सुनील बंसल
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी ने दो तिहाई बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। ममता बनर्जी का अभेद किला धराशायी हो गया और तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।
इस असंभव को संभव बनाने वाले शख्स हैं भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल जिन्होंने अपनी अद्भुत रणनीति से बंगाल की सियासत की दिशा ही बदल दी।
उत्तर प्रदेश के बाद बंगाल में चमका बंसल का जादू
सुनील बंसल को भाजपा के सबसे धारदार चुनावी रणनीतिकारों में गिना जाता है। गृह मंत्री अमित शाह के सबसे भरोसेमंद और करीबी माने जाने वाले बंसल ने 2014 और 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा को शिखर पर पहुंचाया था।
उत्तर प्रदेश में उनकी सफलता ने उन्हें यूपी का चाणक्य बना दिया। अब उसी अनुभव और कौशल से उन्होंने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। बंसल ने साबित कर दिया कि जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति हो वहां असंभव कुछ भी नहीं।
डर भगाओ भरोसा लाओ का नारा बना गेमचेंजर
सुनील बंसल ने बंगाल चुनाव के लिए डर भगाओ भरोसा लाओ का नारा दिया जो पूरे चुनाव का केंद्रीय विषय बन गया। इस नारे ने बंगाल की जनता के मन में बैठे डर को निकालकर भाजपा के प्रति भरोसा जगाने का काम किया।
बंसल की यह रणनीतिक समझ थी कि बंगाल में सबसे बड़ी समस्या तृणमूल के गुंडागर्दी से उपजा डर है। उन्होंने इसी डर को हटाने पर अपनी पूरी ताकत लगा दी। नतीजा यह रहा कि जो लोग खुलकर भाजपा का समर्थन करने से डरते थे वे मतदान केंद्रों पर पहुंचकर अपना फैसला सुना गए।
बंसल की चौकड़ी ने रचा इतिहास
सुनील बंसल ने भूपेंद्र यादव बिप्लब देब और अनिल मालवीय के साथ मिलकर एक ऐसी टीम बनाई जिसने ममता बनर्जी को हर मोर्चे पर घेरा। संगठनात्मक कौशल के धनी बंसल ने इस चौकड़ी की अगुवाई करते हुए ऐसी रणनीति बनाई कि तृणमूल के पास कोई जवाब नहीं रहा।
बंसल ने हर सदस्य को उसकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी दी और पूरे अभियान को सैन्य अनुशासन के साथ चलाया। उनकी नेतृत्व क्षमता का यह कमाल था कि चारों ने एक टीम की तरह काम किया और बंगाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित कर दी।
बूथ मैनेजमेंट में बंसल का कोई सानी नहीं
सुनील बंसल की सबसे बड़ी ताकत उनका बूथ मैनेजमेंट है। उन्होंने बंगाल के हर जिले हर विधानसभा क्षेत्र और हर बूथ को इतनी बारीकी से तैयार किया कि तृणमूल के कार्यकर्ता भी हैरान रह गए। बंसल ने उत्तर प्रदेश में आजमाए गए अपने बूथ प्रबंधन के फॉर्मूले को बंगाल में और भी परिष्कृत रूप में लागू किया।

हर बूथ पर भाजपा के मजबूत कार्यकर्ता तैनात किए गए और उन्हें लगातार प्रशिक्षण दिया गया। बंसल की यह रणनीति थी कि बूथ जीतो तो सीट अपने आप जीत जाएगी।
साइलेंट स्ट्रैटेजी से विरोधियों को किया बेबस
सुनील बंसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे मीडिया की चकाचौंध से दूर रहकर पर्दे के पीछे से काम करते हैं। उनकी इस साइलेंट स्ट्रैटेजी ने तृणमूल के रणनीतिकारों को पूरी तरह बेबस कर दिया। ममता बनर्जी और उनकी टीम को अंत तक समझ नहीं आया कि बंसल आखिर कर क्या रहे हैं।
