Friday, February 13, 2026

सचिन तेंदुलकर: क्या सचिन तेंदुलकर को सट्टेबाजी का एड करने के लिए मिला था भारत रत्न? सट्टेबाजी एप्स और स्टार्स का गंदा गठजोड़

सचिन तेंदुलकर: देश की विडंबना देखिए, जिन हस्तियों को राष्ट्र ने ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया, वे अब देश की करोड़ों युवा पीढ़ी को डिजिटल सट्टेबाजी के गर्त में धकेलने वाले ऐप्स का समर्थन कर रहे हैं।

वह व्यक्ति जिसे ‘क्रिकेट का भगवान’ कहा गया, अब उसी देश में युवाओं के बीच आत्महत्या के आंकड़े बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों का ब्रांड एम्बेसडर बन चुका है। क्या हमारी राष्ट्रीय चेतना इतनी शिथिल हो चुकी है कि स्टारडम अब ज़िम्मेदारी से ऊपर हो गया है?

सचिन तेंदुलकर: सट्टेबाजी के दलदल में फंसी 30 करोड़ युवा आबादी

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सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए डॉ. के.ए. पॉल ने बताया कि देश में 30 करोड़ लोग अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी ऐप्स के जाल में फंस चुके हैं। केवल तेलंगाना में ही 1000 से अधिक आत्महत्याएं हो चुकी हैं, जिनका प्रत्यक्ष कारण इन प्लेटफार्मों का प्रभाव है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब “क्रिकेट के भगवान” जैसे आइकॉन खुद इन ऐप्स का प्रचार कर रहे हैं, तो आम युवा क्यों नहीं मानेगा कि ये ऐप्स ‘ठीक’ हैं? यही वह बिंदु है जहां नायकत्व खलनायकत्व में बदल जाता है।

कानून की सीमाएँ और सामाजिक दायित्व

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक कटु यथार्थ को उजागर किया। “जैसे हत्या को आप कानून से नहीं रोक सकते, वैसे ही सट्टेबाजी को भी केवल कानून से नहीं रोका जा सकता।”

यह टिप्पणी दर्शाती है कि समस्या केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट की ओर संकेत करती है। यदि कोई राष्ट्रीय आइकॉन खुद इस नैतिक पतन को ‘ग्लैमराइज’ कर रहा हो, तो उसका प्रभाव किसी कानून से अधिक व्यापक और घातक होगा।

अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है पर जब खुद ब्रांड एम्बेसडर उस गरिमा को गिराने का माध्यम बन जाएं, तो यह केवल नैतिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वासघात है।

सेलिब्रिटी संस्कृति का अंधकारमय पक्ष

आज सोशल मीडिया, विज्ञापन और टीवी के जरिए क्रिकेटर, एक्टर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर युवाओं के लिए दिशा-निर्देशक बन गए हैं। जब यही हस्तियां ऐसे एप्स का प्रचार करती हैं जो जुए और लालच पर आधारित हैं, तो उनका यह कृत्य केवल ‘पेड प्रमोशन’ राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है।

तेलंगाना पुलिस पहले ही 25 से अधिक सेलिब्रिटीज पर एफआईआर दर्ज कर चुकी है। पर कहीं यह केवल कानूनी कार्रवाई बनकर न रह जाए?

सचिन की नैतिक विफलता और भारत रत्न की गरिमा पर सवाल

सचिन तेंदुलकर को 2013 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था, जो देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। वह इस सम्मान को प्राप्त करने वाले पहले खिलाड़ी और सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे, लेकिन सट्टेबाजी ऐप्स का प्रचार करके उन्होंने इस सम्मान की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।

एक भारत रत्न प्राप्तकर्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बने, न कि ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बने, जो युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाएं। सचिन की यह हरकत न केवल उनके प्रशंसकों के लिए निराशाजनक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि व्यक्तिगत लाभ के लिए वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भूल गए हैं।

सचिन की नेटवर्थ लगभग 1,436 करोड़ रुपये (175 मिलियन डॉलर) बताई जाती है, और वह विज्ञापनों से हर साल 20-40 करोड़ रुपये कमाते हैं। इतनी विशाल संपत्ति और आय के बावजूद, सट्टेबाजी जैसे विवादास्पद ऐप्स का प्रचार करना उनकी लालच और नैतिक पतन को दर्शाता है।

यह एक दुखद विडंबना है कि जिस व्यक्ति ने अपने क्रिकेट करियर में अनुशासन, समर्पण और मेहनत का परिचय दिया, वह रिटायरमेंट के बाद ऐसी गतिविधियों में लिप्त है, जो समाज को नुकसान पहुंचा रही हैं।

