Ajmer: अजमेर के JLN मेडिकल कॉलेज में देहदान करने वालों के शवों की देखभाल को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
आरोप है कि शवों को सीलन, धूल और गंदगी के बीच रखा गया, जबकि कुछ शवों पर फंगस और कीड़े दिखाई देने का दावा किया गया है।
मामले ने मेडिकल कॉलेज की व्यवस्थाओं और देहदानियों के सम्मान को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
भावी डॉक्टरों की पढ़ाई के लिए किया था देहदान
देहदान को समाजसेवा का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। कई लोग मृत्यु के बाद अपना शरीर मेडिकल कॉलेज को
इस उद्देश्य से दान करते हैं कि मेडिकल छात्र मानव शरीर की संरचना को समझ सकें और बेहतर डॉक्टर बन सकें।
ऐसे में दान किए गए शवों की सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से देखभाल करना मेडिकल संस्थानों की अहम जिम्मेदारी होती है।
लेकिन अजमेर के JLN मेडिकल कॉलेज से सामने आई तस्वीरों ने इसी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शवों की हालत को लेकर गंभीर दावे
आरोप है कि कॉलेज में रखे कुछ शवों की स्थिति ठीक नहीं थी। शवों के आसपास सीलन, धूल और गंदगी दिखाई देने की बात सामने आई है।
कुछ शवों पर फंगस और कीड़े होने का दावा भी किया गया। इसके अलावा, शवों को रखने वाले टैंक खुले होने और उनके पूरी तरह केमिकल सॉल्यूशन में डूबे नहीं होने की बात कही गई है।
अगर ये दावे सही पाए जाते हैं तो यह शवों के संरक्षण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
एक्सपर्ट ने जताई चिंता
बताया गया कि शवों की तस्वीरें एनाटॉमी एक्सपर्ट को दिखाई गईं। एक्सपर्ट ने ऐसी स्थिति को लेकर चिंता जताई और कहा कि मेडिकल कॉलेज में शवों को तय प्रोटोकॉल के अनुसार सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
शवों के संरक्षण के लिए आवश्यक केमिकल सॉल्यूशन और उचित व्यवस्था जरूरी होती है।
ऐसी स्थिति में शवों की देखभाल करने वाले कर्मचारियों, फैकल्टी और मेडिकल विद्यार्थियों के लिए संक्रमण का जोखिम भी चिंता का विषय बन सकता है।
छात्रों को नहीं मिल पाती पर्याप्त बॉडी
मेडिकल छात्रों के मुताबिक, हर साल प्रैक्टिकल और पढ़ाई के लिए करीब 25 शवों की जरूरत होती है, लेकिन कॉलेज में केवल 4 से 5 शव ही उपलब्ध हो पाते हैं।
छात्रों का कहना है कि फरवरी में भी शवों पर फंगस और कीड़े होने की शिकायत सामने आई थी, लेकिन इसके बाद भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
इस कमी का असर मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण पर भी पड़ सकता है।
कॉलेज प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार
वहीं, एनाटॉमी विभाग के HOD डॉ. विकास सक्सेना ने शवों के खराब होने के आरोपों से इनकार किया है।
उनका कहना है कि शवों को निर्धारित रूटीन प्रक्रिया के तहत फॉर्मेलिन से ट्रीट किया जाता है और बाद में नियमों के अनुसार उनका निस्तारण किया जाता है।
यानी एक तरफ शवों की स्थिति को लेकर गंभीर दावे सामने आए हैं, तो दूसरी तरफ कॉलेज प्रशासन ने प्रक्रिया में किसी तरह की लापरवाही से इनकार किया है।
देहदानियों के सम्मान की जिम्मेदारी किसकी?
यह पूरा मामला सिर्फ मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था तक सीमित नहीं है। सवाल उन लोगों के सम्मान का भी है,
जिन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए दान किया। उनके इस फैसले से आने वाली पीढ़ियों के डॉक्टरों को सीखने का अवसर मिलता है।
ऐसे में जरूरी है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और अगर किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जाए।
क्योंकि देहदान करने वालों के शरीर की उचित देखभाल सिर्फ एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उनके प्रति सम्मान भी है।

