Friday, July 10, 2026

MP Ethanol Rice Scam: एथेनॉल के नाम पर ₹1160 करोड़ का चावल घोटला!

MP Ethanol Rice Scam: मध्य प्रदेश में सरकारी फोर्टिफाइड चावल के कथित दुरुपयोग को लेकर सामने आया मामला अब राज्य के सबसे चर्चित आर्थिक मामलों में शामिल हो गया है।

आरोप है कि जिन चावलों को सरकार ने रियायती दर पर एथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित किया था, उनका बड़ा हिस्सा प्लांट तक पहुंचने के बजाय राइस मिलों में चला गया।

इसके बाद इन्हीं चावलों को दोबारा सरकारी आपूर्ति प्रणाली में शामिल कर करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय हेराफेरी को अंजाम दिया गया।

मामले की जांच अभी जारी है, लेकिन शुरुआती जांच में सामने आए तथ्यों ने सरकारी निगरानी व्यवस्था, एथेनॉल नीति और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानें पूरा मामला

MP Ethanol Rice Scam: सरकार अतिरिक्त खाद्यान्न का सुरक्षित उपयोग करने और पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के उद्देश्य से गोदामों में रखा चावल एथेनॉल प्लांट्स को रियायती दर पर उपलब्ध कराती है।

इस योजना का मकसद था कि अतिरिक्त अनाज खराब होने से बच जाए और उससे स्वच्छ ईंधन तैयार किया जा सके।

लेकिन आरोप है कि इस नीति का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने सरकारी फोर्टिफाइड चावल को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने के बजाय राइस मिलों तक पहुंचा दिया।

वहां से यही चावल दोबारा सरकारी सिस्टम में जमा करा दिया गया, जबकि मिलिंग के लिए मिला धान खुले बाजार में बेचकर अलग से कमाई की गई।

यदि जांच में यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल आर्थिक गड़बड़ी नहीं बल्कि सरकारी खाद्य व्यवस्था के साथ भी बड़ा छल माना जाएगा।

1160 करोड़ रुपये के चावल पर उठे सवाल

MP Ethanol Rice Scam: बताया जा रहा है कि एक वर्ष के दौरान एथेनॉल प्लांट्स को लगभग 50 लाख क्विंटल (करीब 5 लाख मीट्रिक टन) सरकारी चावल आवंटित किया गया था। इसकी अनुमानित कीमत करीब 1160 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस चावल का बड़ा हिस्सा वास्तविक एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल ही नहीं हुआ। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का यह बेहद बड़ा मामला साबित हो सकता है।

फोर्टिफाइड चावल आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

MP Ethanol Rice Scam: इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि जिस चावल की बात हो रही है वह सामान्य चावल नहीं बल्कि फोर्टिफाइड चावल है।

इसमें आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन बी-12 समेत कई आवश्यक पोषक तत्व मिलाए जाते हैं ताकि कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याओं से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों को बचाया जा सके।

ऐसे चावल का कथित रूप से व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल होना सामाजिक दृष्टि से भी गंभीर चिंता का विषय माना जा रहा है।

कैसे खुली पूरे नेटवर्क की पोल?

MP Ethanol Rice Scam: पूरे मामले का खुलासा जून 2026 की शुरुआत में हुआ। बालाघाट जिले के नवेगांव वेयरहाउस से छिंदवाड़ा स्थित एक एथेनॉल प्लांट के लिए सरकारी चावल से भरे तीन ट्रक रवाना किए गए थे।

जांच के दौरान पता चला कि इनमें से एक ट्रक निर्धारित प्लांट तक पहुंचने के बजाय एक राइस मिल में मिला, जबकि बाकी ट्रकों की आवाजाही पर भी सवाल उठे। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया।

SIT जांच में बड़ा खुलासा

MP Ethanol Rice Scam: जांच एजेंसियों ने अब तक कई महत्वपूर्ण कार्रवाई की है। 40 से अधिक लोगों से पूछताछ की जा चुकी है, चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और दर्जनभर ट्रकों को जब्त किया गया है।

शुरुआत में जांच बालाघाट, छिंदवाड़ा और सिवनी तक सीमित थी, लेकिन अब इसका दायरा प्रदेश के अन्य एथेनॉल प्लांट्स और कस्टम मिलिंग करने वाली राइस मिलों तक बढ़ा दिया गया है। जांच अधिकारी पूरे सप्लाई नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटे हैं।

आरोपों के अनुसार किस तरह चलता था पूरा खेल?

