Mahrang Baloch: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद एक नई बहस शुरू हो गई है।
महरंग लंबे समय से बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन और लापता लोगों के मुद्दे को उठाती रही हैं।
उनकी गिरफ्तारी और फिर उम्रकैद की सजा को लेकर कई मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है।
लेकिन इस पूरे मामले में एक और बात चर्चा का विषय बन गई है। वह है नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला युसूफजई की चुप्पी।
सोशल मीडिया पर कई लोग पूछ रहे हैं कि महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों की बात करने वाली मलाला ने महरंग को उम्रकैद मिलने पर अब तक कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।
कौन हैं महरंग बलोच?
महरंग बलोच बलूचिस्तान की एक डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उनके पिता अब्दुल गफ्फार लंगोव को साल 2009 में तौर पर हिरासत में लिया गया, बाद में उनका शव मिला।
इस घटना के बाद महरंग ने बलूचिस्तान में लापता लोगों और उनके परिवारों के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया।
उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की, लेकिन साथ ही सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहीं।
उन्होंने कई प्रदर्शन, मार्च और धरनों का नेतृत्व किया। यही वजह है कि आज उन्हें बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की प्रमुख आवाज माना जाता है।
गिरफ्तारी से उम्रकैद तक का मामला
पिछले कुछ वर्षों में महरंग बलोच कई आंदोलनों का चेहरा बनीं। ग्वादर में आयोजित एक बड़े बलोच सम्मेलन के बाद हुई
हिंसा को लेकर पाकिस्तानी प्रशासन ने उनके खिलाफ कार्रवाई की। मार्च 2025 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
बाद में उनके खिलाफ मुकदमा चला और हाल ही में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। उनके समर्थकों का कहना है कि यह फैसला असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश है।
वहीं पाकिस्तान की सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इसे कानून और व्यवस्था से जुड़ा मामला मानती हैं।
मलाला की चुप्पी पर सवाल
मलाला युसूफजई दुनिया भर में महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की आवाज के रूप में जानी जाती हैं।
तालिबान के खिलाफ उनकी लड़ाई ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी। साल 2014 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी मिला।
जब मार्च 2025 में महरंग बलोच को गिरफ्तार किया गया था, तब मलाला ने उनकी गिरफ्तारी पर चिंता जताई थी और उनकी रिहाई की मांग की थी।
लेकिन अब जब उन्हें उम्रकैद की सजा मिली है, तब उनकी ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या कुछ मुद्दों पर ज्यादा और कुछ मुद्दों पर कम बोला जाता है।
कई लोगों का मानना है कि अगर महिलाओं और मानवाधिकारों की बात की जाती है, तो हर मामले में एक जैसी संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।
क्या मानवाधिकारों के मुद्दों पर चयनात्मक रवैया अपनाया जाता है?
महरंग बलोच के मामले ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है। क्या दुनिया में मानवाधिकारों के कुछ मुद्दों को ज्यादा महत्व मिलता है और कुछ को कम?
मलाला लगातार अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर बोलती रही हैं।
उन्होंने तालिबान द्वारा महिलाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों की खुलकर आलोचना की है। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और उस पर बोलना जरूरी भी है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को वैश्विक मानवाधिकारों की आवाज माना जाता है, तो उसे दूसरे महत्वपूर्ण मामलों पर भी अपनी राय रखनी चाहिए।
खासकर तब, जब मामला महिलाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या मानवाधिकारों से जुड़ा हो।
हालांकि यह भी सच है कि कोई भी व्यक्ति दुनिया के हर मुद्दे पर नहीं बोल सकता।
कई बार राजनीतिक और कानूनी कारणों से भी लोग सार्वजनिक बयान देने से बचते हैं। इसलिए किसी की चुप्पी का मतलब हमेशा समर्थन या विरोध नहीं माना जा सकता।

