Tuesday, January 27, 2026

UGC की नई गाइडलाइन जनरल छात्रों में डर भरने की पाइपलाइन?

UGC

उच्च शिक्षा में समानता का दावा या संस्थागत अविश्वास की नई संरचना

15 जनवरी 2026 से देशभर के सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू हुई यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की नई गाइडलाइन ने शिक्षा जगत में एक गहरी और असहज बहस को जन्म दे दिया है।

यह बहस केवल किसी एक नियम या प्रशासनिक बदलाव की नहीं है, बल्कि उस दिशा की है जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को आगे बढ़ाया जा रहा है।

सवाल समानता और न्याय का है, लेकिन उससे भी अधिक सवाल उस प्रक्रिया का है जिसके माध्यम से समानता हासिल करने का दावा किया जा रहा है।

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी UGC देश में उच्च शिक्षा का सबसे प्रभावशाली नियामक निकाय है। इसकी स्थापना 28 दिसंबर 1953 को हुई थी और 1956 में इसे वैधानिक संस्था का दर्जा दिया गया।

विश्वविद्यालयों को मान्यता देना, उन्हें वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना, पाठ्यक्रम और शैक्षणिक मानकों को तय करना, यह सब UGC के अधिकार क्षेत्र में आता है।

इसलिए UGC का हर नया रेगुलेशन केवल प्रशासनिक आदेश नहीं होता, बल्कि वह देश की बौद्धिक और सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करता है।

क्या है नई गाइडलाइन और उसका घोषित उद्देश्य

UGC ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026 नाम से नई गाइडलाइन अधिसूचित की है। यह 2012 में बनाए गए पुराने नियमों को पूरी तरह से प्रतिस्थापित करती है।

इस फ्रेमवर्क को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में निहित इक्विटी और इनक्लूजन की भावना से जोड़कर देखा जा रहा है।

गाइडलाइन का घोषित उद्देश्य धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, सामाजिक स्थिति और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना है।

विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, महिलाएं और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों में सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करने की बात कही गई है।

कागज पर यह उद्देश्य निर्विवाद और नैतिक रूप से मजबूत दिखाई देता है। समस्या तब शुरू होती है जब इस उद्देश्य को लागू करने के लिए बनाए गए प्रावधानों की प्रकृति और उनके संभावित प्रभावों को देखा जाता है।

रोहित वेमुला प्रकरण और न्यायिक पृष्ठभूमि

नई गाइडलाइन की पृष्ठभूमि को समझने के लिए 17 जनवरी 2016 की उस घटना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसने देशभर के शैक्षणिक परिसरों को झकझोर दिया था।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव के प्रश्न को राष्ट्रीय और न्यायिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।

रोहित वेमुला और बाद में पायल तडवी जैसे मामलों में यह आरोप सामने आए कि पिछड़े वर्गों से आने वाले छात्रों को संस्थानों में मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।

इन मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। अदालत ने यह माना कि 2012 के UGC नियम पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं और आयोग को नए तथा अधिक स्पष्ट दिशा निर्देश बनाने चाहिए।

इसी न्यायिक पृष्ठभूमि में UGC ने नई इक्विटी गाइडलाइन तैयार की। इसका स्पष्ट लक्ष्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को SC ST और OBC फ्रेंडली बनाना बताया गया।

नई गाइडलाइन के प्रमुख प्रावधान

नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में एक इक्विटी कमिटी बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। इस कमिटी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और दिव्यांग व्यक्तियों के प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। कमिटी की अध्यक्षता संस्थान प्रमुख करेगा।

इसके साथ ही हर संस्थान में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर की स्थापना अनिवार्य की गई है। यह केंद्र काउंसलिंग, शिकायत निवारण, इनक्लूजन से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी और बाहरी एजेंसियों के साथ समन्वय का मुख्य केंद्र होगा। यदि किसी कॉलेज में पर्याप्त स्टाफ नहीं है, तो उससे संबद्ध विश्वविद्यालय यह जिम्मेदारी निभाएगा।

गाइडलाइन में इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी एम्बेसडर जैसी नई संरचनाएं भी जोड़ी गई हैं। इनका काम कैंपस में निगरानी करना और संभावित भेदभाव की घटनाओं की रिपोर्ट करना होगा।

