श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट
श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट में जो गड़बड़ी का जो मामला आया है, तो यह श्रीरामलला की कृपा है कि ऐसी कोई भी हेराफेरी अभी मंदिर बनने के कुछ ही दिनों में सामने आ गयी। इससे अब आगे मन्दिर में सतर्कता व निगरानी बढ़ेगी और व्यवस्था सुदृढ होगी। तिरुपति की तरह सालों तक चर्बी वाले लड्डू जैसा घोटाला यहां सम्भव नहीं होगा।
ट्रस्ट के गठन हुए 5-6 वर्ष हुए हैं, इसमें विराट स्तर पर श्रीरामजन्मभूमि का इतना भव्य व दिव्य निर्माण हुआ जो कि योग्य लोगों की व्यापक दृष्टि के बिना सम्भव नहीं था। शीघ्र निर्माण क्यों? सत्ता नश्वर है। अभी हिन्दुत्व की सत्ता है तो यह उचित है कि तुरन्त ही किले इतने ऊंचे, इतने मजबूत बना दिये जाएं कि भेड़िए चढ़ाई का स्वप्न न पाल सकें।।
इसलिए मंदिर को द्रुतगति से पूर्णता की ओर पहुँचाया गया। यह कार्य किसने किया? तो ट्रस्ट के सदस्यों ने ऐसी व्यवस्था निर्मित की कि बिना किसी बाधा के कार्य शीघ्र हो व श्रेष्ठ हो। जब कार्य में शीघ्रता होती है तो कुछ व्यवस्थाएं बन नहीं पाती हैं, कुछ शिथिलताएँ आ जाती हैं, अन्यथा धीरे धीरे एक कार्य को कथित पूर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वर्षों तक खींचा जा सकता है। जितनी ज्यादा कागजबाजी उतना अधिक समय। किसी का मकान बन रहा हो और मुहूर्त्त सामने तो तब कितनी तेजी से काम करवाते हैं। उसमें पैसा भी कुछ ज्यादा खर्च हो जाता है। कुछ कमी रह ही जाती हैं। पर महत्त्व मुहूर्त्त का है। कनागतों में महल भी खड़ा हो जाए तो उसका मुहूर्त्त नहीं होता, लोग चाहते हैं अधूरा ही सही पर अक्षयतृतीया पर ही मुहूर्त्त हो जाए।
अयोध्या में सीधे प्रधानमंत्री जी व मुख्यमंत्री जी के निरन्तर मार्गदर्शन में दिव्य भव्य राममंदिर भी बना, प्राणप्रतिष्ठा भी हुई व व्यापक विकास हो रहा है। श्रीरामजन्मभूमि में परिंदा भी पर नहीं मार सकता, गोरक्षपीठाधीश्वर महान्त श्री योगी आदित्यनाथजी महाराज ने अनेक अवसरों पर यह बात कही है। परन्तु श्रीरामजन्मभूमि की राम रसोई में कुछ चूहे कुछ कट्टे अनाज के कुतर गए हैं। क्योंकि रामरसोई में पुलिस नहीं लगाई जाती। क्या परिवार वालों पर शक किया जाता है। ट्रस्ट में कुछ अनियमितताएँ सामने आईं हैं।
चंपत राय जी पर पिले पड़े हैं कुछ लोग। इतना दिव्य भव्य मंदिर बनवाने के लिए जीवन समर्पित करने में चंपत राय का यह स्वार्थ था कि जब मंदिर बनेगा तो कुछ लाख चोरी कर लूंगा ? कई दुष्ट कह रहे हैं नाम ही चंपत है। तो चंपत राय राष्ट्रकार्य के लिए घर से एक बार ही चंपत हुए थे। कौड़ियां बीनने का जिसे मौका नहीं मिला वह सन्तों को चोर बता रहा है। यह चंपत राय जी जब कह रहे थे चांदी लौटाते हुए कि ये सब ले जाओ इन्हें कहाँ रखूंगा? मंदिर में रखने की जगह नहीं है। तब बहुतों ने खरीखोटी सुनाई थी उन्हें, कि भक्त तो प्रेम से ला रहे हैं और चंपत राय नहीं रखने की बात कर रहे हैं। जिसके मन में चोर होगा भला वह क्यों सोना चांदी लौटाने लगा। शायद तब उन्हें पता चल गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, और उस व्यवस्था में छेड़छाड़ सम्भव नहीं रही होगी। बनते मकान में कितना काम फैला रहता है, लगातार एक मिनट कभी काम रुका नहीं है वहां।
मनुष्य का स्वार्थ, लोभ, स्वबोधहीनता, अधिकार की भावना ही यह सब दुर्गुण हावी होकर ऐसा अनर्थ कर डालते हैं। हमारी नाव वहीं डूबी जहां पानी कम था। डूबी नहीं परन्तु कीचड़ में कूद रहे हैं। कुछ लोग ऐसा समझ रहे हैं कि 2 G जैसा एक लाख 76000 करोड़ का घोटाला हो गया है। अनियमितता हुई है, छीना झपटी कह सकते हैं, जैसे पंगत में किसी को ज्यादा गुलाबजामुन खालेने की लालसा हो जाए और वह व्यवस्था को भंग कर डाले। जितना भव्य दिव्य मंदिर बना है वही अरबों का है और लगातार उसका आकार व व्यवस्थाएं बढ़ती जा रही हैं, हिसाब और चीजें जो कुछ बिखरी हैं वह सब फिर सही होंगी, एकत्रित होंगी।
कोई कोई तो ऐसा मिथ्या भाव पाले होगा कि ऐसा कुछ करते समय उसे गलत लगा ही नहीं होगा, वह इसे धर्म के कार्य में ही include कर ले रहा होगा, कोई इसे पूर्व में किए कार्य की बख्शीश ही समझ ले रहा होगा, कोई इसे अपना घर ही समझ ले रहा होगा। ऐसे भ्रान्त मत से मुक्ति कैसे हो। सच्चे रामभक्त तो कहते हैं, “देने वाले राम प्रभु से धन और दौलत क्या मांगे, मांगें भी तो राम प्रभु से मान और इज्जत क्या मांगें, देना हो तो दीजिए जन्म जन्म का साथ।”
हर कार्य में लापरवाही, उसका मूल्य महत्त्व न समझने की भावना, दीर्घदृष्टि का घोर अभाव, राष्ट्रभावना की विस्मृति, यह समाज के स्थायी दुर्गुण बन गए हैं, इसलिए जहां देखो वहां दोष मिल जा रहा है, कुछ भी fullproof नहीं बन पा रहा। एक ऐसी कृति जो ओस के जल की तरह निर्दोष हो, कृति जो अग्नि की तरह पवित्र हो, हम यदि विश्व को नहीं दे सकते तो हम विश्वगुरु नहीं बन सकते।

