राजस्थान निकाय चुनाव: राजस्थान में आगामी नगर निकाय और पंचायत चुनावों से पहले अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC आरक्षण को लेकर बड़ी खबर सामने आई है।
राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है।
अब इस रिपोर्ट को राज्य मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा, जहां मंजूरी मिलने के बाद इसके आधार पर आगे की चुनावी प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है।
आयोग की रिपोर्ट में स्थानीय स्तर पर आबादी के अनुपात और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए OBC आरक्षण का एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया गया है, जिससे कुल आरक्षण की सीमा कानूनी दायरे में बनी रहे।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण अधिकतम 21 प्रतिशत तक हो सकता है। हालांकि, यह प्रतिशत सभी नगर निकायों और पंचायतों में एक समान नहीं होगा।
SC-ST आबादी के आधार पर बदलेगा OBC आरक्षण
रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि OBC आरक्षण के लिए पूरे राजस्थान में एक ही प्रतिशत लागू करने के बजाय स्थानीय आबादी के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।
जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी अधिक है, वहां OBC आरक्षण को उसी अनुपात में कम किया जाएगा।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि SC, ST और OBC आरक्षण को मिलाकर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की कानूनी सीमा से ऊपर न जाए।
ऐसे स्थानीय निकायों में जहां SC और ST के लिए पहले से ही आरक्षण का बड़ा हिस्सा निर्धारित है, वहां OBC आरक्षण घटकर 5 प्रतिशत तक भी पहुंच सकता है।
वहीं जिन क्षेत्रों में SC और ST के लिए आरक्षण कम है और 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर पर्याप्त जगह उपलब्ध है, वहां OBC को अधिकतम 21 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जा सकेगा।
इस तरह आयोग ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आरक्षण तय करने के लिए एक स्लाइडिंग स्केल यानी आबादी के हिसाब से बदलने वाला फॉर्मूला सुझाया है।
राजस्थान में OBC आबादी करीब 44 से 45 प्रतिशत
आयोग की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों के अनुसार राजस्थान की कुल आबादी में OBC वर्ग की हिस्सेदारी करीब 44 से 45 प्रतिशत मानी गई है। यानी राज्य की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अन्य पिछड़ा वर्ग से आता है।
हालांकि, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण तय करते समय केवल कुल आबादी को आधार नहीं बनाया जा सकता।
स्थानीय निकायों में आरक्षण निर्धारित करने के दौरान SC और ST के लिए लागू आरक्षण और सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित कुल आरक्षण सीमा का भी ध्यान रखना जरूरी है।
इसी वजह से आयोग ने पूरे राज्य में OBC के लिए एक समान 21 प्रतिशत आरक्षण देने के बजाय स्थानीय निकायवार आंकड़ों के आधार पर आरक्षण तय करने की सिफारिश की है।
क्या है आयोग की मुख्य सिफारिश?
