Tuesday, July 21, 2026

बचपन हो रहा लंबा, बदलती परवरिश से बच्चों का धीमा विकास

लंबा होता बचपन

कम उम्र में शुरू हो जाती थीं जिम्मेदारियां

बहुत पुरानी बात नहीं है। कुछ दशक पहले तक समाज में तेरह या चौदह वर्ष के किशोरों को पारिवारिक जिम्मेदारियों के योग्य समझ लिया जाता था। उनसे घर, खेती, व्यापार और परिवार से जुड़े कार्यों में सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा भी होने लगती थी।

आज से केवल चालीस या पचास वर्ष पहले की पीढ़ी में अनेक लोगों का विवाह तेरह, चौदह या पंद्रह वर्ष की आयु में हो जाता था। अठारह वर्ष तक पहुंचते पहुंचते वे परिवार, आजीविका और सामाजिक दायित्वों का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर चुके होते थे।

यह व्यवस्था उचित थी या अनुचित, यह अलग विमर्श है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उस समय बच्चों को बहुत जल्दी जिम्मेदार बना दिया जाता था। वर्तमान शहरी और मध्यम वर्गीय समाज में इसके विपरीत वयस्कता लगातार आगे खिसकती दिखाई दे रही है।

कानूनी उम्र और सामाजिक मानसिकता

आज चौदह, पंद्रह या सोलह वर्ष का किशोर प्रायः परिवार की दृष्टि में पूर्णतः बच्चा ही बना रहता है। मध्यम वर्गीय भारतीय परिवारों में अठारह से बीस वर्ष के युवक को भी निर्णय लेने और जिम्मेदारी संभालने योग्य नहीं समझा जाता।

कानून ने वयस्कता के लिए एक निश्चित आयु निर्धारित की है, लेकिन अनेक परिवारों ने कानूनी सीमा को मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक परिपक्वता का अंतिम मानक मान लिया है। परिणामस्वरूप युवाओं को स्वतंत्र जीवन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया देर से शुरू होती है।

समस्या कानूनी आयु निर्धारित होने में नहीं, बल्कि उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू कर देने में है। जैविक रूप से युवा हो चुका व्यक्ति भी परिवार की निगरानी, संरक्षण और निर्णय व्यवस्था में इस प्रकार रहता है, जैसे उसमें स्वतंत्र उत्तरदायित्व की क्षमता विकसित ही नहीं हुई।

शिक्षा के नाम पर स्थगित होती वयस्कता

माता पिता अपने बच्चों को लंबे समय तक पढ़ाते रहते हैं, लेकिन अक्सर यह तय नहीं कर पाते कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है और किस चरण पर व्यावहारिक जीवन शुरू होना चाहिए। डिग्री, प्रतियोगी परीक्षा और प्रतिष्ठित पेशा वयस्कता की शर्त बन जाते हैं।

कई युवा डॉक्टर, अधिकारी या किसी प्रतिष्ठित पेशेवर पद तक पहुंचने के लिए वर्षों परीक्षाएं देते रहते हैं। परिवार यह मानकर चलता है कि जब तक निश्चित नौकरी या पद नहीं मिल जाता, तब तक बच्चे पर आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारी डालना उचित नहीं है।

इस व्यवस्था में युवक स्वयं भी जिम्मेदारी से दूर रहने का अभ्यस्त हो जाता है। वह जैविक रूप से जवान होने के बावजूद निर्णय, अनुशासन, जोखिम और आर्थिक उत्तरदायित्व से बचता रहता है, क्योंकि परिवार लगातार उसकी असफलताओं, खर्चों और भविष्य की अनिश्चितताओं का भार उठाता है।

गांव और शहर की अलग स्थितियां

ग्रामीण समाज में किशोर अपेक्षाकृत जल्दी खेती, व्यवसाय, घरेलू कार्य और सामुदायिक जीवन से जुड़ जाते हैं। वहां उनकी उम्र के साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ती हैं। शहरों में शिक्षा और करियर की लंबी प्रक्रिया के कारण यह व्यावहारिक परिपक्वता कई वर्षों तक टलती रहती है।

शहरी माता पिता तब तक अपने कंधों पर सारी जिम्मेदारियां उठाए रहते हैं, जब तक उनके अनुसार बच्चा पूरी तरह स्थापित नहीं हो जाता। यह स्थापना कब होगी, इसकी कोई निश्चित सीमा नहीं रहती, क्योंकि पढ़ाई, परीक्षा और नौकरी की प्रक्रिया लगातार लंबी होती जाती है।

तीस वर्ष तक पढ़ाई करने के बाद भी युवक को स्थायी और संतोषजनक नौकरी मिलने में पैंतीस या चालीस वर्ष लग सकते हैं। परिवार तब उसे स्थापित मानता है और उसके विवाह की तैयारी शुरू करता है। इसके बाद अगली पीढ़ी की जिम्मेदारियां सामने खड़ी होती हैं।

माता पिता पर बढ़ता मानसिक दबाव

अधिक शिक्षित शहरी परिवारों में बच्चे कई बार स्वतंत्र वयस्क की भूमिका ग्रहण ही नहीं कर पाते। माता पिता यह निर्धारित नहीं कर पाते कि शिक्षा पर कब विराम लगाया जाए और बच्चे को उपलब्ध साधनों के भीतर अपना जीवन बनाने की जिम्मेदारी कब सौंपी जाए।

जब तक संतान परिवार की परिभाषा के अनुसार शिक्षित, रोजगार प्राप्त और विवाह योग्य बनती है, तब तक माता पिता के जीवन का बड़ा हिस्सा बीत चुका होता है। शिक्षा, नौकरी और विवाह का भार उठाते उठाते उनकी निजी इच्छाएं और स्वतंत्रता पीछे छूट जाती हैं।

लंबे समय तक चलने वाला आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक दबाव माता पिता के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। पति पत्नी वर्षों तक केवल बच्चों के भविष्य की चिंता में जीवन बिताते हैं और अपने संबंध, व्यक्तिगत समय तथा मानसिक शांति को लगातार स्थगित करते रहते हैं।

पारिवारिक संबंधों पर गंभीर प्रभाव

शहरों में वैवाहिक संबंधों के तनावपूर्ण होने का एक कारण यह भी है कि दंपती को यह पता नहीं होता कि बच्चों की जिम्मेदारी कब समाप्त होगी। वे जीवनभर शिक्षा, नौकरी, विवाह और अगली पीढ़ी की व्यवस्था में उलझे रहते हैं।

इस निरंतर दबाव के कारण पति पत्नी स्वयं को कभी पूरी तरह स्वतंत्र अनुभव नहीं कर पाते। चिंता, असुरक्षा, आर्थिक दबाव और भविष्य की आशंकाएं उनके संबंधों में प्रवेश कर जाती हैं। परिणामस्वरूप मनोवैज्ञानिक सहायता और चिंता नियंत्रित करने वाली दवाओं की आवश्यकता बढ़ती है।

मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि बच्चों को जल्दी बड़ा घोषित कर दिया जाए, बल्कि यह है कि उम्र के अनुसार उन्हें जिम्मेदारी, निर्णय और आत्मनिर्भरता सिखाई जाए। संरक्षण आवश्यक है, लेकिन ऐसा संरक्षण जो वयस्कता को अनिश्चित समय तक स्थगित कर दे, अंततः पूरे परिवार को निर्भर बना देता है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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