Sunday, May 17, 2026

भोजशाला: डॉ. वाकणकर ने 1961 में लंदन संग्रहालय में पहचानी वाग्देवी प्रतिमा

भोजशाला

1952 से चल रहा आंदोलन 1991 में साप्ताहिक सत्याग्रह और 2003 में बड़े जन आंदोलन में बदला

उज्जैन से जुड़ी इस रिपोर्ट में धार की भोजशाला और वाग्देवी प्रतिमा को लेकर चले लंबे आंदोलन का इतिहास सामने आता है। 1952 से यह आंदोलन चल रहा था। 1991 में साप्ताहिक सत्याग्रह शुरू हुआ और 2003 में यह बड़ा आंदोलन बना।

डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1961 में लंदन के संग्रहालय का दौरा किया था। उन्होंने वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित किया कि वहां रखी वाग्देवी की प्रतिमा मूल रूप से धार की भोजशाला से ले जाई गई थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्रियों से मुलाकात कर वाग्देवी प्रतिमा वापसी की मांग उठाई

डॉ. वाकणकर ने अलग अलग समय पर तत्कालीन प्रधानमंत्रियों से मुलाकात कर इस मूर्ति को भारत वापस लाने की मांग उठाई थी। उन्होंने इसके लिए कई पत्र भी लिखे। भोजशाला से जुड़ी यह मांग बाद में जन आंदोलन का प्रमुख आधार बनी।

भोजशाला के लिए आंदोलन 1952 में ही शुरू हो चुका था। 1991 में इसे साप्ताहिक सत्याग्रह का रूप मिला। 4 फरवरी 1991 को भोजशाला उत्सव समिति ने प्रति मंगलवार परिसर के बाहर धरना और सत्याग्रह शुरू किया।

1995 में हिंदुओं को मंगलवार और मुसलमानों को शुक्रवार की अनुमति मिली

1995 में प्रशासनिक स्तर पर हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। यह व्यवस्था बाद में लगातार विवाद और विरोध का कारण बनी, क्योंकि दोनों पक्ष भोजशाला पर अपने अधिकारों को लेकर सक्रिय रहे।

6 दिसंबर 1994 को बाबरी विध्वंस का दूसरा वर्ष पूर्ण होने के दिन आंदोलन की शुरुआत फिर तेज हुई। 1996 में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नेतृत्व में 6 दिसंबर को शौर्य दिवस आयोजित किया गया।

शौर्य दिवस के दौरान प्रशासन और कार्यकर्ताओं के बीच हुआ हंगामा

शौर्य दिवस के दौरान प्रशासन और कार्यकर्ताओं के बीच जमकर हंगामा हुआ। इसके बाद भोजशाला से जुड़ा विवाद और अधिक तीखा होता गया। 1997 में राज्य शासन के सर्कुलर ने आंदोलन को और भड़का दिया।

1997 में मुस्लिम पक्ष की मांग मानने और हिंदू संगठनों की मांग खारिज करने के खिलाफ लोग भड़क उठे। इसी पृष्ठभूमि में 12 मई 1997 को धार कलेक्टर ने भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दी।

बसंत पंचमी पर हिंदुओं को और शुक्रवार को मुसलमानों को प्रवेश मिला

कलेक्टर के आदेश के बाद हिंदुओं को केवल साल में एक बार बसंत पंचमी पर प्रवेश की अनुमति दी गई। मुसलमानों को हर शुक्रवार को प्रवेश की इजाजत मिली। इस निर्णय के बाद आंदोलन लगातार तेज होता चला गया।

वर्ष 2001 में भी भोजशाला को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ। इस दौरान भारी लाठीचार्ज हुआ। पूजा स्थल पर रखी शिलाएं फेंकी गईं। इसके बाद संगठनों ने यज्ञ और महाआरती के साथ पूजा पाठ किया।

2002 में 35 हजार लोगों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन प्रशासन को सौंपा गया

अक्टूबर 2002 में धार के 35 हजार से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर कर ज्ञापन सौंपा। इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने 150 से अधिक कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज किए। आंदोलन अब स्थानीय स्तर से आगे बड़ा जन मुद्दा बन चुका था।

इस दौर में 26 लोगों पर धारा 302 लगाई गई। 80 से अधिक लोगों पर धारा 307 जैसी गंभीर धाराओं में प्रकरण दर्ज किए गए। 10 लोगों पर रासुका भी लगाई गई। 2003 का आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में बड़े रूप में सामने आया।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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