चम्पत राय
श्रीराममंदिर में चढ़ावा चोरी से सनातन आस्था को गहन आघात लगा है और यह अक्षम्य अपराध है। परन्तु हिन्दू विरोधी शक्तियों द्वारा इस घटना को हिन्दू विरोध की ढाल बनाना और उसमें बहुत से रामभक्तों का भ्रमित होना और भी अधिक घातक रहा है।

एक ऐसे तपस्वी जिसने राम मंदिर के निर्माण के लिए अपना जीवन होम कर दिया, और जब मंदिर के भीतर कुछ गद्दारों ने सेंध लगाई, तो उन्हीं की सजगता ने उन चोरों को बेनकाब किया, इस प्रशासनिक चूक का बलि का बकरा बनाने के नाम पर उसी विभूति श्री चम्पत राय जी के ऊपर जो कीचड़ उछाली गयी और चरित्रहनन का कुत्सित प्रयास किया गया, वह हिन्दू विरोधी, रामजन्मभूमि आंदोलन विरोधी दीर्घकालीन षड्यन्त्र का हिस्सा है।
मीडिया ने चाहे जितनी नीचतापूर्ण रिपोर्टिंग से सनसनी फैलाने के लिए श्री चम्पत राय जी का चरित्रहनन किया, पर जैसे जैसे तथ्य सामने आते गए, उन्हें भी ढंक छिपाकर ही सही सच्चाई बतानी ही पड़ी।
इन सभी तथ्यों को यदि कोई भी बिना हिन्दू विरोधी नैरेटिव की noise के देखेगा तो सारा सच सामने आ जाता है, दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है।
श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव श्री चम्पत राय जी ने कैसे अपनी ईमानदारी और साहस से रामभक्तों के विश्वास को बचाने का बीड़ा उठाया, यह सत्य थोड़े दिन के लिए धुंधला जरूर किया गया, पर हर जगह से पड़ताल करने पर यही निकल कर सामने आ रहा है।

मई 2026 के महीने में मंदिर परिसर में सब कुछ शांत दिख रहा था, लेकिन भीतर ही भीतर कुछ लालची कर्मचारी अपनी साजिशें बुन रहे थे। चम्पत राय जी, जो हर समय मंदिर की व्यवस्थाओं में रमे रहते थे, उन्हें संदेह हुआ कि कुछ गड़बड़ है। मंदिर में वर्षों से सेवा कर रहे व्यक्ति को माहौल से भी संकेत मिल जाता है। चम्पत राय को भी मिल रहा था। मंदिर में आने वाला चढ़ावा रामभक्तों की आस्था थी। एक-एक रुपया श्रद्धा का था। और श्रद्धा के साथ खेल हो रहा हो, यह चम्पत राय सहन करने वालों में नहीं थे।
मई के महीने में एक दानदाता ने बड़ी रकम चढ़ावे में देने की बात कही। रकम कितनी थी, इसका अनुमान नहीं, साफ जानकारी थी। उन्हें कहा गया, दानपात्र में राशि डालिए। बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन जब गिनती की रिपोर्ट आई तो चौंकाने वाली बात सामने आई। जितनी रकम उस एक व्यक्ति ने चढ़ाई थी, कुल गिनती उससे भी कम निकली।
यहीं चम्पत राय का माथा ठनका।
उनकी पारखी नज़र ने पकड़ लिया कि दानदाताओं द्वारा दी गई रकम और गिनती की रिपोर्ट में अंतर है। उन्होंने समझ लिया कि बात सतह पर दिखने वाली गड़बड़ी से बड़ी है। यह केवल हिसाब की गलती नहीं हो सकती। यह भीतर तक गई हुई चोरी हो सकती है।
एक सजग प्रहरी की तरह उन्होंने तुरंत सक्रियता दिखाई। जब उन्हें पता चला कि कुछ लोग धोखे से चढ़ावे का पैसा अपनी जेबों में भर रहे हैं, तो चम्पत राय जी ने भयंकर क्रोधित होने के उपरांत भी अपनी जिम्मेदारियों से बंधकर आवश्यक कठोर कदम उठाने की समझदारी दिखाई।
सत्य यह है कि 27 मई को ही श्री चम्पत राय जी अत्यंत आक्रोश में स्वयं थाने पहुँचे थे ताकि तत्काल FIR दर्ज कराई जा सके और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए। जिसे बाद में तरह-तरह से घेरा गया, वही व्यक्ति सबसे पहले कानून की चौखट पर गया था।

