32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: 29 जून 2026 राजस्थान के इतिहास में एक ऐसे दिन के रूप में दर्ज हो गया, जिसका इंतजार प्रदेश करीब 32 वर्षों से कर रहा था।
लंबे राजनीतिक प्रयासों, कानूनी प्रक्रियाओं और अंतरराज्यीय बातचीत के बाद आखिरकार राजस्थान और हरियाणा के बीच वर्षों से लंबित यमुना जल परियोजना के क्रियान्वयन पर समझौता हो गया।
नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी में दोनों राज्यों ने परियोजना के कार्यान्वयन (Implementation Agreement/MoA) पर हस्ताक्षर किए।
यह केवल एक समझौता नहीं बल्कि शेखावाटी क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए नई उम्मीद है। चूरू, सीकर और झुंझुनूं जैसे जिलों में वर्षों से चला आ रहा पेयजल संकट कम होने की संभावना है।
साथ ही कृषि, भूजल संरक्षण और क्षेत्रीय विकास के लिए भी इसे ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
आखिर क्या हुआ था 32 साल पहले?
इस समझौते की शुरुआत वर्ष 1994 से होती है। उस समय यमुना नदी के पानी के बंटवारे को लेकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के बीच “Upper Yamuna River Board Agreement” हुआ था।
इस समझौते में पहली बार तय किया गया कि यमुना नदी के उपलब्ध जल का वितरण विभिन्न राज्यों के बीच निश्चित अनुपात में किया जाएगा। राजस्थान को भी कुल जल का लगभग 10.4 प्रतिशत हिस्सा दिया गया।
लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि राजस्थान तक यमुना का पानी पहुंचाने के लिए कोई संरचना (Infrastructure) मौजूद नहीं थी। न नहर थी और न ही पाइपलाइन। इसी कारण कागजों पर मिला पानी कभी राजस्थान तक पहुंच ही नहीं सका।
यही वजह रही कि लगभग तीन दशक तक राजस्थान अपने हिस्से का पानी होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं कर पाया।
आखिर 2026 में ऐसा क्या हुआ कि रास्ता साफ हो गया?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार, राजस्थान और हरियाणा सरकार के बीच लगातार कई दौर की बैठकें हुईं। फरवरी 2024 में त्रिपक्षीय एमओयू के जरिए परियोजना को दोबारा गति मिली।
इसके बाद तकनीकी अध्ययन, लागत निर्धारण, जल उपलब्धता, पाइपलाइन डिजाइन, भूमि अधिग्रहण और वित्तीय जिम्मेदारियों पर दोनों राज्यों के बीच विस्तृत चर्चा हुई।
29 जून 2026 को आखिरकार दोनों राज्यों ने परियोजना के क्रियान्वयन समझौते (MoA) पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही 32 वर्षों से रुकी परियोजना अब निर्माण के चरण में पहुंच गई।
क्या है राजस्थान-हरियाणा यमुना जल समझौता?
यह समझौता वास्तव में 1994 के अपर यमुना समझौते को जमीन पर लागू करने की कार्ययोजना है।
इसके तहत हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से मानसून के दौरान अतिरिक्त (Surplus) यमुना जल राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा।
राजस्थान को हर वर्ष लगभग 577 से 580 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी मिलेगा। यह पानी मुख्य रूप से जुलाई से अक्टूबर के बीच छोड़ा जाएगा, जब यमुना नदी में अतिरिक्त जल उपलब्ध रहता है।
यह परियोजना पूरी तरह पेयजल, भूजल सुधार और भविष्य में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार की गई है।
पानी राजस्थान तक कैसे पहुंचेगा?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: इस परियोजना की सबसे खास बात इसकी आधुनिक इंजीनियरिंग है। खुली नहर बनाने के बजाय लगभग 295 से 300 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन बनाई जाएगी।
इसमें लगभग 3.6 मीटर व्यास वाली तीन विशाल पाइपलाइनें बिछाई जाएंगी। पानी हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से निकलकर राजस्थान के चूरू जिले स्थित हंसियावास जलाशय तक पहुंचेगा।
भूमिगत पाइपलाइन होने के कारण पानी का वाष्पीकरण नहीं होगा, रिसाव बेहद कम होगा, अवैध जल चोरी नहीं होगी, रखरखाव आसान रहेगा, जल गुणवत्ता बेहतर बनी रहेगी और परियोजना पर कितना खर्च आएगा?
इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत लगभग 34,102 करोड़ रुपये बताई जा रही है। हालांकि शुरुआती पाइपलाइन निर्माण पर करीब 3900 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
शेष राशि जलाशय, पंपिंग स्टेशन, पाइपलाइन नेटवर्क, भूमि अधिग्रहण, जल वितरण प्रणाली और अन्य आधारभूत ढांचे पर खर्च होगी।
दोनों राज्यों के बीच लागत साझेदारी, रखरखाव, निगरानी और संचालन संबंधी जिम्मेदारियां भी समझौते में तय की गई हैं।
राजस्थान को इस समझौते से क्या-क्या फायदे होंगे?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: शेखावाटी का दशकों पुराना जल संकट खत्म होने की उम्मीद है। राजस्थान के चूरू, सीकर और झुंझुनूं जिले लंबे समय से पेयजल संकट झेल रहे हैं।
इन क्षेत्रों में अधिकांश गांवों में भूजल अत्यधिक खारा है और पीने योग्य पानी सीमित मात्रा में उपलब्ध होता है।
यमुना का सतही जल मिलने से लाखों लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सकेगा।
भूजल स्तर में आएगा सुधार
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: शेखावाटी क्षेत्र लंबे समय से डार्क जोन घोषित इलाकों में शामिल है। अत्यधिक बोरवेल और ट्यूबवेल उपयोग के कारण भूजल लगातार नीचे जा रहा है।
जब सतही जल उपलब्ध होगा तब भूजल दोहन कम होगा और प्राकृतिक रिचार्ज बढ़ेगा। इससे आने वाले वर्षों में जल स्तर में सुधार होने की उम्मीद है।
किसानों की बदलेगी तस्वीर
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: दूसरे चरण में करीब 1.05 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है।
इसमें चूरू की लगभग 35 हजार हेक्टेयर भूमि और झुंझुनूं की लगभग 70 हजार हेक्टेयर भूमि शामिल होगी।
इससे किसान वर्षा आधारित खेती से बाहर निकलकर अधिक उत्पादन वाली खेती कर सकेंगे।
75 लाख से अधिक लोगों को मिलेगा लाभ
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: सरकार का अनुमान है कि परियोजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 75 लाख लोगों को फायदा होगा।
भविष्य में यदि परियोजना का विस्तार होता है तो अन्य सीमावर्ती जिलों तक भी पानी पहुंचाया जा सकता है।
1994 के समझौते में किस राज्य को कितना पानी मिला था?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: अपर यमुना समझौते के अनुसार जल वितरण इस प्रकार तय किया गया था—
हरियाणा – 40.6%
उत्तर प्रदेश – 35.1%
राजस्थान – 10.4%
दिल्ली – 6.3%
हिमाचल प्रदेश – 1.7%
इसी हिस्से का वास्तविक उपयोग अब राजस्थान कर सकेगा।
रेणुका, किशाऊ और लखवार बांध क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मानसून के दौरान मिलने वाला पानी शेखावाटी की दीर्घकालिक जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाएगा।
इसलिए यमुना बेसिन में बनने वाले रेणुका बांध, किशाऊ बांध और लखवार बांध इस परियोजना की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
इनके बनने के बाद राजस्थान को अतिरिक्त लगभग 201 MCM पानी मिलने की संभावना है। इससे पूरे वर्ष जलापूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
हरियाणा को क्या नुकसान हो सकता है?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: कुछ जल विशेषज्ञों और सेवानिवृत्त सिंचाई अधिकारियों का मानना है कि मानसून के दौरान अतिरिक्त पानी राजस्थान भेजे जाने से हरियाणा के कुछ जिलों में प्राकृतिक भूजल रिचार्ज कम हो सकता है।
इन जिलों में यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल शामिल बताए जा रहे हैं।
हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि केवल अतिरिक्त (Surplus) जल ही राजस्थान भेजा जाएगा और हरियाणा के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
विपक्ष ने किन मुद्दों पर सवाल उठाए?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: कुछ राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों का कहना है कि हरियाणा को पहले पंजाब से अपने हिस्से का पूरा पानी मिलना चाहिए।
कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि मानसून के दौरान अतिरिक्त जल सीमित दिनों के लिए उपलब्ध रहता है, इसलिए राजस्थान को पूरे चार महीने लगातार पानी मिलना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यमुना में क्षमता से अधिक जल लगभग 25 से 30 दिनों तक ही रहता है।
परियोजना के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां होंगी?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: इतनी बड़ी अंतरराज्यीय परियोजना को समय पर पूरा करना आसान नहीं होगा।
सबसे बड़ी चुनौतियों में भूमि अधिग्रहण, पाइपलाइन निर्माण, पर्यावरणीय स्वीकृतियां, वित्तीय प्रबंधन, समयबद्ध निर्माण, जलाशयों का विकास और दोनों राज्यों के बीच निरंतर समन्वय शामिल हैं।
यदि निर्माण कार्य तय समय में पूरा होता है तो यह देश की सबसे बड़ी भूमिगत पेयजल पाइपलाइन परियोजनाओं में शामिल हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी की ‘सहकारी संघवाद’ नीति का उदाहरण
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस समझौते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “सहकारी संघवाद” (Cooperative Federalism) नीति का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा कि वर्षों से लंबित अंतरराज्यीय विवादों का समाधान केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और राज्यों के सहयोग से संभव है।
केंद्र सरकार का मानना है कि यह समझौता भविष्य में अन्य जल विवादों के समाधान का भी मॉडल बन सकता है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने क्या कहा?
32 साल बाद राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौता: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इसे शेखावाटी क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह 32 वर्षों से लंबित सपना था।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत ने इस परियोजना की नींव रखी थी, लेकिन विभिन्न कारणों से यह आगे नहीं बढ़ सकी। अब भाजपा सरकार ने इसे क्रियान्वयन के चरण तक पहुंचा दिया है।
राजस्थान-हरियाणा यमुना जल समझौता केवल दो राज्यों के बीच पानी का बंटवारा नहीं है, बल्कि यह तीन दशक पुराने अधूरे वादे को पूरा करने की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है।
यदि परियोजना तय समय और योजना के अनुसार पूरी होती है, तो शेखावाटी क्षेत्र में पेयजल संकट काफी हद तक कम हो सकता है, भूजल स्तर में सुधार आएगा, किसानों को सिंचाई का नया आधार मिलेगा और लाखों लोगों की जीवन गुणवत्ता बेहतर होगी।
हालांकि परियोजना की वास्तविक सफलता समयबद्ध निर्माण, जल उपलब्धता, पारदर्शी क्रियान्वयन और राज्यों के सतत सहयोग पर निर्भर करेगी।
आने वाले वर्षों में यह योजना न केवल राजस्थान की जल सुरक्षा को नई दिशा दे सकती है, बल्कि देश में अंतरराज्यीय जल प्रबंधन का एक सफल मॉडल भी बन सकती है।
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