Sunday, January 25, 2026

बाराबंकी कांड में नेताओं का दिखावा, असली दोषी ब्यूरोक्रेट बच निकला ?

बाराबंकी में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं की बेरहम पिटाई के बाद अब नेताओं की खानापूर्ति जारी है।

दोनों उपमुख्यमंत्री समेत बड़े-बड़े नेता केजीएमसी पहुँचकर घायल छात्रों का हालचाल ले रहे हैं और सोशल मीडिया पर सहानुभूति भरी तस्वीरें डाल रहे हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि जिस ब्यूरोक्रेट के आदेश पर पुलिस ने जानबूझकर लाठियां चलाईं, वह साफ-साफ बच निकला।

कार्यवाही के नाम पर केवल पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया गया, जो महज आदेशों का पालन कर रहे थे। नौकरशाही की यह ढाल पूरी तरह कारगर साबित हुई।

संगठन के बड़े पदाधिकारी कई तरह के बंधनों में बंधे होते हैं। वे न तो पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं और न ही खुलकर लिख-बोल सकते हैं। कई बार मजबूरी में बयान से पीछे हटना पड़ता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि वे छात्रों के साथ नहीं हैं, बल्कि संकेत स्पष्ट है कि निशाना किसे बनाना चाहिए।

विद्यार्थियों को उठानी होगी आवाज

दुर्भाग्य से छात्र उस ब्यूरोक्रेट पर सवाल उठाने के बजाय अपने ही पदाधिकारियों पर आरोप मढ़ रहे हैं। यह उनकी कमजोर समझ और दिशा भ्रम को दिखाता है।

असल लड़ाई सत्ता के गलियारों में बैठे उस अफसर से है जिसने यह पूरा कांड कराया।

चौंकाने वाली बात यह है कि 20-22 साल की उम्र के छात्र डर-डरकर बयान दे रहे हैं। उन्हें लगता है कि चुप्पी साधने से कुछ हासिल होगा।

हकीकत यही है कि डरने से कभी अधिकार नहीं मिलते। निडर होकर लिखने-बोलने से ही कुछ हासिल किया जा सकता है।

अगर उससे भी कुछ हाथ न लगा तो कम से कम निडरता और सच बोलने की आदत तो मिलेगी ही। यही छात्र आंदोलन की असली पूंजी है, जिसे डर और भ्रम में खोने नहीं देना चाहिए।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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