MP Ethanol Rice Scam: जांच में सामने आए आरोपों के अनुसार, एथेनॉल प्लांट संचालकों को सरकार लगभग 2320 रुपये प्रति क्विंटल की रियायती दर पर फोर्टिफाइड चावल उपलब्ध कराती थी।

दूसरी ओर खुले बाजार में एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग होने वाला ब्रोकन राइस इससे भी कम कीमत पर उपलब्ध था।

ऐसे में आरोप है कि कुछ प्लांट संचालकों ने सरकारी चावल को एथेनॉल बनाने में उपयोग करने के बजाय अधिक कीमत पर राइस मिलर्स को बेच दिया।

इसके बाद राइस मिलर्स ने उसी चावल को नए बारदाने में पैक कर कस्टम मिलिंग का चावल बताकर सरकारी गोदामों में जमा कर दिया।

इससे उन्हें धान की प्रोसेसिंग की लागत बची, मिलिंग शुल्क भी मिला और मिलिंग के लिए आवंटित धान को खुले बाजार में बेचने का कथित लाभ भी प्राप्त हुआ।

FCI और सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल

MP Ethanol Rice Scam: जांच के दौरान भारतीय खाद्य निगम (FCI) के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है।

नियमों के मुताबिक एथेनॉल उत्पादन के लिए पहले से गोदामों में रखा पुराना चावल (FIFO प्रणाली) जारी किया जाना चाहिए। लेकिन आरोप है कि इसके बजाय नया फोर्टिफाइड चावल आवंटित किया गया।

हालांकि FCI के स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि गोदाम से चावल जारी करने तक सभी नियमों का पालन किया गया और उसके बाद उसकी निगरानी उनकी जिम्मेदारी नहीं रहती।

प्रशासन और FCI के दावों में दिखा अंतर

MP Ethanol Rice Scam: बालाघाट प्रशासन का कहना है कि उन्हें पहले ही सूचना मिल चुकी थी कि सरकारी चावल एथेनॉल प्लांट्स तक पहुंचने के बजाय राइस मिलों तक जा रहा है। इसी सूचना के आधार पर जांच शुरू की गई।

वहीं दूसरी ओर FCI अधिकारियों का कहना है कि उनके स्तर पर पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार पूरी की गई थी। इस तरह दोनों पक्षों के बयानों में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है, जिसकी जांच अभी जारी है।

250 करोड़ रुपये की संभावित वित्तीय हेराफेरी का अनुमान

जांच से जुड़े अधिकारियों का अनुमान है कि यदि बड़ी मात्रा में सरकारी चावल खुले बाजार में बेचा गया है तो इससे लगभग 250 करोड़ रुपये तक की वित्तीय हेराफेरी हुई हो सकती है।

हालांकि यह केवल प्रारंभिक अनुमान है और अंतिम आंकड़े जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे।

एथेनॉल नीति पर नहीं, उसके क्रियान्वयन पर उठे सवाल

MP Ethanol Rice Scam: भारत सरकार लगातार एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दे रही है ताकि पेट्रोलियम आयात कम हो और पर्यावरण को लाभ मिले। इसलिए एथेनॉल नीति स्वयं देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

लेकिन मध्य प्रदेश में सामने आए इस कथित मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि यदि निगरानी मजबूत न हो तो अच्छी नीतियों का भी गलत फायदा उठाया जा सकता है।

जांच अभी जारी, अंतिम फैसला बाकी

फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है और कई अहम पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। कई लोगों से पूछताछ हो चुकी है, गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और अदालत में साक्ष्यों की जांच के बाद ही सामने आएगा।

यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल सरकारी धन के नुकसान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी असर डालेगा जिनका उद्देश्य जनता के हित में खाद्यान्न और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जनता तक लाभ पहुंचाना होता है, लेकिन यदि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार या मिलीभगत के आरोप सामने आते हैं तो सबसे बड़ा नुकसान जनता के भरोसे का होता है।

मध्य प्रदेश के इस कथित फोर्टिफाइड चावल-एथेनॉल मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं, क्या सरकारी खाद्यान्न की निगरानी व्यवस्था पर्याप्त है?

क्या लाभार्थियों तक पहुंचने वाले पोषक चावल का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है? और सबसे अहम, क्या दोषियों तक जांच निष्पक्ष रूप से पहुंच पाएगी?

अब पूरे देश की नजर जांच एजेंसियों पर है। अंतिम सच्चाई जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी, लेकिन यह मामला सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित जरूर करता है।

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