जब तक उन्हें कुछ समझ आता तब तक बहुत देर हो चुकी होती थी। बंसल ने चुपचाप काम करके तूफान खड़ा कर दिया। उनकी यह शैली उत्तर प्रदेश में भी कामयाब रही थी और बंगाल में भी यही फॉर्मूला काम कर गया।
डेटा और फीडबैक पर आधारित बंसल की रणनीति
सुनील बंसल भावनाओं की बजाय डेटा और ग्राउंड फीडबैक पर काम करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बंगाल में भी यही तरीका अपनाया। बंसल ने हर विधानसभा क्षेत्र का गहन सर्वेक्षण करवाया और रियल टाइम डेटा के आधार पर रणनीति बनाई।
उनकी टीम लगातार जमीनी फीडबैक जुटाती रही और उसके अनुसार अभियान को आकार दिया जाता रहा। बंसल का यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही था जिसने भाजपा को सफलता दिलाई। उन्होंने साबित किया कि आधुनिक चुनावी राजनीति में डेटा की ताकत से बड़ी कोई ताकत नहीं।
साइलेंट वोटर को साधने में माहिर बंसल
सुनील बंसल का पूरा ध्यान उन मतदाताओं पर रहा जो टीवी बहसों और सोशल मीडिया पर नहीं दिखते लेकिन मतदान केंद्र पर पहुंचकर शांति से अपना फैसला सुना देते हैं। बंसल ने इन साइलेंट वोटर्स को साधने की जबरदस्त रणनीति बनाई।
उन्होंने समझा कि बंगाल में भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो तृणमूल की गुंडागर्दी से परेशान है लेकिन खुलकर बोल नहीं सकता। बंसल ने इन्हीं लोगों तक पहुंचने के लिए छोटी बैठकों और घर घर संपर्क का तरीका अपनाया। यह रणनीति शानदार तरीके से काम कर गई।
ममता को निशाना न बनाने की बंसल की चतुराई
सुनील बंसल की एक और बड़ी रणनीतिक समझ यह थी कि उन्होंने शुरुआत में ममता बनर्जी को सीधे निशाना नहीं बनाया। बंसल ने पहले तृणमूल के विधायकों और स्थानीय नेताओं के खिलाफ माहौल बनाया।
यह बेहद चतुर चाल थी क्योंकि ममता पर सीधा हमला करने से उनके समर्थक भड़क सकते थे। लेकिन भ्रष्ट और गुंडा विधायकों के खिलाफ अभियान चलाने से जनता ने भी साथ दिया। बंसल ने लगभग 220 विधानसभा क्षेत्रों में तृणमूल विधायकों के खिलाफ चार्जशीट जारी करवाई।
इस रणनीति का असर यह हुआ कि तृणमूल को 77 उम्मीदवार बदलने पड़े। बंसल ने इस तरह पहले तृणमूल की जड़ें कमजोर कीं।
12000 स्ट्रीट मीटिंग्स का बंसल का मास्टरप्लान
सुनील बंसल ने बंगाल में बड़ी रैलियों की बजाय छोटी जनसभाओं पर फोकस करने का फैसला किया। यह उनका मास्टरप्लान था। बंसल ने 53 विधानसभा सीटों पर 12000 से अधिक स्ट्रीट कॉर्नर मीटिंग्स करवाईं।
मोहल्लों और घरों के आधार पर आयोजित इन सभाओं में सीधे लोगों से संवाद हुआ। बंसल की यह समझ थी कि बंगाल जैसे राज्य में जहां तृणमूल का आतंक है वहां बड़ी रैलियों से ज्यादा छोटी बैठकें कारगर होंगी।
विशेष रूप से महिला मतदाताओं से संवाद स्थापित करने के लिए 165000 छोटी बैठकें करवाईं। इन बैठकों ने भाजपा ताई भाजपा चाई का माहौल बना दिया।
चार्जशीट अभियान से तृणमूल को घेरा
सुनील बंसल की सबसे प्रभावी रणनीति थी चार्जशीट अभियान। बंसल ने करीब 80 प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाईं और लगभग 220 विधानसभा क्षेत्रों में तृणमूल विधायकों के खिलाफ चार्जशीट जारी की।
दूसरे चरण में जिला स्तर पर चार्जशीट जारी की गई। अंत में गृह मंत्री अमित शाह ने ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ चार्जशीट जारी कर आखिरी कील ठोक दी।
