शांति का नया फॉर्मूला या सियासी दांव: गाजा के लिए डोनाल्ड ट्रम्प के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए अभी भारत ने इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया है।
बताया जा रहा है कि ट्रम्प ने लगभग 50 देशों को न्योता भेजा था,
जिनमें से 30 देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए अपनी सहमति जताई है, लेकिन फ्रांस और कुछ यूरोपीय देशों ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है।
पाकिस्तान ने ट्रम्प के बोर्ड ऑफ पीस के न्योते को स्वीकार करते हुए इस पर अपनी सहमति जाहिर की है, लेकिन साथ ही उसने अपने पैर एक खतरनाक दलदल में भी डाल दिए हैं।
अभी फिलहाल, गाजा संकट से जुड़े युद्धविराम प्रयासों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
जहां कई देशों ने इस पहल का हिस्सा बनने पर सहमति जता दी है, वहीं कुछ यूरोपीय देशों ने इससे दूरी बना ली है।
भारत का रुख फिलहाल स्पष्ट नहीं है और नई दिल्ली अभी इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है।
चलिए आपको यहां बताते हैं कि बोर्ड ऑफ पीस क्या है? कौन-से मुस्लिम देश इसमें शामिल होने के लिए राजी हो गए हैं?
बोर्ड ऑफ पीस क्या है?
यह एक निगरानी समिति है, जिसमें कई देशों के नेता शामिल होते हैं। बोर्ड ऑफ पीस की शुरुआत गाजा में चल रहे संघर्ष को खत्म करने और वहां की व्यवस्था (जैसे पुनर्निर्माण, मानवीय सहायता) देखने के लिए की गई थी।
बोर्ड ऑफ पीस को गाजा सीजफायर के दूसरे चरण के तहत पेश किया गया है। इसका मकसद गाजा में अस्थायी प्रशासन, पुनर्निर्माण, फंडिंग और निवेश को एक संगठित ढांचे में लाना है।
इस बोर्ड की अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति ट्रंप कर रहे हैं। व्हाइट हाउस के मुताबिक, बोर्ड का हर सदस्य एक तय जिम्मेदारी संभालेगा,
जैसे शासन क्षमता बढ़ाना, क्षेत्रीय रिश्ते सुधारना, पुनर्निर्माण, निवेश आकर्षित करना और पूंजी जुटाना।
किन-किन देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में रहने की दी सहमति
बुधवार को विदेश मंत्रियों ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें कतर, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान,
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समेत 8 इस्लामिक देशों ने इसमें शामिल होने पर सहमति जताई है।
इस पहल का मकसद गाजा में स्थायी सीजफायर और प्रशासनिक व्यवस्था बनाना है, हालांकि इजराइल ने इस पर नाराजगी जताई है।
बयान में कहा गया कि सभी देशों ने मिलकर बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का फैसला लिया है और वे अपने-अपने देशों की कानूनी प्रक्रियाओं के तहत जरूरी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करेंगे।
मिस्र, पाकिस्तान और UAE पहले ही बोर्ड में शामिल होने की घोषणा कर चुके थे।
इन देशों ने बोर्ड से बनाई दूरी
कई देश ऐसे हैं जिन्होंने ट्रंप के प्रस्ताव को स्वीकार किया है, जिनमें अर्जेंटीना, आर्मीनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस,
मिस्र, हंगरी, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात और वियतनाम शामिल हैं।
इन देशों ने बोर्ड में शामिल होने के लिए अपनी-अपनी सहमति प्रकट की है। पाकिस्तान ने भी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने पर सहमति जताई है।
जानें, बोर्ड किस तरह से काम करेगा
अध्यक्ष (Chairperson) नेतृत्व करेगा और बैठकों का संचालन करेगा।
सदस्य (Members) शांति, समझौता और न्याय से जुड़े मुद्दों पर विचार करेंगे।
समय-समय पर बैठकें होंगी, जहां बातचीत और सहमति से फैसले लिए जाएंगे। अगर कहीं मतभेद होंगे, तो उन्हें बातचीत और आपसी समझ से सुलझाने की कोशिश की जाएगी।
पूरे कामकाज में ईमानदारी, पारदर्शिता और इंसानियत को सबसे ऊपर रखा जाएगा।
साधारण शब्दों में, बोर्ड ऑफ पीस का मकसद लोगों को जोड़ना, भरोसा बढ़ाना और समाज में शांति बनाए रखना है।

