Wednesday, January 21, 2026

इज़राइल को भारत की अडिग रणनीति से सीख लेने की ज़रूरत: ज़ाकी शलोम

इज़रायल

इज़राइली अख़बार द जेरूसलम पोस्ट में मिसगेव इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेशनल सिक्योरिटी एंड ज़ियोनिस्ट स्ट्रेटजी के सीनियर फेलो ज़ाकी शलोम का लेख प्रकाशित हुआ है।

इसमें उन्होंने लिखा कि अब समय आ गया है कि इज़राइल भारत से सीखे कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने आत्मविश्वास और धैर्य के साथ कैसे खड़ा होना चाहिए।

भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव के कारण

लेख में बताया गया है कि भारत और अमेरिका के मज़बूत रिश्तों में दरार तीन कारणों से आई।

पहला, अमेरिका द्वारा टैरिफ़ पर ज़ोर देना, दूसरा, भारत के रूस से गहरे और ऐतिहासिक संबंध और तीसरा, भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय अमेरिकी प्रशासन का निष्पक्ष रहना। इन वजहों से दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे दूरी बढ़ गई।

इसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाए और भारतीय अर्थव्यवस्था को “डेड इकॉनमी” कहा।

मगर भारत ने दबाव झेलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के कॉल तक न उठाने का निर्णय लिया।

इसके विपरीत, पाकिस्तान ने अमेरिका की तारीफ़ की और ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार देने की माँग तक कर डाली।

भारत का मज़बूत जवाब और अंततः बदलाव

भारत पर 50% टैरिफ़ का ऐलान हुआ तो अन्य देश तुरंत ट्रम्प से मिलने पहुँच गए। लेकिन भारत ने इसका कोई जवाब देना ही बंद कर दिया।

अंततः अमेरिका को समझना पड़ा कि यदि यह स्थिति जारी रही तो उसके भारत से जुड़े सामरिक हित प्रभावित होंगे। नतीजा यह हुआ कि रास्ते दोबारा खोले गए और रिश्तों में नई शुरुआत हुई।

मोदी को कमजोर दिखाने के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध को “मोदी युद्ध” तक कहा गया, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस संयम ने भारत की छवि को और मज़बूत किया कि वह विश्व मंच पर दबाव में नहीं झुकता।

इज़राइल की ग़लती और भारत का सबक

लेखक ने अपने देश का उदाहरण देते हुए कहा कि जब इज़राइल ने खान यूनुस अस्पताल पर हमला किया और 20 लोगों की मौत हुई तो अंतर्राष्ट्रीय दबाव में सरकार और सेना ने तुरंत माफ़ी माँग ली। बाद में साबित हुआ कि मारे गए लोग हमास के आतंकी थे और कार्रवाई सही थी।

शलोम के अनुसार, ऐसी हड़बड़ी में माफ़ी माँगना दरअसल खुद को युद्ध अपराधी घोषित करने जैसा है। अगर इज़राइल ने भारत जैसा धैर्य दिखाया होता तो यह ग़लती नहीं होती।

भारत की नीति स्पष्ट है, जो अपने देश के लिए सही है वही करना, न कि वैश्विक दबाव में झुकना।

कट्टर सलाहकार बनाम वास्तविकता

भारत में कुछ लोग रोज़ प्रधानमंत्री मोदी को इज़राइल से सीखने की सलाह देते हैं। मगर इस लेख में ज़ोर देकर कहा गया है कि असलियत उलटी है।

दरअसल इज़राइल को भारत से सबक लेना चाहिए कि कैसे धैर्य, संयम और आत्मविश्वास के साथ राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जाती है।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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