सबरीमाला
मूल याचिका पर न्यायालय की आपत्ति
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले में 2006 की जनहित याचिका के संदर्भ में कड़ी टिप्पणियां की हैं।
मुख्य न्यायाधीश सुर्य कांत और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्न ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ताओं को अयप्पा भगवान में विश्वास था।
न्यायालय ने देशभर के धार्मिक मंदिरों के संचालन को लेकर गैर-आस्तिकों के हस्तक्षेप पर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति नागरत्न ने कहा कि एक कानूनी निकाय के पास विश्वास नहीं हो सकता है, यह किसी व्यक्ति का अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि सर्वोच्च न्यायालय को इस याचिका को कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था।
याचिकाकर्ताओं पर कोर्ट का प्रहार
न्यायालय ने भारतीय युवा वकील संगठन के लोकस स्टेंडी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संगठन के अध्यक्ष नौशाद अली हैं, जिन्होंने यह याचिका दायर की थी।
न्यायमूर्ति नागरत्न ने पूछा कि क्या यह संगठन देश का मुख्य पुरोहित है। मुख्य न्यायाधीश ने सीधे सवाल किया कि किसी धार्मिक मंदिर के परंपरागत रीति-रिवाजों को चुनौती देने का अधिकार किसे है। न्यायमूर्ति नागरत्न ने कहा कि यह पैसे के हित में की जाने वाली याचिका है।
2018 के फैसले पर पुनर्विचार
सबरीमाला संदर्भ मामला 2018 के ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है। उस समय पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने चार के मुकाबले एक वोट से सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी।
इस फैसले ने दशकों पुरानी परंपरा को चुनौती दी थी जो मासिक धर्म की उम्र की महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करती थी। नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने विस्तृत मुद्दों को बड़ी पीठ को भेजा था।
संवैधानिक पीठ का गठन
मुख्य न्यायाधीश सुर्य कांत की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ गठित की गई है। पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्न, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्न बी वरले, आर महादेवन और जॉयमल्या बागची शामिल हैं।
पीठ ने अप्रैल 7 से इस मामले की सुनवाई शुरू की थी। यह पीठ धार्मिक अधिकारों और स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों पर विचार कर रही है।
सदियों पुरानी परंपरा का सम्मान
सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि अयप्पा स्वामी में विश्वास न रखने वाले किसी व्यक्ति को दशकों से चली आ रही मंदिर परंपराओं को क्यों चुनौती देनी चाहिए।
न्यायालय ने जोर देकर कहा कि धार्मिक आस्था और भक्तों की श्रद्धा को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। सबरीमाला मंदिर की परंपराओं को हजारों साल की संस्कृति और आस्था पर आधारित माना गया है।
पीठ ने अवलोकन किया कि धर्म को सामाजिक सुधार के नाम पर पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता है।
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग
मुख्य न्यायाधीश सुर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए।
पीठ ने टिप्पणी की कि कुछ संगठन राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए न्यायिक मंच का उपयोग करते हैं। ऐसी याचिकाएं वास्तविक सार्वजनिक हित के बिना दायर की जाती हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया कि धार्मिक परंपराओं को संवैधानिक तर्क के जरिए चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
व्यापक प्रभाव के मामले
सबरीमाला संदर्भ के अलावा यह पीठ अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर भी विचार कर रही है। दरगाहों और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा शामिल है।
पारसी समुदाय में बाहर से विवाह करने वाली महिलाओं के बहिष्कार का प्रश्न भी है। दावूदी बोहरा समुदाय में कुछ प्रथाएं विचाराधीन हैं। पीठ के निर्णय का असर इन सभी मामलों पर पड़ने की संभावना है।
धार्मिक स्वतंत्रता का संरक्षण
पीठ ने अप्रैल 15 को अवलोकन किया कि लाखों लोगों की आस्थाओं को गलत या अनुचित बताना न्यायालय का कर्तव्य नहीं है।
अप्रैल 17 को पीठ ने कहा कि धार्मिक मामलों में फैसला करते समय न्यायिक प्राधिकार को व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास से ऊपर उठना चाहिए। पीठ को धार्मिक स्वतंत्रता की व्याख्या करते समय धर्म के विनाश में कोई भूमिका नहीं निभानी है।
संवैधानिक सिद्धांतों पर बहस
पीठ ने अप्रैल 22 को पूछा कि राज्य संवैधानिक नैतिकता और राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों का आह्वान करके धार्मिक मामलों में सामाजिक सुधार कानूनों को सही ठहरा सकता है।
अप्रैल 29 को पीठ ने कहा कि सच्ची भक्तें 50 साल की उम्र तक प्रतीक्षा कर सकती हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि भारत संवैधानिक लोकतंत्र है जहां बहुमत का शासन है पर बहुसंख्यकवाद संवैधानिकता को नहीं दबा सकता है।