बंसल का यह तीन स्तरीय चार्जशीट अभियान इतना प्रभावी रहा कि तृणमूल पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। बंसल ने इस तरह तृणमूल को हर मोर्चे पर फंसा दिया।
परिवर्तन यात्रा की योजना बंसल की देन
सुनील बंसल ने बंगाल में 10000 किलोमीटर लंबी परिवर्तन यात्रा निकालने का फैसला किया। यह यात्रा बंसल की रणनीति का अहम हिस्सा थी।
इस यात्रा के जरिए बंसल ने पूरे बंगाल में परिवर्तन का संदेश फैलाया। यात्रा के दौरान हर गांव हर कस्बे में जाकर लोगों से संपर्क किया गया। बंसल ने यात्रा को सिर्फ रस्म अदायगी नहीं बल्कि जनजागरण का माध्यम बनाया।
यात्रा के दौरान ममता सरकार की विफलताओं और भ्रष्टाचार को उजागर किया गया। बंसल की यह यात्रा जनता तक सीधे पहुंचने का सशक्त जरिया बन गई।
ब्रिगेड मैदान रैली में दिखा बंसल का दांव
सुनील बंसल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली बड़ी रैली के लिए कोलकाता के ब्रिगेड मैदान को चुना। यह बंसल की बड़ी रणनीतिक चाल थी क्योंकि बंगाल की राजनीति में कहा जाता है कि जो ब्रिगेड मैदान जीतता है वही बंगाल जीतता है।
बंसल ने इस रैली के लिए इतनी जबरदस्त तैयारी की कि पांच लाख से अधिक लोग जुटे। यह रैली ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी साबित हुई। बंसल ने इस रैली के जरिए साफ संदेश दे दिया कि भाजपा अब बंगाल में मजबूत ताकत बन चुकी है। इस रैली के बाद ममता बनर्जी की चिंता बढ़ गई।
संदेशखाली और आरजी कर का बंसल का इस्तेमाल
सुनील बंसल ने संदेशखाली और आरजी कर कांड को बेहद प्रभावी तरीके से चुनावी मुद्दा बनाया। बंसल की रणनीति के तहत इन दोनों मामलों की पीड़िताओं के परिजनों को टिकट दिया गया। यह बंसल की मास्टरस्ट्रोक थी।
इससे एक तरफ पीड़ितों को न्याय मिलने का संदेश गया तो दूसरी तरफ ममता सरकार की क्रूरता और असंवेदनशीलता उजागर हुई। बंसल ने मां माटी मानुष के खिलाफ ममता सरकार द्वारा किए गए अत्याचारों की श्रृंखला को जनता के सामने रखा। इस रणनीति ने महिला मतदाताओं को बड़े पैमाने पर भाजपा के पक्ष में किया।
संगठन को एक सूत्र में पिरोने वाले बंसल
सुनील बंसल ने बंगाल में भाजपा का सबसे बड़ा काम यह किया कि उन्होंने बिखरे हुए संगठन को एक सूत्र में पिरोया। बंगाल भाजपा में आंतरिक कलह और गुटबाजी चरम पर थी। बंसल ने सबसे पहले इसी समस्या का समाधान किया।
उन्होंने सभी गुटों को एक मंच पर लाया और केवल जीत पर फोकस करने का संदेश दिया। बंसल ने स्पष्ट कर दिया कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से पहले पार्टी की जीत आती है। बंसल के इस कठोर रुख ने संगठन में अनुशासन लाया और सभी एक लक्ष्य के लिए काम करने लगे।
कोलकाता को 142 वार्डों में बांटने की बंसल की सोच
सुनील बंसल ने कोलकाता को संगठनात्मक तौर पर 142 वार्डों में विभाजित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। यह पहली बार था जब भाजपा ने कोलकाता में इतने सूक्ष्म स्तर पर संगठनात्मक ढांचा तैयार किया। बंसल ने हर वार्ड में पांच पदाधिकारी नियुक्त किए जो वार्ड स्तर पर काम करने लगे।
