उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा की स्थिति पर राज्यपाल और विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल की चिंता ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है। गोरखपुर की बदहाली पर सवाल उठाने वाले राजभवन के अपने फैसलों की कसौटी अब सार्वजनिक बहस के केंद्र में है।
राज्यपाल की गोरखपुर को लेकर चिंता इसलिए भी सवाल बनती है क्योंकि कुलाधिपति के रूप में विश्वविद्यालयों की शीर्ष प्रशासनिक व्यवस्था पर राजभवन की भूमिका होती है। ऐसे में केवल संस्थानों की कमियां गिनाना पर्याप्त नहीं, अपने नियुक्ति संबंधी निर्णयों की समीक्षा जरूरी है।
पिछले लगभग सात वर्षों में राजभवन ने अलग अलग कुलपतियों के मामलों में अलग निर्णय किए। कहीं शिकायतों पर तुरंत पद से हटाया गया, कहीं स्थानांतरण जैसा हस्तक्षेप हुआ, जबकि गंभीर जांचों के बावजूद किसी कुलपति का पद बचा रहा और सम्मान भी मिला।
सबसे ताजा घटनाक्रम में किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद को दूसरा कार्यकाल मिल गया। उनके कार्यकाल से जुड़े विवादों, नियुक्तियों पर उठे प्रश्नों और विधानमंडलीय जांच के बीच इस निर्णय ने राजभवन की नीति पर नई बहस छेड़ दी।
राजभवन के कार्यकाल में ऐसे अनेक प्रसंग रहे हैं जिन पर बहस होती रही, लेकिन इन चार कुलपतियों के उदाहरण तुलना के लिए पर्याप्त आधार देते हैं। प्रत्येक मामले में आरोप, जांच और प्रशासनिक स्थिति अलग थी, मगर निर्णयों की असमानता सवाल पैदा करती है।
इन चार मामलों को साथ रखकर मूल प्रश्न यही बनता है कि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के लिए कानून, नैतिकता, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वसनीयता की कसौटी क्या समान है, या व्यक्ति बदलते ही निर्णय की दिशा और कठोरता भी बदल जाती है।
पहला मामला: शिकायतें आईं और अशोक कुमार मित्तल पद से अलग
आगरा विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अशोक कुमार मित्तल के खिलाफ वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। जुलाई 2021 में राजभवन ने उन्हें तत्काल दायित्वों से अलग किया और सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी।
शिकायतों में नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी, लेखा परीक्षण आपत्तियों की उपेक्षा, विश्वविद्यालय प्रशासन में कथित अनियमितताएं, लंबित मामलों में पर्याप्त कार्रवाई न करना और कर्मचारियों को अतिरिक्त भुगतान जैसे मुद्दे शामिल थे। मित्तल ने सभी आरोपों को गलत बताया और न्यायालय का रुख किया।
उस समय अशोक कुमार मित्तल के खिलाफ कोई अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि नहीं हुई थी। इसके बावजूद राजभवन ने शिकायतों की गंभीरता को आधार मानते हुए उन्हें पद से अलग कर दिया। यही निर्णय राजभवन की पहली स्पष्ट प्रशासनिक कसौटी माना जा सकता है।
पहले मामले में शिकायतों की गंभीरता ही पद से अलग करने के लिए पर्याप्त मानी गई। न्यायिक फैसला आने की प्रतीक्षा नहीं की गई। इससे यह प्रशासनिक सिद्धांत सामने आया कि विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता बचाने के लिए जांच पूरी होने से पहले हस्तक्षेप संभव है।
दूसरा मामला: पी के मिश्रा के मामले में भी राजभवन का हस्तक्षेप
दूसरा मामला प्राविधिक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पी के मिश्रा से जुड़ा है। फरवरी 2023 में आनंदीबेन पटेल ने उन्हें कुलपति पद से हटाकर दूसरे विश्वविद्यालय से संबद्ध किया। बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और घटनाक्रम ने राजभवन की हस्तक्षेप क्षमता सामने रखी।
यह कहना तथ्य से आगे होगा कि पी के मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई केवल किसी एक विवाद या दूसरे कुलपति से जुड़े मामले के कारण हुई। फिर भी स्पष्ट है कि राजभवन ने कुलपतियों को हटाने और प्रशासनिक हस्तक्षेप के अधिकार का सक्रिय प्रयोग किया।
