Leptospirosis: बारिश का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है, वहीं अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी लेकर आता है।
खासकर उन लोगों के लिए खतरा ज्यादा बढ़ जाता है, जो खेतों, बगीचों, नालियों, सीवर या जलभराव वाले इलाकों में काम करते हैं।
केरल में इन दिनों लेप्टोस्पायरोसिस को लेकर चिंता बढ़ी हुई है। इसे आम भाषा में ‘रैट फीवर’ भी कहा जाता है। यह एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो बारिश और बाढ़ के दौरान तेजी से फैलने का खतरा रखता है।
सरकारी डेथ ऑडिट के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में केरल में लेप्टोस्पायरोसिस से जुड़ी मौतों में मेहनत-मजदूरी करने वाले लोगों की संख्या काफी ज्यादा रही।
अस्पतालों के रिकॉर्ड से तैयार किए गए आंकड़ों में कुल 390 मौतों का जिक्र है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जिनका काम उन्हें मिट्टी, पानी या खुले वातावरण के लगातार संपर्क में रखता है।
कृषि मजदूरों और घरेलू काम करने वाली महिलाओं में भी संक्रमण से मौत के मामले सामने आए।
आंकड़ों में 40 से 69 साल की उम्र के लोगों में बीमारी का असर अधिक देखने को मिला।
हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लेप्टोस्पायरोसिस से होने वाली मौतों की वास्तविक संख्या सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़ों से ज्यादा हो सकती है।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बीमारी के शुरुआती लक्षण कई सामान्य वायरल संक्रमणों जैसे दिखाई देते हैं। ऐसे में कुछ मामलों में सही बीमारी की पहचान समय पर नहीं हो पाती।
लेप्टोस्पायरोसिस को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
डेंगू और अन्य मौसमी बीमारियों की चर्चा के बीच लेप्टोस्पायरोसिस पर अक्सर उतना ध्यान नहीं जाता, लेकिन केरल के स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
केरल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में संक्रमण से होने वाली मौतों में लेप्टोस्पायरोसिस की हिस्सेदारी चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बीमारी की सही पहचान अगर शुरुआती चरण में हो जाए और मरीज को समय पर उचित इलाज मिल जाए तो गंभीर परिणामों और मौत के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यही वजह है कि मानसून के दौरान बुखार और शरीर में तेज दर्द जैसे लक्षणों को सामान्य वायरल फीवर मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
पांच साल में तेजी से बढ़ीं मौतें
केरल में पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े भी इस बीमारी के बढ़ते खतरे की ओर इशारा करते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से 2020 के बीच लेप्टोस्पायरोसिस से 319 मौतें दर्ज की गई थीं।
वहीं 2021 से 2025 के बीच यह संख्या बढ़कर 1,455 तक पहुंच गई। इसी अवधि में बीमारी की मृत्यु दर में भी बढ़ोतरी देखने को मिली।
संक्रमण के मामलों की संख्या में भी पिछले वर्षों के मुकाबले काफी वृद्धि हुई है। केरल में हर साल मानसून के दौरान भारी बारिश, जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियां बनती हैं।
ऐसे हालात में दूषित पानी और गीली मिट्टी के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे लेप्टोस्पायरोसिस के फैलने का खतरा भी बढ़ सकता है।
2026 में भी बना हुआ है खतरा
लेप्टोस्पायरोसिस का खतरा इस साल भी कम नहीं हुआ है। डायरेक्टरेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज के आंकड़ों के अनुसार,
29 जुलाई 2026 तक केरल में बीमारी के 1,352 कन्फर्म मामले सामने आ चुके थे और 58 मौतें दर्ज की गई थीं।
स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग जोखिम वाले कामगारों की सुरक्षा पर जोर दे रहा है।
स्थानीय निकायों के साथ-साथ कृषि और श्रम विभाग के सहयोग से ऐसे लोगों तक बचाव की जानकारी पहुंचाने पर ध्यान दिया जा रहा है,
जिनका काम उन्हें बारिश के दौरान दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में ला सकता है।
बीमारी की रोकथाम और शुरुआती इलाज से जुड़े दिशानिर्देशों को भी बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है।
कुछ परिस्थितियों में जोखिम वाले लोगों के लिए डॉक्सीसाइक्लिन जैसी दवाओं के इस्तेमाल पर स्वास्थ्य विभाग की गाइडलाइन में चर्चा की जाती है।
हालांकि एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल खुद से नहीं करना चाहिए। डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के बाद ही किसी दवा का सेवन किया जाना चाहिए।
क्या है लेप्टोस्पायरोसिस?
लेप्टोस्पायरोसिस एक बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो Leptospira नाम के बैक्टीरिया के कारण होता है। चूहे और कुछ दूसरे संक्रमित जानवर इस बैक्टीरिया के वाहक हो सकते हैं। संक्रमित जानवरों के पेशाब के जरिए बैक्टीरिया पानी और मिट्टी में पहुंच सकता है।
बारिश और बाढ़ के दौरान यह समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है। जब दूषित पानी आसपास फैलता है तो खेतों, बगीचों, सड़कों और घरों के आसपास की मिट्टी भी संक्रमित हो सकती है। इस पानी या मिट्टी के संपर्क में आने पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
शरीर में कैसे पहुंचता है बैक्टीरिया?
दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने के दौरान लेप्टोस्पायरा बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर सकता है।
खासतौर पर अगर त्वचा पर कोई कट या घाव हो तो संक्रमण की संभावना बढ़ सकती है। इसके अलावा आंख, नाक या मुंह के जरिए भी बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर सकता है।
यही कारण है कि खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर, बगीचे में काम करने वाले लोग, सफाईकर्मी और जलभराव या बाढ़ वाले इलाकों में काम करने वाले लोगों को मानसून के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
शुरुआत में कैसे पहचानें?
लेप्टोस्पायरोसिस के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं। व्यक्ति को अचानक तेज बुखार आ सकता है और सिरदर्द के साथ शरीर में दर्द महसूस हो सकता है।
खासकर पिंडलियों की मांसपेशियों में तेज दर्द इस संक्रमण में देखा जा सकता है। इसके साथ ठंड लगना, कमजोरी, अत्यधिक थकान, मतली और उल्टी जैसी परेशानी भी हो सकती है।
कुछ लोगों की आंखें लाल दिखाई दे सकती हैं। यही वजह है कि केवल लक्षण देखकर बीमारी की पहचान करना हमेशा आसान नहीं होता।
अगर मानसून के दौरान बुखार के साथ व्यक्ति का दूषित पानी, बाढ़ के पानी, गीली मिट्टी या खेत में काम करने का इतिहास रहा है, तो डॉक्टर को यह जानकारी जरूर देनी चाहिए।
गंभीर होने पर क्या हो सकता है?
समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर लेप्टोस्पायरोसिस गंभीर रूप ले सकता है।
कुछ मामलों में संक्रमण किडनी और लिवर जैसे महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है। पीलिया, सांस लेने में परेशानी और शरीर में गंभीर जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं।
इसलिए लंबे समय तक बुखार रहने या लक्षणों के बिगड़ने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
खासकर ऐसे व्यक्ति में जिसने हाल ही में बाढ़ के पानी, गंदे पानी या संक्रमित मिट्टी के संपर्क में काम किया हो, डॉक्टर को पूरी जानकारी देना जरूरी है।
बारिश में क्यों बढ़ जाता है खतरा?
मानसून के दौरान भारी बारिश के कारण नालियों, सीवर और जमीन का दूषित पानी आसपास फैल सकता है।
बाढ़ या जलभराव की स्थिति में यह पानी लंबे समय तक जमा भी रह सकता है। जब लोग इस पानी में चलते हैं या उसमें काम करते हैं तो त्वचा और दूषित पानी के बीच संपर्क बढ़ जाता है।
अगर शरीर पर पहले से कोई कट या घाव मौजूद है तो संक्रमण का खतरा और बढ़ सकता है।
इसलिए बारिश के मौसम में खेत, बगीचे, नालियों या जलभराव वाले स्थानों पर काम करते समय सावधानी रखना बेहद जरूरी है।
लेप्टोस्पायरोसिस से कैसे बचें?
सबसे पहले कोशिश करें कि बाढ़ या संदिग्ध रूप से दूषित पानी के संपर्क में आने से बचा जाए।
अगर किसी कारण से पानी में उतरना जरूरी हो तो उचित सुरक्षा उपकरण जैसे गमबूट और दस्ताने पहनना मददगार हो सकता है।
हाथ या पैर पर कट और घाव हो तो उन्हें साफ करके अच्छी तरह ढककर रखना चाहिए।
घर और आसपास चूहों की मौजूदगी को नियंत्रित करना भी जरूरी है।
जलभराव या बाढ़ वाले क्षेत्र में काम करने के बाद हाथ-पैर और शरीर को साफ पानी और साबुन से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। कपड़ों और जूतों की भी सफाई पर ध्यान देना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानसून के दौरान तेज बुखार को सिर्फ सामान्य मौसमी बुखार समझकर नजरअंदाज न करें।
अगर बुखार के साथ शरीर में तेज दर्द है और हाल ही में बाढ़ के पानी, गंदे पानी, खेत या गीली मिट्टी के संपर्क में आए हैं, तो जल्द से जल्द डॉक्टर से सलाह लें और उन्हें अपने संपर्क की पूरी जानकारी दें।
सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव
लेप्टोस्पायरोसिस से बचने के लिए दूषित पानी और मिट्टी के संपर्क को जितना संभव हो कम रखना जरूरी है।
मानसून में काम करने वाले लोगों को सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करना चाहिए और किसी भी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
रैट फीवर का इलाज संभव है, लेकिन बीमारी की पहचान और उपचार में देरी होने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।
इसलिए बारिश के मौसम में बुखार के साथ अगर दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क का इतिहास है, तो समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना सबसे समझदारी भरा कदम है