बंसल की यह माइक्रो प्लानिंग इतनी सटीक थी कि कोलकाता जैसे तृणमूल के गढ़ में भी भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। वार्ड प्रमुखों को हाई राइज बिल्डिंगों में जाकर निवासी कल्याण संघों के प्रमुखों से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी गई।
बंसल ने दशहरा और दीपावली में इन प्रभावशाली लोगों को विशेष स्मृति चिन्ह भिजवाए। इस रणनीति से शहरी मध्यम वर्ग बड़ी संख्या में भाजपा के साथ आया।
फुटबॉल को राजनीतिक हथियार बनाने वाले बंसल
सुनील बंसल की सबसे अनोखी रणनीति थी फुटबॉल को राजनीतिक जमीन बनाने का आधार बनाना। बंगाल में फुटबॉल की लोकप्रियता को देखते हुए बंसल ने नरेंद्र कप का आयोजन करवाया।
इस कप के माध्यम से 18000 खिलाड़ियों को सीधे जोड़ा गया। बंसल ने एक लाख फुटबॉल खिलाड़ियों को टीशर्ट और जर्सी वितरित करवाई। यह अभियान सात दिनों तक चला। बंसल ने क्लबों के माध्यम से खिलाड़ियों को फुटबॉल वितरित करवाए।
पूरे प्रदेश में महिलाओं के लिए फुटबॉल के 253 मैच करवाए गए। पांच हजार बैट और बॉल जिन पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर थी खिलाड़ियों में बांटे गए। बंसल की यह अनूठी पहल ने युवाओं को भाजपा से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।
युवा और महिला कार्ड की बंसल की रणनीति
सुनील बंसल ने युवाओं और महिलाओं को साधने के लिए विशेष रणनीति बनाई। बंसल ने युवा शक्ति भरोसा कार्ड और मातृ शक्ति भरोसा कार्ड जैसी योजनाएं शुरू करवाईं।
इन कार्डों के माध्यम से लाखों लोगों से सीधा संपर्क स्थापित किया गया। बंसल की यह समझ थी कि युवा और महिलाएं इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। उन्होंने इन दोनों वर्गों को लुभाने के लिए विशेष अभियान चलाया।
पूरे चुनाव अभियान के दौरान राज्य और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा 640 रैलियां करवाईं जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने 19 रैलियां और 2 रोड शो किए। गृह मंत्री शाह ने 29 रैलियां और 11 रोड शो किए। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी लगभग 17 कार्यक्रम किए। इन सभी कार्यक्रमों की योजना और समन्वय बंसल ने किया।
165000 आंगन बैठकों का बंसल का रिकॉर्ड
सुनील बंसल ने फरवरी माह में जब परीक्षाओं के कारण ध्वनि प्रचार सीमित था तब भी मात्र एक महीने में 165000 से अधिक आंगन बैठकों का आयोजन करवाया।
यह अपने आप में रिकॉर्ड था। बंसल ने लाउडस्पीकर के बिना घर घर जाकर लोगों से संवाद करने की रणनीति अपनाई। इन आंगन बैठकों में महिलाओं की भागीदारी बेहद अधिक रही।
बंसल की यह रणनीति इसलिए भी प्रभावी रही क्योंकि इससे तृणमूल के गुंडे लोगों को डरा नहीं सकते थे। छोटी बैठकों में लोगों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं और भाजपा से उम्मीदें जताईं।
9500 प्रवासी बंगालियों को जुटाने का बंसल का कारनामा
सुनील बंसल ने पूरे देश से लगभग 9500 प्रवासी बंगालियों को बंगाल बुलवाया। यह बंसल की एक और मास्टरस्ट्रोक थी। बंसल ने समझा कि प्रवासी बंगाली अपने गृह जिलों में जाकर परिवार और रिश्तेदारों को प्रभावित कर सकते हैं।
