Tuesday, July 7, 2026

Energy Drink Alert: बच्चों के लिए बन रहा साइलेंट किलर, विशेषज्ञों ने दी बड़ी चेतावनी!

Energy Drink Alert: क्या एनर्जी ड्रिंक वास्तव में ऊर्जा देती हैं या धीरे-धीरे बच्चों और युवाओं की सेहत को नुकसान पहुंचा रही हैं? हाल के वर्षों में एनर्जी ड्रिंक का चलन तेजी से बढ़ा है। आकर्षक विज्ञापन, सोशल मीडिया प्रमोशन और स्पोर्ट्स से जुड़ी ब्रांडिंग के कारण बड़ी संख्या में किशोर और युवा इनका सेवन कर रहे हैं। लेकिन अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस बढ़ती आदत को गंभीर चिंता का विषय बताया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एनर्जी ड्रिंक में मौजूद अधिक मात्रा में कैफीन, शुगर और अन्य एडिटिव्स बच्चों और युवाओं के शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

इसी बीच महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्कूलों के आसपास एनर्जी ड्रिंक की बिक्री पर रोक लगाने की पहल ने पूरे देश में इस विषय पर नई बहस छेड़ दी है। अब उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह के कदम उठाने की मांग तेज हो रही है।

महाराष्ट्र की पहल के बाद उत्तर प्रदेश में भी उठी मांग

Energy Drink Alert: जयपुर में आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम के दौरान खाद्य सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों के 500 मीटर के दायरे में एनर्जी ड्रिंक की बिक्री पर रोक लगाने का जो निर्णय लिया है, उसका अध्ययन अन्य राज्यों को भी करना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सहित देश के सभी राज्यों में बच्चों और किशोरों को कैफीन युक्त एनर्जी ड्रिंक की आसान उपलब्धता पर नियंत्रण लगाया जाना चाहिए।

उनका कहना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में युवाओं में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और तेजी से बढ़ सकती हैं।

विशेषज्ञों ने क्यों जताई चिंता?

Energy Drink Alert: स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एनर्जी ड्रिंक में कैफीन की मात्रा सामान्य सॉफ्ट ड्रिंक की तुलना में कहीं अधिक होती है। इसके अलावा इनमें अत्यधिक चीनी, कृत्रिम रंग, फ्लेवर और अन्य उत्तेजक तत्व भी मौजूद रहते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन पेयों का लगातार या अधिक मात्रा में सेवन करने से बच्चों और युवाओं में कई तरह की समस्याएं देखने को मिल सकती हैं, जिनमें शामिल हैं—

हृदय गति का असामान्य रूप से बढ़ना
हाई ब्लड प्रेशर
अनिद्रा और नींद की कमी
बेचैनी और घबराहट
डिहाइड्रेशन
ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन

डॉक्टरों के अनुसार जिन बच्चों का शरीर अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है, उन पर कैफीन का प्रभाव वयस्कों की तुलना में अधिक गंभीर हो सकता है।

18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध की सिफारिश

Energy Drink Alert: फूड सेफ्टी से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान नियमों के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए एनर्जी ड्रिंक उपयुक्त नहीं मानी जाती। ऐसे उत्पादों का सेवन कम उम्र के बच्चों में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकता है।

इसी कारण विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि स्कूलों के आसपास इनकी बिक्री पर प्रभावी निगरानी रखी जाए और नाबालिग बच्चों को इनकी उपलब्धता सीमित की जाए।

भ्रामक विज्ञापनों पर भी सख्त कार्रवाई की मांग

Energy Drink Alert: विशेषज्ञों ने केवल बिक्री ही नहीं बल्कि एनर्जी ड्रिंक के प्रचार-प्रसार पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि कई कंपनियां अपने विज्ञापनों में इन पेयों को तुरंत ऊर्जा देने वाला और प्रदर्शन बढ़ाने वाला उत्पाद बताकर युवाओं को आकर्षित करती हैं।

इसी संदर्भ में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में कई कंपनियों को नोटिस जारी किए हैं।

