UP: गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम आते ही अक्सर सोशल मीडिया पर मजाक शुरू हो जाता है। लेकिन अगर भावनाओं से अलग हटकर इनके आर्थिक इस्तेमाल को देखा जाए, तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है।
उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में देसी गाय के गोबर और गौमूत्र को अब बेकार समझने के बजाय कमाई और रोजगार के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में गाय के गोबर और गौमूत्र से करीब 200 तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें साबुन, शैम्पू, अर्क, जैविक खाद और प्राकृतिक कृषि उत्पाद शामिल हैं।
यानी जिस चीज को कभी कचरा समझकर फेंक दिया जाता था, वही अब किसानों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बन रही है।
खेत से बाजार तक जुड़ी पूरी अर्थव्यवस्था
ऑर्गेनिक खेती में प्राकृतिक खाद और जैविक कीटनाशकों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। गोबर से तैयार खाद मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद करती है,
जबकि गौमूत्र आधारित कुछ जैविक उत्पादों का इस्तेमाल प्राकृतिक कीटनाशक के तौर पर किया जाता है। इससे किसानों को रासायनिक इनपुट पर होने वाले खर्च को कम करने में मदद मिल सकती है।
इस मॉडल की एक मिसाल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में देखने को मिलती है। यहां एक FPO यानी Farmer Producer Organisation के जरिए 15 गांवों में स्थानीय संग्रह केंद्र बनाए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन केंद्रों के माध्यम से रोज करीब 500 लीटर गौमूत्र 10 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदा जा रहा है।
महिलाओं को भी मिला कमाई का मौका
इस व्यवस्था की खास बात सिर्फ गौमूत्र की खरीद नहीं है, बल्कि इससे जुड़ा ग्रामीण रोजगार मॉडल भी है।
गांवों में करीब 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं, जहां गौमूत्र को संग्रहित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया से लगभग 300 महिलाएं जुड़ी हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को प्रति लीटर 2 रुपये का कमीशन मिलने के साथ FPO में शेयरहोल्डर भी बनाया गया है।
यानी यह व्यवस्था केवल एक उत्पाद की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश भी है।
गाय बना सकती है ‘थ्री-इन-वन’ मॉडल
इस मॉडल को सरल भाषा में समझें तो एक किसान के पास मौजूद गाय से आय के तीन रास्ते बन सकते हैं। पहला, दूध से होने वाली कमाई।
दूसरा, गोबर से तैयार खाद, जिससे खेत में इस्तेमाल होने वाले बाहरी इनपुट का खर्च घटाया जा सकता है। तीसरा, गौमूत्र की बिक्री से मिलने वाली अतिरिक्त आमदनी।
यही वजह है कि गाय को सिर्फ दूध देने वाले पशु के रूप में देखने के बजाय उसके दूसरे उत्पादों की आर्थिक उपयोगिता पर भी चर्चा जरूरी है।
छोटे प्रयोग से बड़े बदलाव की उम्मीद
बुलंदशहर के 15 गांवों में शुरू हुआ यह प्रयोग अभी स्थानीय स्तर का मॉडल है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसान, महिलाएं, FPO और कृषि व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
अगर ऐसे मॉडल वैज्ञानिक जांच, बेहतर गुणवत्ता नियंत्रण और पारदर्शी बाजार व्यवस्था के साथ बड़े स्तर पर लागू किए जाएं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
इस पूरे विषय को लेकर सबसे जरूरी बात यही है कि किसी भी संसाधन का मूल्य उसके नाम या उससे जुड़े मजाक से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक उपयोग और आर्थिक संभावनाओं से तय होना चाहिए।
गोबर और गौमूत्र के हर उत्पाद को वैज्ञानिक रूप से प्रभावी मान लेना सही नहीं होगा, लेकिन जहां इनका व्यावहारिक और बाजार आधारित इस्तेमाल सफल हो रहा है, वहां उसे गंभीरता से समझना भी उतना ही जरूरी है।
आखिरकार सवाल गाय, गोबर या गौमूत्र का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो किसी चीज की उपयोगिता समझने से पहले ही उसका मजाक बना देती है।
अगर कोई मॉडल किसान का खर्च कम करता है, अतिरिक्त आय पैदा करता है और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ता है, तो उसे उपहास नहीं, बल्कि तथ्यों और परिणामों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