दूसरे मामले में राजभवन ने यह नहीं कहा कि कुलपति पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आने तक कोई कदम नहीं उठाया जा सकता। पद से हटाकर दूसरे विश्वविद्यालय से संबद्ध करने का फैसला प्रशासनिक अधिकार के प्रयोग का उदाहरण बना।
अशोक कुमार मित्तल और पी के मिश्रा के मामलों से संकेत मिला कि राजभवन के पास न अधिकारों की कमी थी और न कार्रवाई की इच्छा शक्ति का अभाव। आवश्यकता महसूस होने पर कुलपति को पद से अलग करने का निर्णय लिया जा सकता था।
तीसरा मामला: विनय कुमार पाठक पर जांचें, लेकिन पद बरकरार
तीसरा मामला विनय कुमार पाठक से जुड़ा है, जहां सवालों की गंभीरता कहीं अधिक थी। 29 अक्टूबर 2022 को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। शिकायतकर्ता ने परीक्षा संबंधी बकाया बिल मंजूर कराने के लिए कथित कमीशन मांगने और वसूली किए जाने का आरोप लगाया।
यह मामला केवल पुलिस एफआईआर तक सीमित नहीं रहा और जांच एसटीएफ तक पहुंची। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की। जनवरी 2023 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर औपचारिक जांच शुरू की और मामला केंद्रीय एजेंसी तक पहुंचा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने विनय कुमार पाठक की एफआईआर रद्द कराने संबंधी याचिका भी खारिज कर दी। हालांकि यह स्पष्ट रहना चाहिए कि एफआईआर या जांच किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करती और अंतिम निर्णय केवल अदालत द्वारा किया जाता है।
तीसरे मामले ने इसी सिद्धांत की निरंतरता पर प्रश्न खड़ा किया। विनय पाठक के खिलाफ आरोप जांच एजेंसियों तक पहुंचे, सीबीआई ने प्रकरण दर्ज किया और उच्च न्यायालय से भी राहत नहीं मिली, फिर भी उनके कुलपति पद की स्थिति पहले मामलों जैसी नहीं बदली।
लेकिन विवाद दोष या निर्दोष होने से अलग प्रशासनिक कसौटी का है। अशोक कुमार मित्तल को अंतिम दोषसिद्धि से पहले जांच के दौरान पद से हटाया जा सकता था, तो विनय पाठक गंभीर जांचों के बीच कुलपति पद पर कैसे बने रहे, प्रश्न यही है।
यहीं दो प्रशासनिक दृष्टिकोण दिखाई देते हैं। एक में शिकायत और जांच के दौरान पद से अलग करना संस्थागत हित में माना गया, जबकि दूसरे में कई स्तर की जांच के बावजूद पद पर बने रहने दिया गया। इस अंतर का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है।
पुरानी अनियमितताओं की जांच और राजभवन का फैसला
डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय में विनय पाठक के पुराने कार्यकाल से जुड़ी अनियमितताओं की जांच शुरू हुई। मई 2023 में राजभवन ने यह जांच रद्द कर कहा कि वर्तमान कुलपति को पूर्व कुलपति के खिलाफ ऐसी जांच शुरू करने का अधिकार नहीं है।
राजभवन का तर्क था कि पूर्व कुलपति से संबंधित जांच कराने का अधिकार कुलाधिपति के पास है। कानूनी अधिकार क्षेत्र का तर्क अपनी जगह हो सकता है, लेकिन प्रश्न है कि राजभवन ने वैसी स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई जैसी दूसरे मामलों में कराई गई।
जांच रद्द किए जाने का प्रसंग भी इसी बहस का हिस्सा है। यदि वर्तमान कुलपति को पूर्व कुलपति की जांच कराने का अधिकार नहीं था और अधिकार कुलाधिपति का था, तो प्रश्न है कि कुलाधिपति कार्यालय ने उस अधिकार का उपयोग किस रूप में किया।
इसके बाद दिसंबर 2023 में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय को नैक का ए प्लस प्लस दर्जा मिलने पर राजभवन ने विनय पाठक और उनकी टीम को सम्मानित किया। इस घटनाक्रम ने पिछले मामलों की तुलना में अलग व्यवहार को अधिक स्पष्ट किया।
नैक के ए प्लस प्लस दर्जे पर विनय पाठक और उनकी टीम का सम्मान संस्थागत उपलब्धि से जुड़ा निर्णय हो सकता है। फिर भी आलोचना इसलिए बनी क्योंकि उसी व्यक्ति से संबंधित गंभीर जांचें चर्चा में थीं और राजभवन का रुख तुलना का विषय था।
