Breastfeeding or Breast Pump: नई मांओं के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे को क्या खिलाना है, बल्कि यह भी है कि उसे दूध किस तरीके से दिया जाए।
सीधे स्तनपान और ब्रेस्ट पंप से दूध निकालकर पिलाने, दोनों के अपने फायदे और जरूरत के हिसाब से अपनी जगह है। ऐसे में फैसला करने से पहले कुछ जरूरी बातों को समझना बेहद जरूरी है।
बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती महीनों में मां का दूध उसके विकास के लिए बेहद अहम होता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ नवजात को मां का दूध देने पर जोर देते हैं।
Breastfeeding or Breast Pump: लेकिन हर मां की परिस्थिति एक जैसी नहीं होती। किसी को नौकरी पर वापस लौटना होता है, किसी मां को बच्चे से कुछ घंटे दूर रहना पड़ता है, तो कभी मां या बच्चे की किसी विशेष स्थिति के कारण डायरेक्ट फीडिंग मुश्किल हो जाती है।
यहीं से ब्रेस्ट पंप की जरूरत सामने आती है।
Breastfeeding or Breast Pump: जब मां और बच्चा साथ हों, तो डायरेक्ट फीडिंग क्यों खास है?
सीधे स्तनपान के दौरान बच्चे को सिर्फ दूध ही नहीं मिलता, बल्कि मां और बच्चे के बीच शारीरिक संपर्क भी बना रहता है।
बच्चे के लिए यह संपर्क उसे सहज और सुरक्षित महसूस कराने में मदद कर सकता है।
इसके अलावा, बच्चे के चूसने से मां के शरीर में दूध बनने की प्रक्रिया भी स्वाभाविक रूप से चलती रहती है।
इसलिए यदि मां और बच्चा स्वस्थ हैं और किसी तरह की चिकित्सकीय परेशानी नहीं है, तो सामान्य परिस्थितियों में सीधे स्तनपान को प्राथमिकता दी जा सकती है।
ब्रेस्ट पंप को लेकर गलतफहमी क्या है?
Breastfeeding or Breast Pump: कई बार ब्रेस्ट पंप को लेकर दो बिल्कुल अलग धारणाएं देखने को मिलती हैं।
कुछ लोगों को लगता है कि पंप से निकाला गया दूध सीधे स्तनपान के बराबर नहीं है, जबकि दूसरी तरफ कुछ लोग दोनों तरीकों को पूरी तरह एक जैसा मान लेते हैं।
सच्चाई यह है कि पंपिंग का सबसे बड़ा फायदा सुविधा है। मां अपने दूध को निकालकर उस समय भी बच्चे तक पहुंचा सकती है, जब वह खुद बच्चे के पास मौजूद नहीं है।
इस लिहाज से ब्रेस्ट पंप उन माताओं के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकता है, जिन्हें काम, यात्रा या किसी अन्य वजह से बच्चे से कुछ समय के लिए अलग रहना पड़ता है।
क्या पंप से निकाला हुआ दूध बच्चे के लिए ठीक है?
Breastfeeding or Breast Pump: अगर दूध सही तरीके से निकाला गया है और उसकी साफ-सफाई, स्टोरेज और इस्तेमाल से जुड़ी सावधानियों का पालन किया गया है, तो मां का निकाला हुआ दूध बच्चे को दिया जा सकता है।
हालांकि, पंपिंग के दौरान सिर्फ मशीन का इस्तेमाल करना ही काफी नहीं है। पंप के हिस्सों की सफाई, हाथों की स्वच्छता और दूध को उचित तरीके से रखने की जानकारी होना भी उतना ही जरूरी है।
यानी ब्रेस्ट पंप सुविधा जरूर देता है, लेकिन उसके साथ सही प्रक्रिया का पालन करना भी जरूरी है।
बोतल से दूध पिलाने में क्यों बरतें सावधानी?
पंप से दूध निकालने के बाद अगला सवाल आता है कि बच्चे को वह दूध कैसे दिया जाए।
कई माता-पिता बोतल को सबसे आसान विकल्प मानते हैं, लेकिन कुछ बच्चों में बोतल के निप्पल और मां के स्तन से दूध पीने के तरीके में अंतर के कारण परेशानी हो सकती है।
कुछ बच्चों को बाद में सीधे स्तन से दूध पीने में दिक्कत आने लगती है।
इसलिए बच्चे की उम्र और स्थिति के हिसाब से कप या चम्मच जैसे विकल्पों पर डॉक्टर या लैक्टेशन एक्सपर्ट से सलाह ली जा सकती है।
मां के लिए भी जरूरी है सही सपोर्ट
स्तनपान को लेकर चर्चा अक्सर सिर्फ मां की जिम्मेदारी तक सीमित हो जाती है, जबकि इसके लिए परिवार और कार्यस्थल का सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कामकाजी माताओं को पर्याप्त मैटरनिटी लीव, फीडिंग के लिए उचित समय और कार्यस्थल पर जरूरी सुविधाएं मिलें, तो उन्हें हर स्थिति में पंपिंग पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
इसलिए ब्रेस्टफीडिंग को आसान बनाने के लिए सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि सही जानकारी और सपोर्ट सिस्टम भी जरूरी है।
आखिर किसे चुनें—ब्रेस्टफीडिंग या ब्रेस्ट पंप?
इसका कोई एक जवाब हर मां और हर बच्चे के लिए सही नहीं हो सकता।
अगर मां बच्चे के साथ है और दोनों स्वस्थ हैं, तो सीधे स्तनपान को प्राथमिकता देना बेहतर विकल्प हो सकता है।
वहीं, अगर मां को काम या किसी दूसरी वजह से बच्चे से दूर रहना पड़ता है, तो ब्रेस्ट पंप मां के दूध को बच्चे तक पहुंचाने का उपयोगी माध्यम बन सकता है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं कि ब्रेस्ट पंप बेहतर है या डायरेक्ट फीडिंग। जरूरी यह है कि बच्चे को मां का दूध सुरक्षित तरीके से मिले और मां के लिए भी फीडिंग का तरीका उसकी परिस्थितियों के मुताबिक सुविधाजनक और सही हो। किसी विशेष परिस्थिति में डॉक्टर या लैक्टेशन एक्सपर्ट की सलाह लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।
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