Friday, April 17, 2026

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: एक राजनीतिक छलावा

नारी शक्ति वंदन अधिनियम

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत 33 प्रतिशत लोकसभा सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि उन आरक्षित सीटों पर 100 प्रतिशत पुरुष राजनीतिक रूप से अयोग्य घोषित हो जाएंगे और चुनाव मैदान से बाहर हो जाएंगे।

राजनीतिक हाशिए पर जाएंगे पुरुष नेता

राजनीति में ऊपर उठने के लिए अनेक नेता सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जमीनी काम करते हैं। जब इन 33 प्रतिशत सीटों पर पुरुषों का चुनाव लड़ना संविधानतः बंद हो जाएगा, तो राजनीतिक निराशा में वे सामाजिक कार्यों से भी दूर होने पर विवश हो जाएंगे।

महिला बनाम महिला की लड़ाई

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: आरक्षित सीटों पर राजनीतिक मुकाबला महिलाओं के बीच ही होगा। कुछ प्रभावशाली पुरुष अपने परिवार की महिलाओं को आगे कर राजनीति करेंगे और उन्हें सत्ता का मोहरा बनाकर रखेंगे।

जिन पुरुषों के पास परिवार में कोई महिला नहीं होगी, वे चाहे कितने भी योग्य हों, इन सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। ऐसे लोग या तो अनैतिक रास्ते अपनाने पर मजबूर होंगे या राजनीति से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे।

यदि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट लोकसभा में महिला आरक्षित सीट होती, तो वे परिवार में कोई महिला न होने के कारण चुनाव ही नहीं लड़ सकते थे। देश के 33 प्रतिशत क्षेत्र में ऐसे स्वाभाविक नेताओं को संविधान के जरिए राजनीति से पूरी तरह बाहर किया जाएगा।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: पहले से ही है महिलाओं को पूर्ण अधिकार

वर्तमान में लोकसभा की हर सीट पर महिला को चुनाव लड़ने का अधिकार पहले से मौजूद है। इस दृष्टि से महिलाओं को 100 प्रतिशत विधायी सीटों पर पहले से ही प्रतिनिधित्व का अवसर है। अब 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने से शेष सीटों पर उनकी स्वाभाविक उपस्थिति भी सीमित हो जाएगी।

नाम में धर्म, नीयत में राजनीति

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: इस कानून को धार्मिक भावना से जोड़ते हुए नारी शक्ति वंदन का नाम दिया गया है, पर इसका धर्म से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। आरक्षण उन्हें दिया जाता है जो कमजोर हों। जब नारी को शक्ति कहा जाता है, तो उसे आरक्षण की बैसाखी देना वंदन नहीं, बल्कि अपमान है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: लोकतंत्र नहीं, yesman तंत्र

यह पूरी कवायद सरकारी तंत्र को एक निजी कंपनी की तरह संचालित करने की कोशिश है। चीन में जिस तरह एक देश, एक पार्टी और एक सरकार का ढांचा है, उसी तरह यहां स्वाभाविक नेतृत्व को हाशिए पर धकेलकर आज्ञाकारी yesman नेता तैयार किए जाने की योजना दिखती है।

जो पुरुष किसी महिला को आगे कर संसद में पहुंचेंगे, वह महिला स्वाभाविक रूप से उनकी कर्जदार बनी रहेगी। इससे सत्ता के दो केंद्र बनेंगे। महिला सांसद और उसके पीछे खड़े पति या बेटे, दोनों के दरवाजे पर जनता भटकती रहेगी।

दुनिया में कहीं नहीं है ऐसा प्रावधान

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: विश्व के किसी विकसित देश में इस तरह का महिला आरक्षण कानून लागू नहीं है। केवल अफ्रीका के कुछ पिछड़े देशों ने ऐसा प्रावधान किया है। अमेरिका जैसे देशों में भी यह वामपंथी वर्गभेदी कानून अब तक नहीं आया। न कभी इसकी व्यापक मांग उठी, न कोई जनआंदोलन हुआ।

लव जिहाद की अनदेखी

माना आज देश में ब्लास्ट नहीं होते, पर आज गांव गांव में लव जिहाद होता है। एक एक मजहबी 200-300 हिन्दू लड़कियों को फंसा दे रहा है। टाटा से लेकर लेंसकार्ट तक हिन्दू महिलाओं को मजहब में धकेलने में लगी हैं। लव जिहाद के भयावह केसेज से समाचार पट गए हैं।

नकली मांग और प्रोपेगेंडा

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा के लिए कोई कानून लाने की जगह यह अनावश्यक कानून देश पर थोपा जा रहा है जो न संवैधानिक है, न मानवीय। शुद्ध प्रोपेगेंडा के आधार पर देश भर की स्कूल कॉलेज में इसपर महीने भर से व्याख्यान दिलवा दिलवाकर नकली डिमांड खड़ी की जा रही है, ब्रेनवाश किया जा रहा है। कहीं कोई खुली बहस नहीं हुई और इस प्रोपेगेंडा पर सैकड़ों करोड़ रुपए बर्बाद किए जा चुके हैं।

विवेकानंद के विचारों से विश्वासघात

स्वामी विवेकानंद का स्पष्ट मत था कि, “स्त्रियाँ अपने भाग्य का निर्माण स्वयं कर लेंगी और उस से कहीं अधिक उत्तम रीति से करेंगी, जितना कि पुरुष उनके लिए कभी कर सकते हैं। स्त्रियों का सारा अनर्थ इसी कारण हुआ है कि पुरुषों ने स्त्रियों के भाग्य-निर्माण का भार अपने ऊपर ले लिया।”

यहां महिलाओं की व्यापक मांग के बिना, उनकी राय सुने बिना, जबरदस्ती उनके भाग्य का विधान किया जा रहा है। उनके अधिकार की चोरी का झूठा नाटक रचा जा रहा है, जबकि सच यह है कि 100 प्रतिशत विधायी सीटों पर महिलाएं पहले से ही चुनाव लड़ने की अधिकारी हैं

नारी शक्ति वंदन अधिनियम स्वामी विवेकानंद के विचारों के साथ सीधा धोखा है और यह महिलाओं के स्वाभाविक नेतृत्व को सशक्त करने के बजाय उन्हें एक राजनीतिक औजार में बदलने की कोशिश है

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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