गीता प्रेस
रतनगढ़ से गोरखपुर तक भाईजी की आध्यात्मिक यात्रा
श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार को सामान्यतः गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित मासिक पत्रिका कल्याण के आदि संपादक के रूप में जाना जाता है। राजस्थान के रतनगढ़ में जन्मे पोद्दार जी ने जीवन में व्यापार किया, भारी आर्थिक हानि झेली और एक समय सट्टे में भी हाथ आजमाया था।
सांसारिक जीवन के इन उतार चढ़ावों के बीच उनकी साधना निरंतर गहरी होती चली गई। आध्यात्मिक जगत में उनका व्यक्तित्व उच्च कोटि के साधक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। उनके आत्मीय और स्नेही लोग उन्हें हनुमान प्रसाद पोद्दार के बजाय प्रेमपूर्वक और सम्मान के साथ प्रायः भाईजी कहकर संबोधित करते थे।
पूजन के दौरान मिला श्रीरामचरितमानस के प्रकाशन का संदेश
एक दिन पूजन के समय समाधिस्थ अवस्था में भाईजी को अनुभूति हुई कि स्वयं श्री किशोरी जी अर्थात श्रीराधारानी उन्हें संदेश दे रही हैं। संदेश था कि मुगलकाल के भीषण अत्याचार और हाहाकार के बीच आस्था को अचल आश्रय देने वाले गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस को जन जन तक पहुंचाया जाए।
इस अनुभूति में उन्हें श्रीरामचरितमानस की प्रति केवल आठ आने अर्थात पचास पैसे में उपलब्ध कराने का निर्देश मिला। भाईजी ने उसी समाधिस्थ अवस्था में उत्तर दिया कि जब यह कार्य स्वयं आपकी प्रेरणा से कराया जा रहा है, तब इसके पूरा होने में कोई बाधा कैसे आ सकती है।
वामकुक्षी करते ही दोबारा सुनाई दी ध्वनि
पूजन के बाद भोजन करके भाईजी वामकुक्षी अर्थात बाईं करवट लेटकर कुछ समय विश्राम किया करते थे। उस दिन भी भोजन के बाद वे लेटे ही थे कि ध्यानावस्था में फिर ध्वनि सुनाई दी कि तुम लेट गए हो, फिर यह निर्धारित कार्य आखिर संपन्न कैसे होगा।
यह सुनते ही भाईजी तत्काल उठकर बैठ गए और कागज पेंसिल लेकर योजना बनाने लगे। उनके मन में पहला विचार आया कि श्रीरामचरितमानस के इस प्रथम संस्करण की पचास हजार प्रतियां प्रकाशित की जानी चाहिए, जिससे ग्रंथ व्यापक स्तर पर सामान्य परिवारों और श्रद्धालुओं तक पहुंच सके।
हिसाब लगाया तो सामने आया एक लाख पैंतीस हजार का घाटा
भाईजी ने कागज, कंपोजिंग, छपाई और अन्य आवश्यक खर्चों का हिसाब लगाया। उन दिनों कंपोजिंग टाइप सेटिंग के माध्यम से की जाती थी। उनका विचार था कि एक प्रति घर में छह आने अर्थात लगभग सैंतीस पैसे की पड़नी चाहिए, ताकि आठ आने की निर्धारित कीमत संभव हो सके।
उन्होंने हिसाब लगाया कि एक आना अर्थात लगभग छह पैसे विक्रेता भी चाहेगा और एक आना दूसरे खर्चों के लिए रखना होगा। सारी लागत जोड़ने घटाने के बाद सामने आया कि इस योजना को पूरा करने में लगभग एक लाख पैंतीस हजार रुपये का घाटा होने वाला था।
यह उस समय बहुत बड़ी धनराशि थी, क्योंकि उस दौर में सोने का भाव लगभग बीस से बाईस रुपये प्रति तोला बताया जाता था। इतना बड़ा घाटा सामने होने के बावजूद भाईजी विचलित नहीं हुए। हिसाब पूरा करते ही उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि उनका झोला तैयार कर दिया जाए।
झोला लेकर सीधे कलकत्ता के लिए निकले भाईजी
भाईजी ने कहा कि उन्हें कलकत्ता जाना है। उनके साधारण से झोले में धोती, कुर्ता, लंगर बंडी, संध्या पात्र और माला रखी गई। इसके बाद वे गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे, टिकट लिया और बिना किसी विस्तृत तैयारी के रेलगाड़ी में बैठकर सीधे कलकत्ता के लिए रवाना हो गए।
