Himalayas: हिमालय के शहरों पर अब विकास का दबाव भारी पड़ने लगा है। जिन पहाड़ों को कभी प्राकृतिक सुंदरता और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था, आज उन्हीं पहाड़ों पर बसे शहर अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
कहीं मकानों में दरारें आ रही हैं, कहीं सड़कें धंस रही हैं, तो कहीं भारी बारिश के बाद पहाड़ों के खिसकने का खतरा बढ़ रहा है।
ऐसे में सवाल सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं से बचने का नहीं, बल्कि यह भी है कि पहाड़ों की क्षमता को समझे बिना विकास की दौड़ आखिर कब तक जारी रखी जा सकती है?
इसरो के लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया के अनुसार, 1998 से 2022 के बीच हिमालय और पश्चिमी घाट में करीब 80 हजार भूस्खलन दर्ज किए गए।
इनमें से लगभग 66.5 प्रतिशत घटनाएं उत्तर-पश्चिमी हिमालय में हुईं। यह आंकड़ा बताता है कि पहाड़ी इलाकों में खतरा कितना गंभीर हो चुका है।
उत्तराखंड का जोशीमठ इसका एक बड़ा उदाहरण है। साल 2023 में यहां जमीन धंसने के कारण सैकड़ों मकानों और इमारतों में दरारें आ गई थीं।
प्रशासन ने 678 इमारतों को असुरक्षित घोषित किया था। इसके बावजूद प्रभावित लोगों का पुनर्वास अब तक पूरी तरह नहीं हो पाया है।
हिमालयी शहरों के लिए खतरा बढ़ा
हिमालयी शहरों की भौगोलिक स्थिति उन्हें पहले से ही प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। यहां भूस्खलन, भूकंप और जमीन धंसने का खतरा हमेशा बना रहता है।
कई शहर ऐसी जमीन पर बसे हैं, जहां मिट्टी और चट्टानों की पकड़ बहुत मजबूत नहीं है। ऐसे में पहाड़ों की कटाई, भारी निर्माण और बारिश का पानी जमीन को और कमजोर कर सकता है।
इसके अलावा ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलें भी नई चिंता पैदा कर रही हैं। इसरो के अध्ययन के मुताबिक, 1984 से 2023 के बीच हिमालय की 2,431 ग्लेशियल झीलों में से 676 के आकार में बढ़ोतरी हुई है।
अगर इनमें से कोई झील टूटती है, तो अचानक आने वाली बाढ़ निचले इलाकों में भारी नुकसान पहुंचा सकती है। इस तरह की घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।
प्राकृतिक खतरों के साथ-साथ पर्यटन और अनियोजित निर्माण ने भी मुश्किलें बढ़ाई हैं। शिमला, नैनीताल और मनाली जैसे शहरों में लगातार बढ़ते होटल,
वाहन और पर्यटकों की संख्या से पानी, सफाई, सड़क और दूसरी सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है। पहाड़ों की सीमित क्षमता को नजरअंदाज करके किया जा रहा निर्माण भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
सरकार तैयारी?
इस समस्या से निपटने के लिए अब वैज्ञानिक योजना और नियंत्रित निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण को लेकर कई सुझाव दिए हैं।
इनमें भूस्खलन संभावित इलाकों और भूकंपीय फॉल्ट लाइनों के आसपास निर्माण सीमित रखने की बात शामिल है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) ने अक्टूबर 2026 में हिमाचल प्रदेश के लिए कई अहम सिफारिशें कीं।
समिति ने प्रमुख पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन कराने और पहाड़ी सड़कों के निर्माण में पर्यावरणीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
वहन क्षमता का मतलब है कि कोई शहर या पर्यटन स्थल कितने लोगों, वाहनों और निर्माण गतिविधियों का दबाव बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए सह सकता है।
अगर किसी जगह की क्षमता सीमित है, तो वहां पर्यटकों और निर्माण कार्यों पर भी उसी हिसाब से नियंत्रण जरूरी होगा।
जोशीमठ में राहत का काम कितना आगे बढ़ा?
जोशीमठ में संकट सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने नवंबर 2023 में 1,658.17 करोड़ रुपये के पुनर्वास और पुनर्निर्माण पैकेज को मंजूरी दी थी।
इसके बाद मई 2025 में जमीन को स्थिर करने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए 291 करोड़ रुपये मंजूर किए गए।
इस राशि से ढलानों को मजबूत करने, अलकनंदा नदी के किनारे सुरक्षा इंतजाम करने और पानी की निकासी व्यवस्था सुधारने जैसे काम किए जाने हैं।
हालांकि, आर्थिक सहायता और योजनाओं के बावजूद प्रभावित परिवारों का पुनर्वास आसान नहीं रहा है। कई लोगों के लिए अपना पुराना घर, जमीन और आजीविका छोड़कर दूसरी जगह बसना बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि केवल सुरक्षित मकान बना देना समस्या का पूरा समाधान नहीं है।
हिमालय के सभी शहरों को बचाना संभव है?
हिमालयी शहरों को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती यह समझना है कि हर जगह एक जैसी विकास योजना लागू नहीं की जा सकती।
कुछ इलाकों में निर्माण पूरी तरह रोकना जरूरी हो सकता है, जबकि कुछ स्थानों पर लोगों को सुरक्षित जगहों पर बसाना पड़ सकता है।
पर्यटन वाले शहरों में भी पर्यटकों की संख्या और निर्माण गतिविधियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सीमित करना होगा।
दरअसल, हिमालय को बचाने के लिए विकास की सोच में बदलाव जरूरी है। सड़क, होटल और इमारतें बनाना ही विकास नहीं है।
असली विकास वह होगा, जिसमें स्थानीय लोगों की सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी शामिल हो।

