अखिलेश यादव पर राजनीतिक खतरा
अखिलेश यादव की ममता बनर्जी से हालिया मुलाकात उनकी राजनीतिक समझ पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
यह कदम उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी स्थिति को कमजोर करने वाला साबित होगा। राजनीतिक विश्लेषक इसे रणनीतिक भूल मान रहे हैं।
IPAC समझौता और वित्तीय व्यवस्था
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दोनों का IPAC कंपनी से समझौता था।
चुनाव प्रबंधन कंपनी की फीस हजारों करोड़ रुपये की बताई जाती है। समाजवादी पार्टी का मानना था कि पश्चिम बंगाल में ममता की जीत के बाद कोयला कारोबार से यह राशि जुटाई जा सकेगी।
किरणमय नंदा की अनसुनी चेतावनी
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता किरणमय नंदा ने अखिलेश को साफ चेतावनी दी थी। बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाले नंदा ने कहा था कि ममता डूबने वाली जहाज हैं। लेकिन अखिलेश ने इस सलाह को दरकिनार कर दिया। ममता के दावों पर भरोसा करना जारी रखा।
एजेंसियों की कार्रवाई के बावजूद समझौता जारी
केंद्रीय एजेंसियों ने बंगाल चुनाव से ठीक पहले IPAC के अधिकारियों को हिरासत में ले लिया था। इसके बावजूद अखिलेश ने अपना करार बरकरार रखा।
उन्हें पूरा विश्वास था कि चुनाव परिणाम ममता के पक्ष में आएंगे। जीत के बाद कोयला माफियाओं से वित्तीय व्यवस्था बन जाएगी।
चुनाव परिणाम से उपजी बेचैनी
बंगाल चुनाव परिणाम ने अखिलेश की सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया। उन्हें समझ आया कि IPAC को हजारों करोड़ की राशि देना असंभव होगा।
साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि सवर्ण हिंदुओं को निशाना बनाकर राजनीतिक लाभ नहीं मिल सकता।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ा ऐलान
अखिलेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में IPAC से समझौता खत्म करने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि अब वे अपने पंडित जी के निर्देशानुसार काम करेंगे।
बाल बढ़ाने या कटाने से लेकर कौन सा पैर पहले रखना है, सब पंडित जी तय करेंगे। यह बयान उनकी राजनीतिक मजबूरी को दर्शाता है।
वित्तीय संकट का सवाल
अखिलेश ने आरोप लगाया कि भाजपा की एजेंसियां हर जगह सक्रिय हैं। ऐसे में हजार करोड़ रुपये जुटाना असंभव है।
लेकिन सवाल उठता है कि बंगाल चुनाव से पहले समझौता करते समय उन्हें इतनी बड़ी राशि की व्यवस्था की उम्मीद कहां से थी।
बंगाल यात्रा की गलत टाइमिंग
ममता की हार के बाद अखिलेश को हिसाब किताब और शेष संभावनाओं पर चर्चा के लिए बंगाल जाना था। लेकिन इस यात्रा की टाइमिंग, बॉडी लैंग्वेज और मैसेजिंग पूरी तरह गलत साबित हुई। जारी की गई तस्वीर में ममता, अभिषेक और अखिलेश तीनों बेहद बेचैन नजर आए।
तस्वीर से झलकती हार की छाया
जारी की गई तस्वीर देखकर लगता है कि अखिलेश चुनाव से पहले ही हार मान चुके हैं। राजनीतिक कौशल होता तो वे सीधे तमिलनाडु के डीएमके नेता स्टालिन से मिलते।
वैचारिक आधार पर समर्थन जुटाने की कोशिश करते या इंडी एलायंस के सभी नेताओं से संपर्क बनाते।
गोपनीयता बनाम सार्वजनिक प्रदर्शन
राजनीतिक हिसाब किताब चुपचाप किया जाता है लेकिन अखिलेश इसे खुलेआम कर रहे हैं। यह उनकी अनुभवहीनता को दर्शाता है।
ऐसे मामलों में विवेक और गोपनीयता जरूरी होती है। सार्वजनिक प्रदर्शन से राजनीतिक नुकसान होता है।
पार्टी में विरोधाभासी संदेश
अखिलेश अब हर काम पंडित जी से पूछकर करने वाले हैं। वहीं उनकी पार्टी के लक्ष्मण यादव और राजकुमार भाटी ब्राह्मणवाद से मुक्ति का नारा दे रहे हैं। यह आंतरिक विरोधाभास समाजवादी पार्टी की रणनीतिक कमजोरी को उजागर करता है।
ब्राह्मण समाज की राजनीतिक समझ
ब्राह्मण समाज अब पहले जितना राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं दिखता। फिर भी वे PDA से अधिक समझदार हैं। उन्होंने अखिलेश के शासनकाल में सवर्णों के साथ हुए व्यवहार को देखा है। अनुभव के आधार पर वे अपना निर्णय लेंगे।
गलतियों का सिलसिला
पिछले एक सप्ताह में अखिलेश ने लगातार गलतियां की हैं। यह सिलसिला कब रुकेगा, कहना मुश्किल है। वे अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को बेवकूफ समझते हैं और बेवकूफ नेताओं को समझदार। यह सोच उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता पर सवाल खड़ा करती है।

