गहलोत का मुस्लिम तुष्टिकरण
राजस्थान की पाकिस्तान सीमा से लगे संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध निर्माणों के विरुद्ध चल रही कार्रवाई पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार और गृह मंत्री अमित शाह की मंशा पर सवाल उठाए हैं। सीमा सुरक्षा से जुड़े विषय को उन्होंने धार्मिक पहचान से जोड़कर राजनीतिक विवाद बना दिया।
अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई पर गहलोत का मुस्लिम कार्ड
गहलोत ने आरोप लगाया कि राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण हटाने के नाम पर चिन्हित कर गिराया जा रहा है। उनका कहना है कि दशकों पुराने धार्मिक स्थल भी कार्रवाई की जद में लाए जा रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक ताने बाने को बिगाड़ने की कोशिश बताया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय को आड़े हाथों लिया।
राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर तुष्टिकरण हावी
गहलोत के बयान पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब मामला भारत पाकिस्तान सीमा से जुड़े अवैध ढांचों और संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र का है, तब उसे मजहबी भावनाओं से जोड़ना कांग्रेस की किस तरह की राजनीति है।
सीमावर्ती इलाकों में किसी भी प्रकार का अवैध निर्माण केवल स्थानीय प्रशासनिक विषय नहीं है।
पाकिस्तान से लगती सीमा, घुसपैठ, तस्करी और सुरक्षा निगरानी जैसे विषयों को देखते हुए ऐसे क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों की अलग संवेदनशीलता होती है।
अमित शाह के दौरे के बाद कार्रवाई तेज
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मई 2026 में बीकानेर में सुरक्षा समीक्षा बैठक की थी। इसके बाद भारत पाकिस्तान सीमा के नजदीक सीमा सुरक्षा के लिए अवैध निर्माणों पर सख्ती के आदेश दिए गए।
भजनलाल सरकार द्वारा राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर जैसे सीमावर्ती जिलों में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई तेज हुई। इसमें धार्मिक ढांचे और मदरसे सहित ऐसे निर्माण भी जांच और कार्रवाई के दायरे में आए, जो अवैध रूप से बने थे।
कानून सबके लिए समान या धर्म आधारित छूट ?
गहलोत इस पूरे मामले को मुस्लिम धार्मिक स्थलों की लक्षित कार्रवाई के रूप में पेश कर रहे हैं।
यदि कोई ढांचा वैध है तो उसे कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। यदि निर्माण अवैध है और सीमा सुरक्षा को प्रभावित करता है तो केवल धार्मिक पहचान के आधार पर उसे छूट देने की मांग मुस्लिम तुष्टिकरण नहीं तो फिर क्या है।
सांप्रदायिकता का आरोप लगाकर सांप्रदायिक विमर्श
गहलोत ने दावा किया कि शांत सीमावर्ती क्षेत्र में एक धर्म को निशाना बनाकर कार्रवाई हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय हिंदुओं द्वारा विरोध किया जाना वहां की सांप्रदायिक एकता का प्रमाण है।
सीमा सुरक्षा के लिए प्रशासन की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई को गहलोत सीधे धार्मिक भेदभाव के आरोप में बदलकर लोगों को भड़का रहे हैं।
इससे स्थानीय लोगों में अविश्वास बढ़ सकता है और सीमा सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है।
कांग्रेस की पुरानी तुष्टिकरण नीति का नया उदाहरण
भारत पाकिस्तान सीमा सामान्य प्रशासनिक इलाका नहीं है। यहां हर निर्माण, हर रास्ता, हर गतिविधि और हर अनधिकृत ढांचा सुरक्षा एजेंसियों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
ऐसे क्षेत्र में कार्रवाई को रोकने की मांग राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है। देश की सुरक्षा का मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, उसमें राज्य स्तर के नेताओं द्वारा अपनी मजहबी राजनीति के लिए अड़चन पैदा करना उनकी सोच को दिखाता है।
सीमावर्ती कार्रवाई पर गहलोत का रुख कांग्रेस की उसी राजनीति की याद दिलाता है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रखकर अल्पसंख्यक असुरक्षा के नाम पर तुष्टिकरण किया जाता रहा है, और देश की सुरक्षा को खतरे में डाला जाता रहा है। इससे वास्तविक मुद्दा पीछे चला जाता है।
मंत्रालय से स्पष्टीकरण ठीक, पर कार्रवाई रोकने की मांग क्यों
गृह मंत्रालय से पारदर्शिता मांगना एक राजनीतिक मांग हो सकती है। प्रशासन बता सकता है कि कौन से निर्माण अवैध थे, किस आधार पर नोटिस दिए गए और किन प्रक्रियाओं के बाद कार्रवाई हुई। इससे भ्रम और अफवाह दोनों कम होंगे।
लेकिन कार्रवाई को तुरंत रोकने की मांग तब संदिग्ध हो जाती है, जब मामला अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़े सुरक्षा क्षेत्र का हो।
ऐसे अवैध निर्माण जो सुरक्षा जोखिम हैं, उन्हें राजनीतिक दबाव में बचाना राष्ट्रीय हित के विरुद्ध है।
गहलोत के बयान से किसे लाभ
गहलोत का बयान स्थानीय मुस्लिम समाज में असुरक्षा की भावना को बढ़ा सकता है और कांग्रेस को अल्पसंख्यक राजनीति का लाभ दे सकता है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि सीमा सुरक्षा पर सरकार की हर कार्रवाई को सांप्रदायिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति मजबूत होती है।
यह रुख प्रशासनिक प्रक्रिया को भी कठिन बनाता है। जब हर अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई को धार्मिक पहचान से जोड़ा जाएगा, तो अधिकारी वैध सुरक्षा कार्रवाई करने से भी बचेंगे।
इसका सीधा लाभ अवैध कब्जों और संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण को मिलता है।
सीमा सुरक्षा पर राजनीति नहीं, स्पष्ट नीति चाहिए
राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सद्भाव का इतिहास महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह इतिहास सुरक्षा सतर्कता का विकल्प नहीं हो सकता।
गहलोत को यदि किसी विशेष ढांचे की वैधता पर आपत्ति है तो दस्तावेजों और कानूनी आधार के साथ बात करनी चाहिए। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय को मुस्लिम तुष्टिकरण और सांप्रदायिक आरोपों में घसीटना जिम्मेदार राजनीति नहीं कहा जा सकता।

