बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: भारत की राजनीति में जाति और धर्म हमेशा असर डालते हैं और पश्चिम बंगाल भी इससे अलग नहीं है।
2014 के बाद बीजेपी ने पूरे देश में अपनी पकड़ बढ़ाई, लेकिन बंगाल ऐसा राज्य रहा जहाँ पार्टी की कोशिशें बार-बार असफल होती रही हैं।
ममता बनर्जी लगातार 14 साल से मुख्यमंत्री हैं और यह स्थिरता बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
बीजेपी की शुरुआत से 2021 तक की चुनावी कहानी
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: साल 2011 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था।
2016 में देश में मोदी लहर थी लेकिन बंगाल में पार्टी सिर्फ तीन सीटें ही जीत सकी। 2021 के चुनाव में पूरे दमखम के बावजूद बीजेपी 77 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई।
294 सीटों वाली विधानसभा में सत्ता के लिए 148 सीटें चाहिए, और बीजेपी उससे काफी नीचे रह जाती है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे बड़े नेताओं की सक्रियता के बावजूद पार्टी बंगाल की चुनावी ज़मीन पर मजबूत पकड़ बनाने में संघर्ष कर रही है।
बीजेपी के लिए बंगाल की रणनीतिक अहमियत
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: पश्चिम बंगाल जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमि है और 42 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में मजबूत पकड़ केंद्र में किसी भी पार्टी की स्थिति को मजबूत बनाती है।
बीजेपी यहां कानून-व्यवस्था, बांग्लादेशी घुसपैठ, मुस्लिम तुष्टिकरण, उद्योगों की गिरावट और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाती है।
पार्टी का तर्क है कि राज्य में जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा है और विकास बाधित हुआ है।
2026 की तैयारी: बीजेपी का संगठनात्मक पुनर्गठन
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: बीजेपी ने पश्चिम बंगाल को छह जोनों में विभाजित किया है और मंगल पांडेय, सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव और बिप्लब देब जैसे नेताओं को अहम जिम्मेदारियाँ दी हैं।
संघ के साथ तालमेल बढ़ाया जा रहा है और नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने की प्रक्रिया तेज की गई है। टीएमसी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी को जनता तक पहुँचाने की भी कोशिश की जा रही है।
लेकिन इन सबके बाद भी पार्टी की राह आसान नहीं है क्योंकि स्थानीय स्तर पर उसका प्रभाव सीमित बना हुआ है।
वोट गणित: बंगाल में क्यों नहीं बनता भाजपा का खेल?
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 18 सीटें जीती थीं, जिसने पार्टी को बड़ी उम्मीद दी।
लेकिन 2024 में यह संख्या घटकर 12 रह गई, जबकि तृणमूल कांग्रेस 29 सीटों पर जीतकर और मजबूत हो गई।
यह गिरावट बताती है कि बीजेपी का वोट शेयर स्थायी नहीं है और पार्टी अभी भी बंगाल में वह स्थिर जनाधार नहीं बना पाई है, जो सत्ता परिवर्तन के लिए जरूरी है।
‘हिंदी इंपोजीशन’ और बंगाली अस्मिता का सवाल
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी और शहरी मतदाता मानते हैं कि बीजेपी हिंदी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देती है, जिसे वे बंगाली अस्मिता पर हस्तक्षेप की तरह देखते हैं।
इसके उलट ममता बनर्जी की ‘मां, माटी, मानुष’ वाली छवि स्थानीय जुड़ाव पैदा करती है। उनकी भाषा, उनका अंदाज़ और उनकी राजनीति बंगाल की सांस्कृतिक जमीन से मेल खाती है।
बीजेपी के पास अभी भी ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो बंगाली भावनाओं को उसी तरह से संबोधित कर सके।
बीजेपी के भीतर का कलह और नेतृत्व संकट
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: पार्टी के भीतर नेतृत्व की खींचतान भी बड़ी समस्या है। दिलीप घोष, समिक भट्टाचार्य और सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के बीच टकराव की खबरें आती रहती हैं।
सुवेंदु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के करीबी थे, बीजेपी में आने के बाद भी कई स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेलते हैं।
अंदरूनी असहमति का यह माहौल पार्टी को एकजुट होकर रणनीति बनाने से रोकता है, जो चुनावी राजनीति में बड़ी बाधा बन जाता है।
मुस्लिम आबादी का निर्णायक असर
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: पश्चिम बंगाल की लगभग 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और करीब 135 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव सीधा पड़ता है।
मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण परगना जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
इन इलाकों में बीजेपी का प्रदर्शन हमेशा कमजोर रहा है और मुस्लिम वोट लगभग पूरी तरह टीएमसी के पक्ष में एकजुट रहता है। यह समीकरण बीजेपी को बहुमत की दहलीज से दूर कर देता है।
ममता बनर्जी का प्रभाव और उनका ‘दीदी’ फैक्टर
बंगाल में क्यों रुक जाती है BJP की रफ़्तार: ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। उनकी लोकप्रियता, उनकी धरातलीय छवि और ‘दीदी’ का संबोधन उन्हें एक भावनात्मक नेतृत्व देता है।
लक्ष्मी भंडार, पेंशन योजनाएँ, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए विशेष योजनाएँ उन्हें और मजबूत बनाती हैं।
साथ ही मुस्लिम मतदाता उनके साथ स्थायी रूप से जुड़ा रहता है।
बीजेपी अब तक उनके बराबर का स्थानीय कद वाला नेता नहीं तैयार कर सकी है, जिससे चुनाव हर बार ममता बनर्जी बनाम मोदी में बदल जाता है।
बाहरी बनाम स्थानीय, संस्कृति की टकराहट
बंगाल में लोग अपनी भाषा, संगीत, साहित्य और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।
हिंदुत्व की विचारधारा से सहमत कई लोग भी चुनाव के समय बीजेपी को “बाहरी पार्टी” के रूप में देखने लगते हैं क्योंकि चुनाव प्रचार में पार्टी के बड़े चेहरे बाहर से आते हैं।
स्थानीय नेतृत्व का अभाव बीजेपी को वास्तविक राजनीतिक जड़ें जमाने नहीं देता। 2024 के चुनाव में बीजेपी के वोट प्रतिशत में कमी इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है।
2026 का चुनाव, बीजेपी के लिए सबसे कठिन परीक्षा
पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने संगठन, प्रचार और रणनीति के स्तर पर व्यापक बदलाव किए हैं, लेकिन राज्य की सांस्कृतिक राजनीति, ममता बनर्जी का दबदबा, मुस्लिम वोटों की एकजुटता, भाषा की संवेदनशीलता और पार्टी के भीतर के मतभेद बीजेपी की जीत की राह को जटिल बनाते हैं।
2026 का चुनाव यह तय करेगा कि बीजेपी इन बहुस्तरीय चुनौतियों को पार कर सकती है या फिर बंगाल में उसका संघर्ष जारी रहेगा।