एक ओर अशोक कुमार मित्तल शिकायतों और जांच के चरण में ही पद से अलग कर दिए गए। दूसरी ओर पी के मिश्रा भी पद से हटाए गए, जबकि विनय पाठक एफआईआर, एसटीएफ और सीबीआई जांच के बीच पद पर बने रहे और सम्मानित हुए।
इस तुलना का उद्देश्य किसी को दोषी या निर्दोष ठहराना नहीं है। मूल प्रश्न है कि राजभवन किस प्रशासनिक मानक से निर्णय करता है। यदि गंभीर शिकायतें पद से हटाने का आधार हैं, तो समान गंभीरता वाले मामलों में वही मानक क्यों लागू नहीं होता।
चौथा मामला: सोनिया नित्यानंद को मिला दूसरा कार्यकाल
चौथा और सबसे नया मामला किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद का है। राजभवन ने उन्हें दूसरा कार्यकाल दिया है। विवाद उनकी शैक्षणिक योग्यता पर नहीं, बल्कि पहले कार्यकाल के दौरान सामने आए प्रशासनिक प्रश्नों और विवादों से संबंधित है।
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में 112 शिक्षकों की भर्ती को लेकर आरक्षण रोस्टर पर गंभीर सवाल उठे। मामला उत्तर प्रदेश विधानमंडल की संयुक्त समिति तक पहुंचा। समिति ने दस्तावेज मांगे और विश्वविद्यालय प्रशासन तथा कुलपति को नियुक्ति प्रक्रिया पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना पड़ा।
इन नियुक्तियों को अंतिम रूप से भर्ती घोटाला कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि जांच का निर्णायक निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना जरूरी है। फिर भी यह निर्विवाद है कि मामला गंभीर माना गया और उत्तर प्रदेश विधानमंडल की संयुक्त समिति को जांच करनी पड़ी।
सोनिया नित्यानंद के दूसरे कार्यकाल पर भी यही कसौटी लागू होती है। प्रश्न नियुक्ति के वैधानिक अधिकार का नहीं, बल्कि उस निर्णय से पहले उपलब्ध प्रशासनिक रिकॉर्ड, विधानमंडलीय समिति के प्रश्न, आरक्षण रोस्टर विवाद और विश्वविद्यालय के स्पष्टीकरण के मूल्यांकन की पारदर्शिता का है।
यदि 112 शिक्षकों की भर्ती से जुड़े प्रश्नों का संतोषजनक समाधान हो चुका था, तो उसका विवरण सार्वजनिक किया जाना राजभवन के निर्णय को विश्वसनीय बनाता। यदि समाधान लंबित था, तो दूसरा कार्यकाल देने से पहले उस लंबित स्थिति का प्रभाव स्पष्ट करना अपेक्षित था।
रमीजुद्दीन प्रकरण और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल
सोनिया नित्यानंद के कार्यकाल में रमीजुद्दीन प्रकरण जैसा विवाद भी सामने आया। एक महिला चिकित्सक ने यौन उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के दबाव जैसे गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों से कुलपति को दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन प्रशासनिक मूल्यांकन में इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रमीजुद्दीन प्रकरण में महिला चिकित्सक द्वारा लगाए गए आरोपों की गंभीरता अपनी जगह है, लेकिन आरोप मात्र से कुलपति की दोषसिद्धि स्थापित नहीं होती। फिर भी कुलपति के प्रशासनिक नेतृत्व का आकलन करते समय परिसर में उठे गंभीर विवाद संस्थागत वातावरण के हिस्से होते हैं।
इसके बावजूद राजभवन ने सोनिया नित्यानंद को दूसरा कार्यकाल दे दिया। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के इतिहास में इसे असाधारण निर्णय माना जा रहा है। इसके साथ सवाल उठता है कि 112 नियुक्तियों और आरक्षण रोस्टर पर विधानमंडलीय समिति की जांच में क्या निष्कर्ष निकला।
यह भी पूछा जा रहा है कि क्या आरक्षण रोस्टर पर उठे प्रश्न समाप्त हो चुके हैं और क्या राजभवन ने जांच, उपलब्ध दस्तावेजों तथा विश्वविद्यालय के स्पष्टीकरण का मूल्यांकन किया। यदि किया, तो उस आधार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किया गया।
यदि विधानमंडलीय जांच उस समय तक निर्णायक निष्कर्ष पर नहीं पहुंची थी, तो दूसरा कार्यकाल देने में इतनी जल्दी क्यों दिखाई गई। और यदि जांच पूरी हो चुकी थी, तो उसके निष्कर्ष तथा राजभवन के मूल्यांकन को सार्वजनिक करने में क्या बाधा थी।
चार कुलपति और चार अलग प्रशासनिक व्यवहार