लेकिन विडंबना देखिए, जिस व्यवस्था को उन्होंने सींचा, वहीं कुछ अदृश्य शक्तियों ने उन्हें रोक दिया। किसी ने दबाव डालकर FIR नहीं होने दी। कौन था वह? किसने रोका? किसके कहने पर रोका?
चम्पत राय यदि मामले को दबाना चाहते, तो 27 मई को थाने क्यों जाते? अगर उन्हें चोरी पर पर्दा डालना होता, तो सबसे पहले FIR की कोशिश क्यों करते? अगर उन्हें किसी को बचाना होता, तो कानून के दरवाजे पर दस्तक क्यों देते?
लेकिन चम्पत जी हार मानने वालों में से नहीं थे। चम्पत राय वापस आए। पर वापस आकर बैठे नहीं। यह समझना जरूरी है। FIR रुक गई, लेकिन कार्रवाई नहीं रुकी। जब पहला रास्ता बंद किया गया, तो दूसरा विधिक रास्ता खोजा गया। चोरी की रकम बरामद करनी थी। चोरों तक पहुंचना था। सबूत सुरक्षित करने थे। मंदिर की प्रतिष्ठा भी बचानी थी और अपराध भी पकड़ना था। उन्होंने एक ‘मिशन मोड’ रणनीति अपनाई, चोरी हुए पैसे की शत-प्रतिशत रिकवरी करना।

मंदिर में लगे CCTV फुटेज देखे जाने लगे। दानपात्र, काउंटिंग सेंटर, आने-जाने के रास्ते, नोटों की गड्डियां, जमा प्रक्रिया, हर चीज पर ध्यान दिया। चम्पत राय ने अंदाज़े से काम नहीं लिया। उन्होंने संकेतों को सबूत में बदलने के लिए दानपात्रों के अंदर ही हिडन CCTV इनस्टॉल करवाए ताकि चोरों को पूरे सबूतों के साथ पकड़ा जा सके।
मंदिर परिसर की सुरक्षा में लगे रिटायर्ड फौजी, पुलिस अमले और भरोसेमंद लोगों को साथ लिया गया और उन्होंने अपनी सूझबूझ व प्रशासनिक कौशल का परिचय देते हुए चोरों के खिलाफ एक ऐसा जाल बुना कि चोरों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं बचा।

एक दिन frisking की गई। लेकिन किसी को frisking की बात पता चल गई, तो चोरों ने पैसे जेब में न रखकर बाथरूम में छिपा दिए। सफाई कर्मचारियों ने रकम देखी और खबर चम्पत राय तक पहुंची। हिडन CCTV व अन्य माध्यमों से महत्त्वपूर्ण सबूत मिल चुके थे।
5 जून की उस रात की इतिहास गवाह है, जब चम्पत राय जी ने स्वयं पुलिस के साथ संदिग्धों के घरों पर छापेमारी करवाई। खुद पुलिस के साथ रेड की। इस पूरी योजना से एक-एक कर चोर पकड़े गए। किसी के घर से पैसे मिले, तो किसी के बैंक खातों से। चम्पत जी व पुलिस की इसी योजना और सजगता के कारण लगभग 79.5 लाख रुपये बरामद हुए, जिनमें से 58 लाख नगद थे।
यहाँ तक कि चोरी हुए डॉलर और सोने की चैन आदि भी उनकी सख्ती से वापस आ गए। 6 चोरों को चम्पत राय और पुलिस ने राम मंदिर के एक कक्ष में बंद कर दिया। जब्त माल भी लिखापढ़ी समेत राममन्दिर में ही सुरक्षित किया गया।
स्वयं चम्पत राय जी ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी से SIT के गठन का अनुरोध कर इस संदर्भ में व्यापक जांच का अनुरोध किया था।
फिर भी षड्यन्त्र क्या किया गया?