आयोग की प्रस्तावित व्यवस्था को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में समझा जा सकता है।
अधिकतम 21 प्रतिशत आरक्षण: जिन स्थानीय निकायों में SC और ST के लिए आरक्षण निर्धारित करने के बाद 50 प्रतिशत की कुल सीमा के भीतर पर्याप्त जगह बचती है, वहां OBC आरक्षण अधिकतम 21 प्रतिशत तक रखा जा सकता है।
आबादी के अनुसार आरक्षण में कमी: जिन नगर निकायों और पंचायतों में SC और ST की आबादी अधिक है, वहां OBC के लिए निर्धारित आरक्षण को कम किया जाएगा, ताकि सभी आरक्षणों का कुल योग कानूनी सीमा के भीतर रहे।
न्यूनतम 5 प्रतिशत तक आरक्षण: ऐसे क्षेत्रों में जहां SC और ST के लिए आरक्षण का हिस्सा काफी अधिक है, वहां OBC आरक्षण घटकर करीब 5 प्रतिशत तक किया जा सकता है।
आयोग का मानना है कि इस व्यवस्था से अलग-अलग सामाजिक वर्गों को स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व देने के साथ-साथ आरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों का भी पालन किया जा सकेगा।
दूसरे राज्यों के मॉडल का भी किया गया अध्ययन
राजस्थान OBC आयोग ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के दौरान दूसरे राज्यों में लागू आरक्षण व्यवस्था और वहां किए गए सामाजिक एवं अनुभवजन्य अध्ययनों का भी अध्ययन किया।
आयोग ने विभिन्न राज्यों में गठित आयोगों की रिपोर्ट, स्थानीय निकायों में आबादी के आंकड़े और आरक्षण से जुड़े कानूनी पहलुओं को आधार बनाकर राजस्थान के लिए अलग मॉडल तैयार किया है।
इस अध्ययन में उत्तराखंड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की व्यवस्थाओं को विशेष रूप से देखा गया।
उत्तराखंड में 27 प्रतिशत OBC मतदाता उपस्थिति का आकलन
उत्तराखंड में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बी.एस. वर्मा की अध्यक्षता वाले आयोग ने शहरी स्थानीय निकायों में
OBC आबादी और मतदाता उपस्थिति का अध्ययन किया था। रिपोर्ट में OBC की हिस्सेदारी करीब 27 प्रतिशत के आसपास बताई गई थी।
इस आधार पर स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण को पहले लागू 14 प्रतिशत की सीमा से आगे बढ़ाने की सिफारिश की गई थी।
इसमें महापौर, नगर निकायों के अध्यक्ष और वार्ड पार्षद जैसे विभिन्न पदों में OBC प्रतिनिधित्व बढ़ाने की व्यवस्था पर भी विचार किया गया।
महाराष्ट्र में 27 प्रतिशत तक आरक्षण का मॉडल
महाराष्ट्र में गठित बंठिया आयोग ने स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण के लिए आबादी से जुड़े आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन किया।
आयोग ने नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों में OBC उम्मीदवारों के लिए 27 प्रतिशत तक आरक्षण की सिफारिश की थी।
हालांकि, वहां भी यह शर्त महत्वपूर्ण रखी गई कि SC, ST और OBC को मिलाकर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।
राजस्थान आयोग ने महाराष्ट्र के इस मॉडल का भी अध्ययन किया और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसकी उपयोगिता को समझने की कोशिश की।
छत्तीसगढ़ में OBC आबादी 41 से 42.41 प्रतिशत
छत्तीसगढ़ के आंकड़ों में OBC आबादी करीब 41 से 42.41 प्रतिशत के बीच बताई गई है। इसके अलावा राज्य में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS की हिस्सेदारी करीब 3.48 प्रतिशत बताई गई।
वहां की सिफारिशों में स्थानीय निकाय चुनावों में OBC आरक्षण बढ़ाने की संभावना पर विचार किया गया था।
हालांकि, यह व्यवस्था इस शर्त से जुड़ी थी कि संबंधित क्षेत्र में SC और ST के लिए पहले से निर्धारित आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा तक नहीं पहुंचा हो।
इस मॉडल में भी स्थानीय आबादी और मौजूदा आरक्षण के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया गया था।
मध्य प्रदेश में OBC आबादी 51 प्रतिशत से अधिक
मध्य प्रदेश OBC कल्याण आयोग के आंकड़ों के अनुसार राज्य की कुल आबादी में OBC वर्ग की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
हालांकि, आयोग के अध्ययन में यह भी सामने आया कि आबादी में बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद OBC वर्ग की उच्च शिक्षा और शीर्ष प्रशासनिक पदों में भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है।
उदाहरण के तौर पर, कुछ उच्च शैक्षणिक स्तरों पर OBC प्रतिनिधित्व काफी कम पाया गया।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए स्थानीय और राजनीतिक संस्थाओं में OBC प्रतिनिधित्व बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
राजस्थान ने अलग मॉडल क्यों तैयार किया?