इनमें विशेष रूप से पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जा रहे ऐसे दावों पर आपत्ति जताई गई है जो उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई उत्पाद स्वास्थ्य संबंधी दावा करता है तो उसके पीछे पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण होना आवश्यक है।

पैकेजिंग और लेबलिंग में भी जरूरी हैं स्पष्ट चेतावनियां

Energy Drink Alert: स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एनर्जी ड्रिंक के प्रत्येक कैन या बोतल पर कैफीन की वास्तविक मात्रा, संभावित दुष्प्रभाव और आयु संबंधी चेतावनी स्पष्ट रूप से लिखी जानी चाहिए।

उनका मानना है कि उपभोक्ताओं को यह जानकारी आसानी से दिखाई देनी चाहिए कि यह पेय बच्चों, गर्भवती महिलाओं, हृदय रोगियों और कैफीन के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता।

स्कूलों के 500 मीटर दायरे में बिक्री रोकने का प्रस्ताव

Energy Drink Alert: विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि स्कूलों और कॉलेजों के 500 मीटर के दायरे में एनर्जी ड्रिंक की बिक्री पर प्रभावी प्रतिबंध लगाया जाए।

उनका कहना है कि जिस प्रकार तंबाकू और अन्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पादों पर नियंत्रण के नियम बनाए गए हैं, उसी तरह कैफीन युक्त एनर्जी ड्रिंक पर भी विशेष नीति तैयार करने की आवश्यकता है।

यदि ऐसा नियम लागू होता है तो बच्चों की इन उत्पादों तक पहुंच काफी हद तक सीमित हो सकती है।

एफएसएसएआई की नजर भ्रामक ब्रांडिंग पर

Energy Drink Alert: एफएसएसएआई ने हाल के महीनों में कुछ प्रमुख ब्रांडों की पैकेजिंग और विज्ञापनों की समीक्षा करते हुए यह स्पष्ट किया है कि उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले स्वास्थ्य संबंधी दावों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि “हेल्दी”, “इंस्टेंट एनर्जी”, “परफॉर्मेंस बूस्टर” जैसे शब्दों का उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब उनके समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हों।

डॉक्टरों की सलाह: सीमित रखें कैफीन का सेवन

विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि एनर्जी ड्रिंक में मौजूद कैफीन, शुगर और कृत्रिम तत्वों का अत्यधिक सेवन बच्चों और युवाओं के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।

विशेष रूप से हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, चिंता, अनिद्रा या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को इन पेयों से बचना चाहिए।

गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए भी ऐसे पेयों का सेवन उचित नहीं माना जाता। डॉक्टर संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, पौष्टिक भोजन और अच्छी नींद को ऊर्जा प्राप्त करने का सबसे सुरक्षित तरीका बताते हैं।

क्या भारत में सख्त नियमों की जरूरत है?

Energy Drink Alert: स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में एनर्जी ड्रिंक की बढ़ती खपत को देखते हुए अब स्पष्ट नियम और जागरूकता अभियान शुरू किए जाने चाहिए।

केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों को भी कैफीन के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना जरूरी है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को यह बताया जाए कि कृत्रिम ऊर्जा देने वाले पेयों की बजाय प्राकृतिक और संतुलित खानपान ही बेहतर विकल्प है।

एनर्जी ड्रिंक का बढ़ता उपयोग केवल एक लाइफस्टाइल ट्रेंड नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है।

विशेषज्ञों की राय है कि बच्चों और युवाओं में कैफीन की बढ़ती खपत पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में हृदय रोग, नींद संबंधी विकार, उच्च रक्तचाप और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का खतरा और बढ़ सकता है।

महाराष्ट्र द्वारा उठाया गया कदम अब दूसरे राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। यदि सरकार, स्वास्थ्य एजेंसियां, स्कूल और अभिभावक मिलकर जागरूकता और नियमन पर काम करें, तो आने वाली पीढ़ी को अनावश्यक स्वास्थ्य जोखिमों से बचाया जा सकता है।

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