कलकत्ता पहुंचने के बाद भाईजी एक पेड़ी पर पहुंचे। मारवाड़ी संस्कृति में सेठ और साहूकारों की व्यापारिक गद्दी को पेड़ी कहा जाता है। उनके पहुंचते ही वहां चारों ओर भाईजी आओ और पधारो की आवाजें गूंजने लगीं, मानो किसी अत्यंत पूजनीय देवपुरुष का वहां आगमन हुआ हो।
सेठ ने पूछा कहां से आए, भाईजी ने रख दी अनोखी शर्त
पेड़ी के स्वामी ने भाईजी का स्वागत करते हुए पूछा कि वे कहां से पधारे हैं। भाईजी ने बताया कि वे सीधे गोरखपुर से चले आ रहे हैं। सेठ ने उनसे स्नान और पूजन करने के बाद अपने निवास पर भोजन के लिए चलने का आग्रह किया।
भाईजी ने भोजन करने की स्वीकृति तो दी, लेकिन साथ ही स्पष्ट कर दिया कि वे दक्षिणा लेने के बाद ही भोजन करेंगे। इस पर सेठ ने आश्चर्य से पूछा कि क्या अब बाणियों ने भी दक्षिणा लेकर भोजन करने की कोई नई परंपरा शुरू कर दी है।
भाईजी ने उत्तर दिया कि ब्राह्मण भोजन करके दक्षिणा लेता है और वैश्य दक्षिणा लेकर भोजन करेगा। इतना कहते हुए उन्होंने गोरखपुर में तैयार किया हुआ पूरा हिसाब का पर्चा सेठ के सामने रख दिया। पर्चा देखकर सेठ ने कहा कि जब रामजी ने कहा है तो व्यवस्था भी वही करेंगे।
भोजन से पहले दक्षिणा पर अड़े रहे भाईजी
इसके बाद भाईजी स्नान और पूजन के लिए चले गए तथा कुछ ही समय में निवृत्त होकर लौट आए। सेठ ने बताया कि बग्घी तैयार है और उन्हें भोजन के लिए निवास पर चलना चाहिए। भाईजी ने फिर दोहराया कि वे दक्षिणा प्राप्त करने के बाद ही भोजन ग्रहण करेंगे।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि भोजन की थाली लाकर अन्न भगवान का अपमान न कराया जाए, क्योंकि दक्षिणा के बिना वे भोजन नहीं करेंगे। सेठ उन्हें अपने निवास पर ले गए। वहां पहुंचने पर भाईजी ने देखा कि दो भद्र पुरुष पहले से बैठे हुए थे और भोजन की थाली खाली रखी थी।
चार चेक और पैंतीस हजार रुपये से पूरी हुई राशि
भाईजी के बैठते ही वहां मौजूद दोनों सज्जनों ने अपनी अपनी ओर से मोड़कर दो चेक थाली के पास रख दिए। इसी दौरान नीचे से ब्याईजी सा अर्थात समधीजी के आने की आवाज सुनाई दी और स्वागत में आओ आओ तथा पधारो पधारो की आवाजें गूंज उठीं।
इसके बाद दो और सज्जन भीतर आए और उन्होंने भी थाली के पास अपने अपने चेक रख दिए। इसी बीच सेठ की वृद्ध माता नाभिस्पर्शी घूंघट निकाले धीरे धीरे वहां पहुंचीं। उन्होंने भाईजी की थाली के पास पैंतीस हजार रुपये की नकद धनराशि रख दी।
चारों चेक पच्चीस पच्चीस हजार रुपये के थे, जिनकी कुल राशि एक लाख रुपये हुई। इसके साथ वृद्ध माता द्वारा रखे गए पैंतीस हजार रुपये मिलाकर ठीक एक लाख पैंतीस हजार रुपये हो गए। यह वही धनराशि थी, जो भाईजी के हिसाब वाले पर्चे में घाटे के रूप में निकली थी।
पूरा हिसाब हूबहू पूरा होते देखकर भाईजी हंस पड़े और तत्काल भोजन लाने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें भयंकर भूख लगी थी। लेकिन इसी समय सेठ ने मुस्कराते हुए भाईजी को रोक दिया। श्रीरामचरितमानस को लेकर खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अभी भाईजी की गणना से बाहर रह गया था।
सेठ ने याद दिलाया कि ग्रंथ को जिल्द भी चाहिए
सेठ ने हंसते हुए कहा कि भाईजी कच्चे बाणिए हैं। पांच से छह सौ पृष्ठों का इतना मोटा ग्रंथ क्या बिना जिल्द के ही लोगों को दिया जाएगा, क्योंकि बिना मजबूत जिल्द के वह केवल दो दिन में हाथों में आने के बाद खराब होने लगेगा।
