अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई और तीखे बयानों ने पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है।
इस तनाव का असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि तेल की कीमतों, वैश्विक शेयर बाजारों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
सैन्य कार्रवाई के जरिए बढ़ रहा दबाव
हालिया घटनाओं में अमेरिका ने ईरान से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की।
दोनों देश यह दिखाना चाहते हैं कि वे किसी भी दबाव में झुकने वाले नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसे Coercive Diplomacy (दबाव आधारित कूटनीति) और Brinkmanship (तनाव को चरम तक ले जाने की रणनीति) का मिश्रण मानते हैं।
इसका उद्देश्य विरोधी पक्ष पर मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव बनाना होता है।
परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद
अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध स्वीकार करे।
वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा।
यही मुद्दा दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी टकराव की वजह बना हुआ है। बातचीत के दौर के बावजूद इस मुद्दे पर सहमति बनना आसान नहीं दिख रहा।
तेल बाजार पर पड़ रहा सीधा असर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सबसे तेज असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में देखने को मिलता है। जैसे ही सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है।
इसकी वजह यह है कि निवेशकों को पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति बाधित होने का डर सताने लगता है। तेल की कीमतें बढ़ने से कई देशों में महंगाई और परिवहन लागत पर भी असर पड़ सकता है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक अहमियत
ईरान के लिए स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
अमेरिका और उसके सहयोगी इस समुद्री मार्ग को खुला और सुरक्षित रखना अपनी रणनीतिक प्राथमिकता मानते हैं,
जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा और प्रभाव का महत्वपूर्ण साधन समझता है।
इजरायल भी है अहम समीकरण
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इजरायल लंबे समय से चिंता जताता रहा है। उसका मानना है कि ईरान की बढ़ती परमाणु क्षमता क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।
अमेरिका और इजरायल के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी होने के कारण ईरान से जुड़े कई मुद्दों पर दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।
हालांकि अमेरिका अपने फैसलों को राष्ट्रीय हितों के आधार पर लेने की बात करता है।
घरेलू राजनीति भी निभा रही भूमिका
विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों की घरेलू राजनीति भी इस तनाव को प्रभावित करती है।
अमेरिका में चुनावी माहौल के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा अक्सर प्रमुख बन जाता है और मजबूत नेतृत्व की छवि राजनीतिक रूप से लाभदायक मानी जाती है।
दूसरी ओर ईरान की सरकार भी अपने नागरिकों के सामने कठोर रुख दिखाकर आंतरिक समर्थन बनाए रखना चाहती है।
ऐसे में सैन्य कार्रवाई और सख्त बयानबाजी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है।
अमेरिका और ईरान के रिश्तों में कई बार ऐसा देखा गया है कि एक ओर बातचीत की कोशिशें जारी रहती हैं, जबकि दूसरी ओर सैन्य तनाव भी बढ़ता रहता है।
इसका उद्देश्य बातचीत की मेज पर बेहतर स्थिति हासिल करना और विरोधी पक्ष पर अधिक दबाव बनाना हो सकता है। यही कारण है कि शांति की संभावनाओं के बीच भी संघर्ष पूरी तरह समाप्त होता नजर नहीं आता।