अन्य सेलिब्रिटीज और सट्टेबाजी ऐप्स का प्रचार

सचिन अकेले नहीं हैं जो सट्टेबाजी और गेमिंग ऐप्स का प्रचार कर रहे हैं। कई अन्य प्रमुख हस्तियां भी इस गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार में शामिल हैं। तेलंगाना पुलिस ने 25 बॉलीवुड और टॉलीवुड अभिनेताओं और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जो इन ऐप्स का प्रचार कर रहे हैं। इनमें से कुछ प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं।

विराट कोहली

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और एक वैश्विक आइकन, विराट कोहली ने भी Mobile Premier League (MPL) जैसे फंतासी गेमिंग ऐप्स का समर्थन किया है और इनमें निवेश भी किया है।

MPL एक ऐसा प्लेटफार्म है, जो उपयोगकर्ताओं को क्रिकेट और अन्य खेलों पर दांव लगाने की सुविधा देता है, और इसे जुए का एक रूप माना जाता है।

रजत शर्मा

प्रसिद्ध पत्रकार और इंडिया टीवी के चेयरमैन, रजत शर्मा ने Dream11 का प्रचार किया है, जो भारत में सबसे बड़े फंतासी स्पोर्ट्स ऐप्स में से एक है। Dream11 का विज्ञापन बजट 2019 में 800 करोड़ रुपये था, जो इसे देश के शीर्ष विज्ञापनदाताओं में से एक बनाता है।

अजय देवगन और शाहरुख खान

इन बॉलीवुड सितारों ने भी Dream11 और अन्य समान ऐप्स का प्रचार किया है, जिससे युवाओं को इन प्लेटफार्मों पर आकर्षित करने में मदद मिली है।

शिखर धवन और हार्दिक पंड्या

ये क्रिकेटर भी Dream11 और अन्य गेमिंग ऐप्स के विज्ञापनों में दिखाई दिए हैं, जिससे इन ऐप्स की विश्वसनीयता बढ़ती है। इन सभी हस्तियों का प्रभाव लाखों लोगों, खासकर युवाओं पर पड़ता है, जो इन ऐप्स को सुरक्षित और वैध मानकर इनमें पैसा निवेश करते हैं।

लेकिन वास्तव में, ये ऐप्स जुए का एक रूप हैं, जो न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डालते हैं।

राज्य सरकारों की जिम्मेदारी और कोटा आत्महत्याएं

राजस्थान के कोटा शहर में पढ़ाई के तनाव और डिजिटल व्यसनों की दोहरी मार झेल रहे बच्चों की आत्महत्याएं भी इसी विमर्श से जुड़ी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जब राज्य सरकार से पूछा कि इतनी आत्महत्याएं सिर्फ कोटा में क्यों हो रही हैं, तो उसका जवाब था, हमने फन डे एक्टिविटी से लेकर हॉस्टल विजिट्स और मां-बच्चे की बैठकें शुरू की हैं।

लेकिन क्या ये उपाय तब तक कारगर होंगे, जब तक सट्टेबाजी जैसे ‘नरसंहारक’ व्यसनों को प्रोत्साहन मिलता रहेगा?

कहां है सामूहिक नैतिक चेतना?

क्या अब इस राष्ट्र को एक नया ‘सांस्कृतिक आंदोलन’ चाहिए। जो विज्ञापन की दुनिया में नैतिकता की पुनर्स्थापना करे? जब पैसा नाम और जिम्मेदारी पर भारी पड़ जाए, तब राष्ट्र को स्वयं तय करना होता है कि वह किसे पूजे और किसे त्यागे।

यह लेख किसी एक व्यक्ति की निंदा नहीं, बल्कि उस सोच पर प्रहार है जो यह मानती है कि लोकप्रियता आपको नैतिकता से ऊपर उठा देती है। भारत रत्न होना सिर्फ पुरस्कार नहीं, जिम्मेदारी है, और जब यह जिम्मेदारी त्याग दी जाती है, तो देश की आत्मा घायल होती है।

किसी को स्टार बनाने से पहले सोचना जरूरी है

यह वक्त है जब भारत अपने नायकों की नई परिभाषा तय करे। क्रिकेट खेलना महान कार्य हो सकता है, पर सट्टेबाजी ऐप का प्रचार करना नैतिक पतन ही नहीं बल्कि 30 करोड़ युवा मनों को जहर पिलाना है।

अगर सचिन तेंदुलकर जैसे लोग इस पीढ़ी का पथप्रदर्शन करेंगे, तो फिर कौन उन्हें पतन से बचाएगा?

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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