर एक पैसा भी स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि वे देश के लिए जेल गए थे, पेंशन लेने के लिए नहीं।
सादगी केवल शब्द नहीं, जीवन का अभ्यास
उनके जीवन से जुड़े लोग बताते हैं कि भोजनालय में जो भोजन बनता है, वे वही खाते हैं। कोई कार्यकर्ता कपड़े दे दे तो वही पहन लेते हैं।
अपने कपड़े स्वयं धोते हैं और सामान्य जीवन को ही अपने सार्वजनिक कार्य का स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं।
यह सादगी कैमरे के लिए बनाई गई छवि नहीं मानी जाती, बल्कि लंबे समय से चली आ रही जीवन पद्धति है।
जिन लोगों ने उन्हें निकट से देखा है, वे जानते हैं कि चंपत राय के लिए सुविधा से अधिक महत्व अनुशासन और सेवा का है।
ऐसे व्यक्ति पर आरोप लगाने से पहले जीवन देखना चाहिए
किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन उसके पूरे जीवन को देखे बिना निर्णय देना उचित नहीं होता।
चंपत राय के मामले में यह प्रसंग बार बार इसलिए याद आता है, क्योंकि यह उनके निजी आचरण की सीधी गवाही देता है।
एक लाख रुपये का चेक फाड़ देने की घटना केवल त्याग की कहानी नहीं है। यह बताती है कि कुछ लोग सम्मान को भी निजी लाभ में बदलने से बचते हैं।
उनके लिए सेवा ही पर्याप्त है, और वही उनके जीवन का वास्तविक पुरस्कार है।
सेवा, समर्पण और त्याग की पहचान
चंपत राय की पहचान किसी चेक, सम्मान या पद से नहीं है। उनकी पहचान उस जीवन शैली से है, जिसमें निजी संग्रह नहीं, दायित्व प्रमुख है। इसी कारण उनके समर्थक उन्हें सादगी, सेवा, समर्पण और त्याग का उदाहरण मानते हैं।
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