Disha Salian death: मुंबई में सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियन की मौत से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है।
अदालत ने दिशा के पिता सतीश सालियन की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज करने और मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराने का निर्देश दिया है।
कोर्ट के इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में है और शिवसेना (UBT) नेता एवं विधायक आदित्य ठाकरे का नाम भी चर्चा में आया है।
हालांकि, अदालत के आदेश में आदित्य ठाकरे को लेकर एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की गई है। हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने का निर्देश किसी व्यक्ति को अपराधी या आरोपी घोषित करने के समान नहीं है।
यानी एफआईआर दर्ज होने मात्र से किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध साबित नहीं होता।
जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला बनता है या नहीं।
आदित्य ठाकरे को लेकर हाईकोर्ट ने क्या स्पष्ट किया?
न्यायमूर्ति सारंग वी. कोटवाल और न्यायमूर्ति रणजीतसिंह आर. भोंसले की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति को आरोपी तभी माना जा सकता है,
जब जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री उसके खिलाफ पर्याप्त संदेह का आधार उपलब्ध कराए।
इसका सीधा मतलब है कि CBI को जांच का जिम्मा सौंपे जाने के बाद भी किसी व्यक्ति को पहले से दोषी नहीं माना जा सकता।
जांच एजेंसी को उपलब्ध तथ्यों और सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई करनी होगी।
इसलिए CBI जांच के आदेश के बावजूद आदित्य ठाकरे के खिलाफ अदालत ने किसी अपराध को प्रमाणित नहीं किया है।
उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता जांच के दौरान ही सामने आएगी।
CBI को FIR दर्ज करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने CBI के मुंबई क्षेत्र के संयुक्त निदेशक को निर्देश दिया है कि दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन का बयान दर्ज करने के लिए वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी नियुक्त किया जाए।
इसके बाद उनकी शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई जाए।
अदालत ने मुंबई पुलिस को भी मामले से संबंधित जरूरी दस्तावेज और भौतिक साक्ष्य नियुक्त CBI अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया है।
CBI को दिशा सालियन की मौत से जुड़े सभी पहलुओं की जांच करने को कहा गया है।
जांच में अपराध के सबूत मिले तो क्या होगा?
कोर्ट ने जांच के बाद अपनाई जाने वाली प्रक्रिया भी स्पष्ट कर दी है। अगर CBI की जांच में किसी अपराध के पर्याप्त सबूत सामने आते हैं तो एजेंसी को सक्षम अदालत के समक्ष कानून के मुताबिक रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
वहीं, यदि जांच में अपराध के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते हैं, तो CBI क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है।
यानी अदालत ने इस स्तर पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय मामले की निष्पक्ष जांच का रास्ता तय किया है।
कैसे हुई थी दिशा सालियन की मौत?
दिशा सालियन की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के उपनगर में एक आवासीय इमारत से गिरने के बाद हुई थी।
घटना के बाद मुंबई पुलिस ने आकस्मिक मृत्यु रिपोर्ट (ADR) दर्ज की थी। शुरुआती जांच में पुलिस ने इसे आत्महत्या माना था।
बाद में सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर मामले को लेकर कई तरह के दावे सामने आए। इसके बाद जांच को दोबारा शुरू किया गया।
दिशा के पिता सतीश सालियन ने आरोप लगाया कि उन्हें अधिकारियों और राजनेताओं की ओर से गुमराह किया गया,
उनकी बेटी की मौत को आत्महत्या मानने के लिए दबाव बनाया गया। उन्होंने यह दावा भी किया कि मामले से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण फोरेंसिक और जांच दस्तावेज परिवार के सामने नहीं रखे गए।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अदालत के आदेश में नहीं की गई है।
आदित्य ठाकरे समेत कई लोगों पर लगाए गए थे आरोप
सतीश सालियन ने वर्ष 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने दिशा की मौत की
स्वतंत्र जांच कराने और आदित्य ठाकरे समेत कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।
याचिका में हत्या और सामूहिक बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों की जांच की मांग भी की गई थी।
हालांकि,ये आरोप याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए थे और इन्हें अदालत द्वारा साबित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है।
इस मामले में आदित्य ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पसबोला ने पक्ष रखा।
ठाकरे के वकील ने याचिका की सुनवाई पर उठाए सवाल
आदित्य ठाकरे की ओर से अदालत में याचिका की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए। उनके वकील ने दलील दी कि
संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट आने से पहले उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए था।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि याचिका राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित हो सकती है और शिकायत का इस्तेमाल आदित्य ठाकरे को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
उनके वकील ने मामले में सामने आए आरोपों को मीडिया रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया पर किए गए दावों से प्रभावित बताया।
FIR के बिना लंबी जांच पर कोर्ट ने जताई थी आपत्ति
मामले की पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस की जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए थे।
अदालत ने पूछा था कि यदि पुलिस मामले की व्यावहारिक रूप से जांच कर रही थी तो CrPC की धारा 174 के तहत इतनी लंबी प्रक्रिया किस आधार पर जारी रखी गई।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि धारा 174 के तहत की जाने वाली कार्रवाई किसी व्यक्ति को क्लीन चिट देने या अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने का आधार नहीं बन सकती।
अदालत के अनुसार, जब बाद में गंभीर आरोप सामने आए तो पुलिस को कानून के मुताबिक एफआईआर दर्ज कर नियमित जांच करनी चाहिए थी।
मुंबई पुलिस ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया।
उन्होंने अदालत को बताया कि गवाहों के बयान और फोरेंसिक रिपोर्ट में किसी तरह की गड़बड़ी या यौन उत्पीड़न की संभावना सामने नहीं आई थी।
पुलिस की ओर से बताया गया कि शुरुआती ADR जांच करीब तीन महीने में पूरी कर ली गई थी।
हालांकि सोशल मीडिया पर सामने आए नए दावों के बाद वर्ष 2023 में मामले को दोबारा देखा गया।
हाईकोर्ट ने विस्तृत जांच के लिए अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। इसी पृष्ठभूमि में अब मामले की जांच CBI को सौंपने का निर्देश दिया गया है।