चारों मामलों को रखने पर तस्वीर विरोधाभास दिखाती है। अशोक कुमार मित्तल के खिलाफ प्रशासनिक शिकायतें आईं और उन्हें पद से अलग किया गया। पी के मिश्रा के मामले में हस्तक्षेप हुआ और उन्हें कुलपति पद से हटाकर दूसरे विश्वविद्यालय से जोड़ा गया।
विनय कुमार पाठक के खिलाफ एफआईआर हुई, एसटीएफ जांच हुई और सीबीआई ने भी जांच शुरू की। इसके बावजूद उनका कुलपति पद बना रहा और बाद में राजभवन ने उन्हें सम्मानित किया। यह स्थिति पहले दो मामलों की तुलना में अलग प्रशासनिक रुख दर्शाती है।
सोनिया नित्यानंद के मामले में 112 नियुक्तियों पर सवाल उठे, आरक्षण रोस्टर विवाद सामने आया, विधानमंडलीय संयुक्त समिति ने जांच की और प्रशासनिक विवादों से घिरे पहले कार्यकाल के बाद उन्हें दूसरा कार्यकाल मिला। इसलिए चार कुलपति और चार अलग नियम जैसी स्थिति बनती है।
इन चार उदाहरणों का सार किसी व्यक्ति के अपराध या निर्दोषता पर निर्णय देना नहीं है। सवाल यह है कि एक ही संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था में कार्रवाई, प्रतीक्षा, जांच, संरक्षण, सम्मान और पुनर्नियुक्ति के मानदंड कितने स्पष्ट, समान और सार्वजनिक हैं।
आनंदीबेन पटेल के कार्यकाल पर उठता केंद्रीय प्रश्न
यहीं आनंदीबेन पटेल के कार्यकाल पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न उभरता है। यह कहना गलत होगा कि राजभवन ने किसी कुलपति के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल है कि उपलब्ध शक्ति और अधिकार प्रत्येक मामले में समान रूप से क्यों नहीं दिखाई दिए।
यदि अंतिम दोषसिद्धि तक इंतजार करना सिद्धांत है, तो अशोक कुमार मित्तल को जांच के दौरान पद से क्यों हटाया गया। यदि विश्वसनीयता और विश्वविद्यालय की गरिमा जांच के बीच कार्रवाई का आधार है, तो विनय पाठक को पद पर रखने का कारण क्या था।
इसी तरह यदि किसी कुलपति का कार्यकाल, प्रशासनिक रिकॉर्ड और सार्वजनिक विश्वसनीयता राजभवन के लिए महत्वपूर्ण है, तो सोनिया नित्यानंद को दूसरा कार्यकाल देने से पहले 112 नियुक्तियों और विधानमंडलीय समिति के सवालों का विस्तृत सार्वजनिक उत्तर सामने क्यों नहीं रखा गया।
चार कुलपति, चार अलग परिस्थितियां और चार अलग फैसले, लेकिन निर्णय लेने वाला संस्थान एक ही राजभवन रहा। इसलिए गोरखपुर की उच्च शिक्षा की बदहाली पर जताई गई चिंता अब राजभवन के अपने पिछले फैसलों और उनकी समानता की कसौटी तक पहुंच चुकी है।
गोरखपुर से आगे निकला उच्च शिक्षा का सवाल
उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जताने से पहले राजभवन से अपने निर्णयों का हिसाब देने की मांग उठ रही है। कुलपति दोषी हैं या निर्दोष, इसका निर्णय अदालत करेगी, लेकिन प्रशासनिक पद पर बनाए रखने या हटाने का निर्णय अदालत नहीं करती।
कुलपति को कब हटाना है, कब पद पर बनाए रखना है, कब जांच शुरू करनी है, कब जांच रद्द करनी है, कब सम्मानित करना है और कब दूसरा कार्यकाल देना है, ये सभी निर्णय राजभवन और कुलाधिपति की प्रशासनिक भूमिका से सीधे जुड़े हुए हैं।
इसीलिए मूल सवाल अदालत से पहले राजभवन की ओर जाता है कि क्या एक ही राज्यपाल के सामने सभी कुलपतियों के लिए तराजू समान है, या व्यक्ति और नाम बदलते ही मानक, कठोरता, जवाबदेही और प्रशासनिक निर्णयों के बाट भी बदल जाते हैं।
अंतिम और सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि अलग अलग मामलों में अलग कसौटियां अपनाई जा रही हैं, तो क्या उत्तर प्रदेश की चिकित्सा और उच्च शिक्षा व्यवस्था में राजभवन की निष्पक्षता पर उठ रहे आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक नहीं हो जाती।
धन वसूली, सप्लायरों के संरक्षण और उच्च शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने जैसे आरोप गंभीर हैं और इन्हें प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। ऐसे आरोप बहस में मौजूद हों, तो राजभवन के लिए पारदर्शी जवाब और प्रशासनिक मानक प्रस्तुत करना आवश्यक हो जाता है।