भाईजी इस नई लागत को लेकर विचार में पड़े तो सेठ ने बताया कि जब वे स्नान और पूजन के लिए गए थे, तभी एक जिल्दसाज को बुलाकर पूरा ब्यौरा लिया जा चुका था। जिल्दसाज ने इस काम पर लगभग दस से बारह हजार रुपये खर्च होने का अनुमान बताया था।
सेठ ने उस खर्च को पंद्रह हजार रुपये मानकर अपने एक सेवक को भेजा और कुल डेढ़ लाख रुपये का ड्राफ्ट तैयार करा लिया। उन्होंने वह पूरी राशि भाईजी को दक्षिणा के रूप में सौंपते हुए उनसे अब श्रेष्ठ कांसा आरोगने अर्थात भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया।
भोजन पूरा होते ही पूछा गोरखपुर की गाड़ी का समय
भोजन करते ही भाईजी ने पहला प्रश्न यही किया कि अब गोरखपुर जाने वाली रेलगाड़ी कितने बजे है। उन्हें बताया गया कि गाड़ी रवाना होने में अभी लगभग तीन से चार घंटे बाकी हैं, इसलिए वे वापस पेड़ी पर जाकर कुछ समय अपना वामकुक्षी धर्म निभाते हुए विश्राम कर सकते हैं।
साथ ही उन्हें आश्वासन दिया गया कि समय होने पर उन्हें रेलगाड़ी तक पहुंचा दिया जाएगा। इस प्रकार जिस उद्देश्य से भाईजी गोरखपुर से कलकत्ता आए थे, वह बहुत कम समय में पूरा हो गया और श्रीरामचरितमानस के व्यापक प्रकाशन के लिए आवश्यक आर्थिक व्यवस्था भी तैयार हो गई।
डेढ़ महीने में बाजार और घर घर पहुंचने लगा मानस
अगले दिन भाईजी गोरखपुर वापस पहुंच गए। उनके लौटते ही श्रीरामचरितमानस की कंपोजिंग का काम युद्धस्तर पर प्रारंभ हो गया। प्रकाशन से जुड़ी पूरी व्यवस्था तेजी से आगे बढ़ी और लगभग डेढ़ महीने के भीतर मानस की प्रतियां तैयार होकर बाजार में पहुंचने लगीं तथा वहां से घर घर पहुंच गईं।
सुलभ मूल्य पर श्रीरामचरितमानस उपलब्ध होने का व्यापक प्रभाव धार्मिक समाज पर दिखाई दिया। जगह जगह सुंदरकांड और अखंड रामचरितमानस पाठ आयोजित होने लगे। मानस पर प्रवचन करने वाले वक्ताओं की नई पौध भी सामने आने लगी, जिसने देश के धार्मिक क्षेत्र में नई सक्रियता और हरितिमा का संचार किया।
तुलसी और सूर सहित संत साहित्य के प्रकाशन का विस्तार
श्रीरामचरितमानस के बाद प्रकाशन का यह क्रम आगे बढ़ता चला गया। गोस्वामी तुलसीदास और सूरदास के समग्र साहित्य के साथ अनेक संतों की रचनाएं भी मुद्रित होने लगीं। धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य को सामान्य पाठकों तक सुलभ रूप से पहुंचाने का अभियान लगातार व्यापक होता गया।
आठ आने में मानस उपलब्ध कराने की इस योजना का प्रभाव दूर तक पहुंचा। जिस ग्रंथ को अधिकाधिक परिवारों तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया था, वह तेजी से धार्मिक जीवन का हिस्सा बनने लगा। सस्ती पुस्तक के माध्यम से रामकथा, पाठ, प्रवचन और संत साहित्य का प्रसार नई गति से हुआ।
विश्वभर के रामभक्तों के लिए स्मरणीय बने हनुमान प्रसाद पोद्दार
आठ आने के इस चमत्कार ने देश के धार्मिक वातावरण को प्रभावित किया। भाईजी की आध्यात्मिक अनुभूति में जिस कार्य के लिए श्रीसीताराम जी की प्रेरणा मिली थी, उसके निमित्त के रूप में हनुमान प्रसाद पोद्दार ने आर्थिक कठिनाई के बावजूद संकल्प को वास्तविक प्रकाशन अभियान में परिवर्तित कर दिया।
रतनगढ़ से निकले व्यापारी, साधक, कल्याण के आदि संपादक और गीता प्रेस से जुड़े भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार का यह प्रसंग उनके जीवन की विशिष्ट स्मृतियों में गिना जाता है। श्रीरामचरितमानस को जन जन तक पहुंचाने की भूमिका ने उन्हें विश्वभर के श्रीराम भक्तों के लिए स्मरणीय बना दिया।