कहानी बनाई गई कि चम्पत राय सवालों में हैं।
अरे सवालों में वह क्यों हैं? सवालों में वे लोग क्यों नहीं हैं जो दानपात्र में हाथ डाल रहे थे? सवालों में वह व्यक्ति क्यों नहीं है जिसने 27 मई को FIR नहीं होने दी? सवालों में वे लोग क्यों नहीं हैं जिनकी सिफारिशों से ये लोग अंदर पहुंचे थे?
क्या इसी लिए पूरा षड्यन्त्र रचा गया था ? चोरी चोरों ने की। चोरी पकड़ी चम्पत राय ने। FIR कराने पहुंचे चम्पत राय। पुलिस बुलाई चम्पत राय ने। हिडन कैमेरा लगवाए चम्पत राय ने। रिकवरी करवाई चम्पत राय ने। फिर भी बदनाम कौन हुआ? चम्पत राय।
एक ऐसे संत को ‘लापरवाह’ ठहराने की कोशिश की गई, जिसने खुद पुलिस से चोरों के घर रेड करवाई। यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था, एक ऐसे रामभक्त को बलि का बकरा बनाने का, जिसने मंदिर की मर्यादा को बचाने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी।

सोचिए, जिस व्यक्ति ने मंदिर को अपना जीवन समर्पित किया, न केवल चोरी पकड़वाई, बल्कि एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश करवाया जो नोट गिनने की जगह तक कुछ आपराधिक सिफारिशों से पहुंच चुके थे। चम्पत जी ने यह साबित कर दिया कि वह मंदिर के केवल प्रशासक नहीं, बल्कि स्थिति की गम्भीरता को भांपकर कदम उठाने वाले संरक्षक थे।
चम्पत राय जी ने कभी निजी स्वार्थ नहीं देखा। उन्होंने हमेशा प्रोफेशनल तरीके से मंदिर चलाने की वकालत की और योग्य लोगों को लाने का प्रयास किया, लेकिन उनके प्रति द्वेष रखने वालों ने उनकी हर कोशिश को गलत रंग दिया। टिन्नू यादव जैसे लोगों के विश्वासघात की सजा उन्हें मिली। ऐसे षड्यन्त्र से चम्पत राय जी को हटा दोगे। राममन्दिर के बलिदानी इतिहास को नहीं बदल पाओगे।

आज जब सत्य सामने आ रहा है, तो दुनिया देख रही है कि श्री चम्पत राय जी की रामभक्ति और ईमानदारी पर सवाल कोई मूर्ख ही कर सकता है। उन्होंने न केवल चोरी का धन बरामद करवाया, बल्कि कानून के हर स्तर पर सहायक बने। उनके चरित्रहनन की कोशिश करने वाले आज खुद शर्मिंदा हैं क्योंकि CCTV फुटेज और पुलिस की रिकवरी रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि यदि चम्पत राय जी न होते, तो ये चोर करोड़ों रुपये लेकर रफूचक्कर हो चुके होते।
मंदिर पूर्ण हो गया तो लोभियों की नजर पड़ गयी। चमक सहन नहीं हुई। कुछ चूहे गांव की जमीन में सुराख करने के लिए भेजे गए। कहावत है गांव बसा नहीं कि….। पर गलती से सुरंग शेर की गुफा में ही खुल गई, शेर ने चूहों पर पंजा रख दिया। तब तक सियारों ने हुंआ हुंआ का शोर मचा दिया। गर्दभ गायन भी शुरू हो गया। ऊंटों ने नाच किया। मगरमच्छों को सरदार बनाने के लिए मेंढकों की अदालत ने शेर को जंगल से बाहर निकालने का फरमान सुना दिया।
श्री चम्पत राय जी का संघर्ष एक योद्धा का संघर्ष है, जिसने व्यवस्था की सड़न को साफ करने की कोशिश की और बदले में उसे साजिशों का सामना करना पड़ा। महाराणा सांगा को भी साथी सरदारों ने ही जहर दिया था। यह कोई नई बात नहीं है।

लेकिन सत्य सूर्य की तरह होता है, जिसे बादलों से कुछ देर के लिए ढका जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। राम मंदिर निर्माता श्री चम्पत राय जी की सत्यनिष्ठा आने वाली पीढ़ियों को बताएगी कि ईमानदारी का रास्ता कठिन ही होता है।

