Sunday, May 17, 2026

मार्कण्डेय काटजू की जस्टिस सूर्यकांत को नसीहत, कॉकरोच वाले बयान पर भड़के

मार्कण्डेय काटजू की जस्टिस सूर्यकांत शर्मा को नसीहत

पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की टिप्पणियों और अदालत की कार्यशैली को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों का मुख्य कार्य अदालत में पक्षकारों को सुनना और बाद में आदेश देना होता है, न कि अनावश्यक टिप्पणियां करना।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी पर विवाद

एक वकील द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा दिए जाने की याचिका पर सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कथित रूप से कहा था कि कुछ बेरोजगार युवक कॉकरोच जैसे होते हैं और बाद में मीडिया कर्मी, सोशल मीडिया उपयोगकर्ता तथा आरटीआई कार्यकर्ता बनकर लोगों पर हमला करने लगते हैं।

उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते रहते हैं और अब आप भी उनसे हाथ मिलाना चाहते हैं।

इन टिप्पणियों के सामने आने के बाद व्यापक आलोचना हुई और बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि उन्हें गलत तरीके से उद्धृत किया गया था।

स्पष्टीकरण में उन्होंने कहा कि उनका इशारा फर्जी और नकली डिग्रियों के सहारे पेशों में प्रवेश करने वाले लोगों की ओर था। हालांकि न्यायमूर्ति काटजू ने प्रश्न उठाया कि ऐसी टिप्पणियां करने की आवश्यकता ही क्या थी, जिनके बाद स्पष्टीकरण देना पड़े।

अदालत में न्यायाधीशों की भूमिका पर जोर

न्यायमूर्ति काटजू ने कहा कि अदालत का दायित्व केवल याचिकाकर्ता और प्रतिवादी की दलीलें सुनकर उचित आदेश देना है। उन्होंने पूछा कि किसी कानूनी सुनवाई में कॉकरोच और परजीवी जैसे शब्दों को शामिल करने की क्या आवश्यकता थी।

उन्होंने इंग्लैंड के पूर्व लॉर्ड चांसलर सर फ्रांसिस बेकन के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि “बहुत बोलने वाला न्यायाधीश बेसुरी झांझ की तरह होता है।”

उनके अनुसार अदालत में बोलना वकील का कार्य है जबकि न्यायाधीश का कार्य मुख्य रूप से सुनना होता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी तथ्य पर स्पष्टीकरण चाहिए तो न्यायाधीश सीमित प्रश्न पूछ सकते हैं, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में उन्हें शांत रहना चाहिए और अंत में आदेश पारित करना चाहिए। अंतिम निर्णय की कलम न्यायाधीश के हाथ में होती है।

ब्रिटिश अदालतों के उदाहरण का उल्लेख

न्यायमूर्ति काटजू ने लंदन यात्रा के दौरान ब्रिटिश हाईकोर्ट में देखे गए अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां अदालत कक्ष में लगभग पूर्ण शांति थी। वकील धीमी आवाज में अपनी दलीलें रख रहा था और न्यायाधीश शांतिपूर्वक सुन रहे थे।

उन्होंने कहा कि बीच बीच में न्यायाधीश केवल आवश्यक स्पष्टीकरण मांगते थे, लेकिन पूरी सुनवाई के दौरान अनावश्यक बातचीत नहीं होती थी। उनके अनुसार अदालतों का संचालन इसी प्रकार होना चाहिए ताकि न्यायिक गरिमा बनी रहे।

उन्होंने कहा कि न्यायालयों का वातावरण शांति, संयम और गंभीरता से भरा होना चाहिए। न्यायाधीशों द्वारा अत्यधिक बोलना अदालत की गरिमा को प्रभावित करता है और उनके कथनों के गलत अर्थ निकाले जाने की संभावना भी बढ़ा देता है।

पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की टिप्पणियों पर भी सवाल

न्यायमूर्ति काटजू ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की एक टिप्पणी का भी उल्लेख किया। खजुराहो में भगवान विष्णु की खंडित प्रतिमा को पुनर्स्थापित करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने कथित रूप से कहा था कि भगवान विष्णु से स्वयं जाकर प्रार्थना कीजिए कि वे अपना सिर वापस स्थापित कर लें।

काटजू ने कहा कि ऐसी टिप्पणी करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उनके अनुसार अदालत केवल यह कहकर याचिका खारिज कर सकती थी कि उसमें कोई कानूनी आधार या merit नहीं है।

उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का उल्लेख करते हुए भी कहा कि वे अदालत में बहुत लंबा बोलते थे। उनके अनुसार इस प्रकार की प्रवृत्ति न्यायपालिका की गरिमा को कम करती है।

मार्कण्डेय काटजू की सलाह

पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश होने के नाते न्यायमूर्ति काटजू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों को सम्मानपूर्वक सलाह दी कि वे सर फ्रांसिस बेकन की सीख पर ध्यान दें और अदालतों में कम बोलने की परंपरा अपनाएं।

उनके अनुसार न्यायिक मर्यादा और अदालत की गरिमा बनाए रखने के लिए संयमित भाषा और सीमित टिप्पणियां अत्यंत आवश्यक हैं।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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