Independence Day Special: 15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन से आज़ादी हासिल की। दिल्ली में जश्न था, तिरंगा लहरा रहा था और एक नए राष्ट्र का जन्म हो चुका था।
लेकिन पंजाब और बंगाल के लाखों लोगों के लिए उस दिन भी एक बेहद अहम सवाल का जवाब नहीं मिला था। सवाल था कि आखिर वे भारत में हैं या पाकिस्तान में?
जिस सीमा के आधार पर दोनों नए देशों का भूगोल तय होना था, उसकी आधिकारिक घोषणा स्वतंत्रता दिवस के दो दिन बाद, 17 अगस्त 1947 को हुई।
यानी भारत और पाकिस्तान ने अपनी स्वतंत्र यात्रा शुरू तो कर दी थी, लेकिन उनकी अंतिम सीमाओं को लेकर आम लोगों के बीच पूरी स्पष्टता नहीं थी।
एक अंग्रेज वकील के हाथों में था करोड़ों लोगों का भविष्य
Independence Day Special: भारत के विभाजन की सीमा तय करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ को दी गई थी।
दिलचस्प बात यह थी कि 1947 से पहले वे भारत आए तक नहीं थे।
इसके बावजूद उन्हें पंजाब और बंगाल जैसे विशाल और बेहद जटिल इलाकों को बांटने का काम सौंपा गया।
रैडक्लिफ के पास इस पूरे काम को पूरा करने के लिए लगभग पांच सप्ताह का समय था। उनके सामने सिर्फ नक्शे पर एक रेखा खींचने की चुनौती नहीं थी।
उन्हें धार्मिक जनसंख्या, प्रशासनिक सीमाओं, रेलवे लाइनों, नहरों, सिंचाई व्यवस्था, सड़कों और आर्थिक संपर्क जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना था।
सीमा खींचना सिर्फ जमीन बांटना नहीं था
Independence Day Special: पंजाब और बंगाल में कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधियों की अलग-अलग मांगें थीं।
हर पक्ष चाहता था कि उसके हितों के मुताबिक अधिक से अधिक क्षेत्र उसके हिस्से में आए।
जुलाई 1947 में दोनों सीमा आयोगों ने विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनीं। इसके बाद रैडक्लिफ ने अंतिम फैसले तैयार किए।
उनके पुरस्कारों पर 12 अगस्त की तारीख थी, लेकिन उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया।
आखिर सीमा को 15 अगस्त से पहले क्यों नहीं बताया गया?
Independence Day Special: सीमा को सार्वजनिक करने में देरी के पीछे राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं थीं। विभाजन पहले ही बेहद तनावपूर्ण माहौल में हो रहा था।
आशंका थी कि अगर विवादित सीमाओं की घोषणा स्वतंत्रता दिवस से पहले कर दी गई, तो इससे आज़ादी के समारोहों पर असर पड़ सकता है और हिंसा व अस्थिरता और बढ़ सकती है।
इसी वजह से अंतिम सीमा-निर्णय को कुछ समय तक गोपनीय रखा गया।
15 अगस्त को भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र हो चुके थे, लेकिन लाखों लोगों को अभी यह निश्चित रूप से पता नहीं था कि नई सीमा उनके घर के किस तरफ से गुजरेगी।
गुरदासपुर: एक जिले ने बदल दिया पूरा समीकरण
Independence Day Special: पंजाब का गुरदासपुर इस अनिश्चितता का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।
अंतिम फैसले में गुरदासपुर का बड़ा हिस्सा भारत को मिला, जिसमें पठानकोट, गुरदासपुर और बटाला शामिल थे, जबकि शकरगढ़ पाकिस्तान के हिस्से में गया।
इस फैसले का रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा था। गुरदासपुर का भारत में रहना जम्मू-कश्मीर की ओर भारत के जमीनी संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हुआ।
रैडक्लिफ के सामने यह भी चुनौती थी कि नई सीमा ऐसी न हो जिससे रेलवे, नहरों, सिंचाई और संचार की पुरानी व्यवस्थाएं पूरी तरह टूट जाएं।
लेकिन नक्शे पर खींची गई रेखा का असर जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए कहीं ज्यादा गहरा था।
बंगाल में भी लोग अनिश्चितता में थे
Independence Day Special: पूर्वी भारत में भी हालात कुछ अलग नहीं थे। नदिया और मालदा जैसे इलाके विभाजन की जटिलता के प्रतीक बन गए।
जिन जिलों और उपखंडों के लोगों को एक तरफ रहने की उम्मीद थी, अंतिम सीमा के बाद उनका क्षेत्र दूसरी तरफ चला गया।
सालों से जुड़े बाजार, सड़कें, रेलवे लाइनें, नदियां और पारिवारिक रिश्ते किसी नक्शे की एक रेखा के साथ अचानक खत्म नहीं हो सकते थे।
लेकिन नई सीमा ने इन्हीं रोजमर्रा के संपर्कों को अंतरराष्ट्रीय सरहद में बदल दिया।
17 अगस्त को सामने आया फैसला
आखिरकार 17 अगस्त 1947 को भारत सरकार ने सीमा आयोग के फैसलों को Gazette of India के विशेष अंक में औपचारिक रूप से प्रकाशित किया।
तब तक 15 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस बीत चुका था। जश्न खत्म हो चुका था और देश आज़ाद हो चुका था।
लेकिन सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए 17 अगस्त एक अलग तरह का निर्णायक दिन था।
अब उन्हें पता चला कि उनका गांव, उनका शहर और उनकी जमीन किस देश का हिस्सा है।
आज़ादी की सबसे बड़ी विडंबना
Independence Day Special: 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, लेकिन भारत की अंतिम भौगोलिक सीमा दो दिन बाद स्पष्ट हुई।
यही विभाजन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। एक तरफ स्वतंत्रता का उत्सव था, तो दूसरी तरफ ऐसे लाखों परिवार थे जिनका भविष्य एक ऐसे फैसले पर टिका था, जिसकी जानकारी उन्हें अभी मिली ही नहीं थी।
रैडक्लिफ लाइन नक्शे पर कुछ रेखाओं से बनी थी, लेकिन जमीन पर उसने घर, रिश्ते, कारोबार और पूरी जिंदगियां बदल दीं।
इसलिए 17 अगस्त 1947 सिर्फ सीमा घोषित होने की तारीख नहीं थी।
यह वह दिन था जब करोड़ों लोगों को पहली बार स्पष्ट रूप से पता चला कि आज़ादी के बाद वे किस देश के नागरिक होंगे।

