UP: लखनऊ का जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर यानी JPNIC एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में है।
सवाल बड़ा सीधा है जिस JPNIC की नींव अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी, जिस पर उनकी सरकार के दौरान करोड़ों रुपये खर्च हुए और जो उनके कार्यकाल में पूरा नहीं हो सका,
अब BJP सरकार इसे निजी भागीदारी और लीज के जरिए पूरा कराकर चलाने की कोशिश कर रही है तो अखिलेश यादव को ऐतराज क्यों है?
अखिलेश यादव का आरोप है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है। लेकिन क्या वाकई सरकारी संपत्ति बेच दी गई है? या फिर सरकार ने इसे लंबे समय की लीज पर देकर निजी निवेश के जरिए पूरा कराने का मॉडल चुना है?
पूरे विवाद को समझने के लिए JPNIC की शुरुआत से कहानी समझना जरूरी है।
2013 में रखी गई थी JPNIC की नींव
गोमतीनगर में करीब 18-20 एकड़ जमीन पर JPNIC को एक आधुनिक बहुउद्देशीय परिसर के रूप में तैयार करने की योजना बनाई गई थी।
इसमें कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों की क्षमता वाला हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा म्यूजियम ब्लॉक जैसी सुविधाएं प्रस्तावित थीं।
इसकी शुरुआत 2013 में अखिलेश यादव सरकार के दौरान हुई। उस समय परियोजना की अनुमानित लागत ₹265.59 करोड़ रखी गई थी।
लेकिन कुछ ही वर्षों में लागत में भारी बढ़ोतरी हुई और नवंबर 2016 तक संशोधित लागत करीब ₹864.99 करोड़ पहुंच गई।
यानी जिस प्रोजेक्ट को करीब 265 करोड़ रुपये में तैयार करने की योजना थी, उसका अनुमान तीन गुना से ज्यादा बढ़ गया।
CAG ने भी उठाए थे खर्च पर सवाल
JPNIC के निर्माण को लेकर CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी कुछ अनियमितताओं का जिक्र मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक पाइलिंग के एक काम में निर्धारित दर से ज्यादा भुगतान किया गया।
1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक लागू दर ₹8,201.40 प्रति मीटर थी।
करीब 24,680 मीटर के काम पर इस अंतर के चलते लगभग ₹1.41 करोड़ के अनुचित लाभ की बात ऑडिट में सामने आई।
यह आरोप किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि CAG की ऑडिट प्रक्रिया में दर्ज किया था।
2017 के बाद अटक गया पूरा प्रोजेक्ट
2017 में उत्तर प्रदेश में सरकार बदली। इसके बाद JPNIC के निर्माण और खर्च को लेकर जांच कराई गई और काम रुक गया। इसके बाद यह विशाल परिसर लंबे समय तक अधूरा पड़ा रहा।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि JPNIC आज किस मॉडल पर चलेगा। सवाल यह भी है कि जिस परियोजना पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे, वह इतने वर्षों तक जनता के इस्तेमाल में क्यों नहीं आ सकी?
अब सरकार इसे फिर से पूरा कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
JPNIC बेचा नहीं, लीज पर दिया जा रहा है
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम बिंदु है। अखिलेश यादव इसे ‘बेचे जाने’ का आरोप लगा रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि JPNIC की जमीन और मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा।
निजी कंपनी को लंबे समय की लीज के तहत संचालन का अधिकार दिया जाएगा। यानी मालिकाना हक और संचालन का अधिकार एक ही चीज नहीं हैं।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के संयुक्त उपक्रम को संचालन के लिए चुना गया है।
निजी कंपनी करेगी करोड़ों का निवेश
सरकार के इस मॉडल में निजी ऑपरेटर को सिर्फ संचालन नहीं करना है, बल्कि अधूरे JPNIC को पूरा करने में भी निवेश करना होगा।
परिसर में अभी इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम और फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी बताए जाते हैं, जिन पर करीब ₹200 से ₹250 करोड़ खर्च का अनुमान है।
इसके अलावा निजी ऑपरेटर को LDA को करीब ₹10.11 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम और ₹25 करोड़ की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी।
संचालन शुरू होने के बाद हर साल करीब ₹6 करोड़ का भुगतान होगा, जिसमें सालाना 5 फीसदी बढ़ोतरी का प्रावधान भी है।
अखिलेश के विरोध पर उठता है सवाल
विपक्ष का सरकार से सवाल करना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन यहां राजनीतिक आरोप और तथ्य अलग-अलग करना जरूरी है।
अगर JPNIC को बेच दिया गया होता और जमीन का मालिकाना हक किसी निजी कंपनी को सौंप दिया गया होता, तो ‘बिकने’ का आरोप समझ में आता।
लेकिन अगर सरकारी जमीन और संपत्ति सरकार के पास ही रहती है और निजी कंपनी को केवल लीज पर संचालन का अधिकार मिलता है, तो इसे सीधे ‘बेच देना’ कहना मामले को काफी सरल बना देता है।
और यहां एक राजनीतिक सवाल अखिलेश यादव से भी बनता है जिस परियोजना की शुरुआत आपकी सरकार में हुई,
जिसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर करीब 865 करोड़ हो गई और जो आपके कार्यकाल में भी पूरी नहीं हो सकी, उसे अब निजी निवेश से पूरा कराने की कोशिश पर इतनी आपत्ति क्यों?
आखिर JPNIC कब जनता के काम आएगा?
करीब एक दशक से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में अधूरे प्रोजेक्ट की मिसाल बना हुआ है। इस पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद आम जनता को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया।
अब असली परीक्षा सरकार की भी है और नए ऑपरेटर की भी। राजनीतिक बयानबाजी से अलग जनता का सवाल बेहद साफ है JPNIC बिका या नहीं,
इससे ज्यादा जरूरी यह है कि यह आखिर कब पूरा होगा और कब जनता के लिए खुलेगा। क्योंकि इतने वर्षों और इतने बड़े खर्च के बाद उत्तर प्रदेश को एक और अधूरा प्रोजेक्ट नहीं, एक पूरी तरह तैयार और उपयोगी JPNIC चाहिए।

