UP: उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनाव आते ही पुराने मुद्दे फिर चर्चा में आ जाते हैं। मुस्लिम आरक्षण भी ऐसा ही एक मुद्दा रहा है, जिसे समाजवादी पार्टी अलग-अलग चुनावों में उठाती रही है।
2017 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक बार फिर मुस्लिमों के आरक्षण का मुद्दा सामने रखा था।
हालांकि इस राजनीतिक दांव का चुनावी नतीजों पर वैसा असर नहीं दिखा, जैसी उम्मीद की जा रही थी। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी 2017 में सिर्फ 47 सीटों तक सिमट गई।
2016 में अखिलेश ने फिर उठाया आरक्षण का मुद्दा
2016 में अखिलेश यादव ने मुस्लिम आरक्षण को लेकर कहा था कि उनकी सरकार ने मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा किया है, लेकिन इसे लागू करने में कानूनी अड़चनें हैं।
उन्होंने संविधान में बदलाव की जरूरत का भी जिक्र किया था और कहा था कि बातचीत के जरिए इसका रास्ता निकाला जा सकता है।
अखिलेश ने सरकारी योजनाओं में मुस्लिम आबादी की भागीदारी बढ़ाने की बात भी कही थी।
उनका यह रुख समाजवादी पार्टी की उस राजनीति से जुड़ा था, जिसमें पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों को अपने राजनीतिक आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है।
2012 में किया गया था आरक्षण का वादा
मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा सपा के लिए नया नहीं था। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुस्लिमों से जुड़े कई वादे किए थे।
इनमें पिछड़े मुस्लिमों को आरक्षण देने के अलावा मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थान खोलने और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को फीस में राहत देने जैसी घोषणाएं भी शामिल थीं।
बाद के वर्षों में सपा के इस वादे को अक्सर 18 फीसदी मुस्लिम आरक्षण के नाम से राजनीतिक बहस में पेश किया गया।
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव ने भी मुस्लिमों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की बात दोहराई थी।
हालांकि, इस मुद्दे पर पार्टी के नेताओं के बयानों में हमेशा एकरूपता नहीं रही।
आजम खान के बयान से उठे सवाल
अगस्त 2016 में तत्कालीन सपा सरकार में मंत्री आजम खान ने विधानसभा में कहा था कि पार्टी ने 18 फीसदी आरक्षण का वादा नहीं किया था।
उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि संविधान में बदलाव के बिना इस तरह का आरक्षण देना संभव नहीं है।
इसके बाद मुस्लिम आरक्षण को लेकर सपा की रणनीति और उसके पुराने वादों पर सवाल उठे।
दूसरी ओर अखिलेश यादव ने इसी दौर में आरक्षण के मुद्दे को दोबारा उठाते हुए कहा कि कानूनी रास्ता निकालने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत पड़ सकती है।
यहीं से यह मुद्दा केवल सामाजिक न्याय या आरक्षण की बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यूपी के चुनावी समीकरणों से भी जोड़कर देखा जाने लगा।
यूपी में मुस्लिम आबादी कितनी है?
2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 3.84 करोड़ थी, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 19.26 फीसदी है। वहीं हिंदू आबादी करीब 79.73 फीसदी दर्ज की गई थी।
यानी उत्तर प्रदेश की आबादी में लगभग हर पांचवां व्यक्ति मुस्लिम समुदाय से आता है। यही वजह है कि राज्य की चुनावी राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है।
समाजवादी पार्टी के संदर्भ में यह महत्व और बढ़ जाता है। पार्टी की राजनीति को लंबे समय से MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से जोड़कर देखा जाता रहा है।
यादव वोट सपा का पारंपरिक आधार माना जाता है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भी लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़ा रहा है।
फिर 2017 में सपा को इतनी बड़ी हार क्यों मिली?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मुस्लिम मतदाता सपा के लिए इतना अहम था, तो 2017 में पार्टी को इतनी बड़ी हार क्यों मिली?
2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 403 में से 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। लेकिन 2017 में उसका प्रदर्शन पूरी तरह बदल गया।
भाजपा ने 312 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि सपा सिर्फ 47 सीटों पर रह गई। पार्टी का वोट शेयर भी करीब 21.82 फीसदी रहा।
इस तरह पांच साल के भीतर सपा को 177 विधानसभा सीटों का नुकसान हुआ।
विकास की राजनीति से लेकर कांग्रेस गठबंधन तक
2017 के चुनाव में अखिलेश यादव ने अपनी राजनीति को युवा और विकास केंद्रित छवि देने की कोशिश की।
एक्सप्रेसवे, मेट्रो, लैपटॉप वितरण और विकास परियोजनाओं को चुनावी अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया।
इसी दौरान समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन भी किया। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोटों को एकजुट करने की कोशिश के तौर पर देखा।
मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन बनाए रखना भी इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
लेकिन चुनावी नतीजों ने दिखा दिया कि केवल पारंपरिक वोट समीकरण के भरोसे सत्ता में वापसी आसान नहीं थी।
2017 में भाजपा की बड़ी जीत ने यूपी की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया और यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या केवल मुस्लिम-यादव आधार किसी पार्टी को बहुमत तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।
यही वजह है कि 2017 का चुनाव समाजवादी पार्टी की राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ माना जाता है। मुस्लिम आरक्षण जैसे पुराने मुद्दे मौजूद थे, लेकिन मतदाताओं का फैसला केवल इसी एक मुद्दे से तय नहीं हुआ।