इन प्रवासियों ने अपने इलाकों में जाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। बंसल ने इन प्रवासियों को प्रशिक्षित भी करवाया ताकि वे प्रभावी तरीके से अभियान चला सकें। यह रणनीति शानदार तरीके से काम कर गई और कई जगहों पर प्रवासियों के प्रभाव से नतीजे पलट गए।
स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता देने वाले बंसल
सुनील बंसल ने प्रत्याशी चयन में एक नई परंपरा शुरू की। बंसल ने बाहरी उम्मीदवारों के बजाय स्थानीय नेतृत्व को विशेष महत्व दिया। डॉक्टरों वकीलों खिलाड़ियों कलाकारों गायकों और बंगाल के प्रतिष्ठित स्थानीय चेहरों को टिकट दिए गए।
बंसल की यह रणनीति बेहद कारगर साबित हुई क्योंकि स्थानीय चेहरों से लोगों का भावनात्मक जुड़ाव होता है। बंसल ने साबित किया कि राजनीति में स्थानीय पहचान और जमीनी जुड़ाव बाहरी नेतृत्व से कहीं अधिक प्रभावी होता है।
जनजागरण अभियान का बंसल का व्यापक फैलाव
सुनील बंसल ने 15 जनवरी से 27 फरवरी तक राज्यभर में चार्जशीट आधारित जनजागरण अभियान संचालित करवाया। इस अभियान के तहत 220 विधानसभा क्षेत्रों को कवर किया गया।
बंसल ने 150 से अधिक नेताओं को इस अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए तैनात किया। राज्य सरकार की विफलताओं और भ्रष्टाचार के मुद्दों को जनता के सामने रखने के लिए 80 से अधिक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करवाईं।
बंसल के इस व्यापक अभियान ने तृणमूल सरकार की कलई पूरी तरह खोल दी। हर दिन कोई न कोई नया खुलासा होता रहा और ममता सरकार लगातार घिरती रही।
दो साल के सघन अभियान के सूत्रधार बंसल
सुनील बंसल ने बंगाल चुनाव की तैयारी दो साल पहले ही शुरू कर दी थी। बंसल ने धैर्य के साथ धीरे धीरे संगठन को मजबूत किया। उन्होंने जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया बल्कि सोच समझकर हर कदम उठाया।
बंसल के इस लंबे अभियान ने भाजपा को बंगाल में गहरी जड़ें जमाने का मौका दिया। दो साल तक लगातार काम करने के बाद जो नींव तैयार हुई वही इस जीत का आधार बनी। बंसल ने साबित किया कि चुनाव जीतने के लिए लंबी तैयारी और धैर्य की जरूरत होती है।
तृणमूल के गढ़ में पैठ बनाने का बंसल का हुनर
सुनील बंसल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने उन इलाकों में भी भाजपा की मजबूत पैठ बना दी जिन्हें ममता बनर्जी का अभेद गढ़ माना जाता था। बंसल ने इन इलाकों में विशेष ध्यान दिया और यहां पर अतिरिक्त संसाधन लगाए।
उन्होंने समझा कि अगर तृणमूल के गढ़ में सेंध लगाई जा सके तो जीत आसान हो जाएगी। बंसल की यही रणनीति कामयाब रही और तृणमूल के कई गढ़ ढह गए। बंसल ने असंभव को संभव करके दिखा दिया।
बंसल का अंतिम प्रहार: दो तिहाई बहुमत
सुनील बंसल की रणनीति का अंतिम परिणाम यह रहा कि भाजपा ने बंगाल में दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया। यह सिर्फ जीत नहीं बल्कि तृणमूल का सफाया था। ममता बनर्जी का अभेद किला पूरी तरह ध्वस्त हो गया।
बंसल ने अपनी रणनीति से साबित कर दिया कि उनकी तुलना में कोई रणनीतिकार नहीं। यूपी के बाद अब बंगाल में भी बंसल ने अपना जादू चला दिया।
यूपी का चाणक्य अब बंगाल का चाणक्य भी बन गया है। सुनील बंसल का नाम अब भारतीय राजनीति के सबसे बड़े चुनावी रणनीतिकारों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया है।