राजस्थान में OBC आरक्षण को लेकर तैयार किया गया मॉडल दूसरे राज्यों की व्यवस्था की हूबहू नकल नहीं है।
आयोग ने अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों और अनुभवों का अध्ययन करने के बाद राजस्थान की सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के अनुसार अपना फॉर्मूला तैयार किया है।
गुजरात समेत कुछ अन्य राज्यों में भी OBC आरक्षण से संबंधित अध्ययन और रिपोर्ट तैयार की गई हैं, लेकिन उनमें से कुछ रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में राजस्थान आयोग ने उपलब्ध आंकड़ों और सार्वजनिक रिपोर्टों को आधार बनाकर अपनी सिफारिशें तैयार की हैं।
स्थानीय निकाय चुनावों पर क्या पड़ेगा असर?
आयोग की रिपोर्ट आने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण चरण राज्य सरकार की मंजूरी का है।
रिपोर्ट को राज्य मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा। कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद स्थानीय निकायों में वार्डवार आरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी।
नगर निकायों और पंचायतों में किस वार्ड को किस वर्ग के लिए आरक्षित किया जाएगा, इसके लिए नए आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा।
इसके बाद वार्डों के आरक्षण का निर्धारण और आरक्षण की लॉटरी जैसी प्रक्रियाएं पूरी की जा सकती हैं।
नई व्यवस्था लागू होने से पहले इस्तेमाल किए जा रहे पुराने आंकड़ों की जगह ताजा सर्वेक्षण और स्थानीय जनसंख्या से
जुड़े आंकड़ों को आधार बनाए जाने की संभावना है। इससे प्रत्येक स्थानीय निकाय में सामाजिक संरचना के अनुसार आरक्षण तय करने में मदद मिलेगी।
चुनावी समीकरणों में भी हो सकता है बदलाव
OBC आरक्षण का नया फॉर्मूला लागू होने के बाद आगामी नगर निकाय और पंचायत चुनावों के राजनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।
अलग-अलग क्षेत्रों में OBC आरक्षण का प्रतिशत अलग होने की वजह से कई वार्डों और सीटों की श्रेणी बदल सकती है।
राजनीतिक दल भी आरक्षण की अंतिम सूची जारी होने का इंतजार कर रहे हैं। सीटों का आरक्षण स्पष्ट होने के बाद ही कई क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवारों को लेकर तस्वीर साफ हो सकेगी।
50 प्रतिशत की सीमा का रखा गया विशेष ध्यान
पूरी कवायद में सबसे अहम मुद्दा कुल आरक्षण की कानूनी सीमा है। आयोग ने ऐसा फॉर्मूला तैयार करने की कोशिश की है जिसमें SC, ST और OBC के लिए आरक्षण का कुल हिस्सा निर्धारित सीमा से ऊपर न जाए।
इसी वजह से OBC के लिए अधिकतम सीमा 21 प्रतिशत प्रस्तावित किए जाने के साथ-साथ कुछ क्षेत्रों में इसे घटाकर 5 प्रतिशत तक रखने का प्रावधान सुझाया गया है।
यानी किसी स्थानीय निकाय में OBC आरक्षण वहां की SC और ST आबादी तथा पहले से लागू आरक्षण के आधार पर तय होगा।
अब कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार
राजस्थान में OBC राजनीतिक आरक्षण को लेकर आयोग की रिपोर्ट तैयार होने के बाद अब सभी की नजर राज्य सरकार पर है।
कैबिनेट से रिपोर्ट को मंजूरी मिलने के बाद ही इसकी सिफारिशों के आधार पर आगे की प्रशासनिक और चुनावी प्रक्रिया शुरू होगी।
अगर प्रस्तावित फॉर्मूला लागू होता है, तो राजस्थान के स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण पहली बार इतनी स्पष्ट रूप से स्थानीय जनसंख्या और SC-ST आरक्षण के साथ जोड़कर तय किया जाएगा।
इससे पंचायतों और नगर निकायों के चुनाव में आरक्षित सीटों की तस्वीर बदल सकती है और राजनीतिक दलों को भी अपनी चुनावी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी पड़ सकती है।

