Wednesday, January 21, 2026

भगवंत मान ने पंजाब को बाढ़ में धकेला! सरकार की जिद बनी जनता के लिए अभिशाप!

पंजाब में आई भयंकर बाढ़ ने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया है। इस त्रासदी के पीछे पंजाब सरकार का एक गलत फैसला उजागर हो रहा है।

भाखड़ा बांध प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) ने अप्रैल 2025 में समय रहते पानी छोड़ने की सलाह दी थी, लेकिन सरकार ने इसे राजनीतिक कारणों से ठुकरा दिया।

बीबीएमबी की चेतावनी, सरकार का इनकार

विशेषज्ञों ने अप्रैल में साफ कहा था कि 4,300 क्यूसेक पानी छोड़ा जाए, ताकि बांध का स्तर सुरक्षित रहे। चेतावनी दी गई थी कि बारिश बढ़ने पर खतरा कई गुना हो सकता है।

लेकिन पंजाब सरकार ने यह कहकर इस सुझाव को रोका कि पानी सिर्फ पंजाब के हित में इस्तेमाल होगा, न कि हरियाणा या राजस्थान को दिया जाएगा।

मंत्री की धमकी और राजनीतिक अहंकार

मामले ने तब और विवाद खड़ा किया जब पंजाब के एक मंत्री ने खुलेआम बांध पर कब्जा करने की धमकी दी। यह रवैया सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना पॉलिटिकल अहंकार है।

पड़ोसी राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धा में पंजाब सरकार ने एक्सपर्ट्स की बात को नजरअंदाज किया और नतीजा आज सामने है।

बेकाबू हालात में छोड़ा गया 20,000 क्यूसेक पानी

अब जब बारिश लगातार बढ़ी, तो बांध से 20,000 क्यूसेक से ज्यादा पानी छोड़ना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि पंजाब के बड़े हिस्से पानी में डूब गए।

गांव-गांव में तबाही मच गई और हजारों लोग बेघर हो गए। अगर समय रहते कम मात्रा में पानी छोड़ा जाता, तो यह हालात पैदा ही नहीं होते।

फसलों और घरों का भारी नुकसान

रिपोर्ट्स के अनुसार, सिर्फ फसलों का नुकसान 50,000 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। किसान, जिनके हित की दुहाई सरकार हमेशा देती रही, सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

घर ढह गए, मवेशी बह गए और लोगों को पलायन करना पड़ा। बाढ़ का सबसे बड़ा बोझ आम जनता पर पड़ा है।

जनता की कीमत पर सरकार की राजनीति

यह घटना साफ करती है कि पंजाब सरकार ने शॉर्ट-टर्म पॉलिटिकल फायदे के लिए लॉन्ग-टर्म सेफ्टी की अनदेखी की।

एक्सपर्ट्स की राय को ठुकराना, पड़ोसी राज्यों से राजनीतिक टकराव को तरजीह देना और जनता के हित को ताक पर रखना, सबने मिलकर राज्य को इस तबाही तक पहुंचा दिया।

सीख: विज्ञान और तर्क से ही बच सकती है त्रासदी

भारी नुकसान झेल रही पंजाब की जनता आज सरकार की गलती का खामियाजा भुगत रही है।

यह सबक है कि प्रशासनिक फैसले राजनीति से परे विज्ञान, तकनीक और दूरदर्शिता पर आधारित होने चाहिए।

वरना ऐसे हालात भविष्य में और भी बड़े संकट का कारण बन सकते हैं।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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