मजहबी ने कुल्ला किया तो गलती: सोशल मीडिया पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से जुड़ा एक वीडियो हाल ही में तेजी से वायरल हुआ, जिसमें एक व्यक्ति मजहबी सरोवर में वजू करता नजर आ रहा है।
वीडियो सामने आने के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने इसे सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थल का अपमान बताया और नाराज़गी जताई।
आम लोगों का कहना था कि जिस सरोवर को श्रद्धालु अमृत मानकर उसमें स्नान करते हैं, वहां इस तरह की धार्मिक क्रिया करना मर्यादा का उल्लंघन है,
लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के मुख्य सचिव कुलवंत सिंह मनन ने इस पूरे मामले को मामूली बताते हुए कहा कि कई बार दूसरे धर्मों के लोगों को धार्मिक परंपराओं की जानकारी नहीं होती और वे अनजाने में गलती कर बैठते हैं।
अर्चना पर एसजीपीसी का रवैया सख्त क्यों?
मजहबी ने कुल्ला किया तो गलती: एसजीपीसी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।
लोगों ने सवाल उठाया कि अगर यह गलती अनजाने में हुई है, तो फिर एक साल पहले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अर्चना मकवाना के मामले में एसजीपीसी का रवैया इतना सख्त क्यों था।
अर्चना ने गोल्डन टेंपल परिसर में योग किया था, जिसके बाद एसजीपीसी ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।
उस वक्त कहा गया कि योग करने से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। इतना ही नहीं, अर्चना को जान से मारने की धमकियां तक दी गई थीं।
तब एसजीपीसी ने इसे गंभीर मामला बताया और कोई नरमी नहीं दिखाई।
इसी तरह 2021 में कपूरथला के एक गुरुद्वारे में एक हिंदू युवक की हत्या का मामला भी लोगों को याद आ रहा है।
बताया गया कि युवक को भूख लगी थी और वह गुरुद्वारे के ग्राउंड फ्लोर पर रोटी खा रहा था। इसी बात को लेकर उसकी हत्या कर दी गई।
उस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और धार्मिक स्थलों की मर्यादा को लेकर बड़े सवाल खड़े हुए थे।
मजहबी ने कुल्ला किया तो गलती, हिंदू के योग पर FIR
इन तीनों घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एसजीपीसी का रवैया अलग-अलग समुदायों के लिए अलग है।
मजहबी सरोवर में वजू करने पर अगर इसे “अनजानी गलती” कहा जा रहा है, तो फिर योग करने या भूख लगने पर रोटी खाने जैसी बातों को अपराध क्यों माना गया।
यही वजह है कि लोग एसजीपीसी पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि धार्मिक स्थलों पर सभी धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। नियम अगर हैं तो सबके लिए बराबर होने चाहिए।
किसी के साथ नरमी और किसी के साथ सख्ती, यह समाज में वैमनस्य को बढ़ावा देता है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर धार्मिक सहिष्णुता और समानता पर बहस छेड़ दी है, जिसका जवाब एसजीपीसी को साफ और निष्पक्ष तरीके से देना चाहिए।