शिकायत व्यवस्था को अत्यंत कठोर और त्वरित बनाया गया है। चौबीस घंटे उपलब्ध हेल्पलाइन, ऑनलाइन और लिखित शिकायत की सुविधा दी गई है। शिकायत मिलने के चौबीस घंटे के भीतर प्रारंभिक कार्रवाई अनिवार्य है और साठ दिनों के भीतर जांच पूरी करनी होगी। यदि शिकायत में शुरू से ही आपराधिक तत्व दिखाई देता है, तो मामला सीधे पुलिस को भेजा जा सकता है।

अनुपालन न करने पर कठोर दंड

UGC ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई संस्थान इन गाइडलाइंस का पालन नहीं करता, तो उसकी मान्यता समाप्त की जा सकती है और फंडिंग रोकी जा सकती है। यानी यह केवल सलाहात्मक दिशा निर्देश नहीं हैं, बल्कि दंडात्मक शक्ति से लैस आदेश हैं।

जनरल कैटेगरी के छात्रों की आपत्तियां और आशंकाएं

यहीं से विवाद का असली केंद्र उभरता है। सामान्य श्रेणी के छात्रों और कई शिक्षाविदों का तर्क है कि यह फ्रेमवर्क समानता के नाम पर एकतरफा व्यवस्था खड़ी करता है। उनका कहना है कि नियमों की संरचना यह मानकर चलती है कि जातिगत भेदभाव का अपराधी हमेशा सामान्य जाति से ही होगा और शिकायतकर्ता हमेशा सत्य होगा।

सबसे गंभीर आपत्ति यह है कि गाइडलाइन में जानबूझकर की गई झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंड प्रावधान नहीं है। शिकायतकर्ता की गोपनीयता, सुरक्षा और त्वरित सुनवाई पर तो पूरा जोर है, लेकिन यदि कोई शिकायत झूठी पाई जाती है, तो उसके परिणाम क्या होंगे, इस पर नियम पूरी तरह मौन हैं।

इससे यह भय पैदा हो रहा है कि व्यक्तिगत रंजिश, वैचारिक असहमति या बदले की भावना से की गई शिकायतें भी किसी छात्र या शिक्षक का शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य बर्बाद कर सकती हैं। चौबीस घंटे में शुरू होने वाली कार्रवाई और संस्थागत दबाव के बीच निष्पक्ष जांच की संभावना पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इक्विटी और न्याय के बीच बुनियादी अंतर

इस पूरे विमर्श में एक बुनियादी अवधारणात्मक अंतर उभरकर सामने आता है। इक्विटी और न्याय समान नहीं हैं। इक्विटी विशेष संरक्षण की बात करती है, जबकि न्याय समान प्रक्रिया की मांग करता है। आलोचकों का कहना है कि नई गाइडलाइन इक्विटी के नाम पर न्याय की बुनियादी शर्तों को कमजोर करती है।

यदि किसी व्यवस्था में आरोप लगाना आसान हो, लेकिन आरोप के दुरुपयोग पर कोई जवाबदेही न हो, तो वह व्यवस्था संतुलन खो देती है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह असंतुलन भय और आत्मसेंसरशिप को जन्म देता है।

भारतीय उच्च शिक्षा की गहरी संरचनात्मक समस्या

इस बहस के पीछे एक और बड़ी सच्चाई छिपी है। देश में हजारों कॉलेज और विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां शिक्षा केवल डिग्री वितरण का माध्यम बन चुकी है। कहीं शिक्षक नहीं हैं, कहीं शोध का वातावरण नहीं है और कहीं एक क्लर्क पूरा कॉलेज चला रहा है। ऐसे कमजोर और खोखले ढांचे में जब अत्यधिक शक्तिशाली नियामक हथियार दिए जाते हैं, तो उनके दुरुपयोग की संभावना और बढ़ जाती है।

UGC जैसी संस्था पहले से ही अत्यधिक शक्तिशाली है। वह डिग्रियों की मान्यता तय करती है, पाठ्यक्रम निर्धारित करती है और फंडिंग नियंत्रित करती है। यदि ऐसी संस्था असंतुलित और एकतरफा नियम बनाती है, तो उसका प्रभाव केवल कैंपस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की वैचारिक दिशा को भी प्रभावित करता है।

UGC की नई इक्विटी गाइडलाइन 2026 एक वास्तविक सामाजिक समस्या से जन्मी है और उसका उद्देश्य कागज पर नैतिक रूप से मजबूत दिखाई देता है। लेकिन जिस ढांचे में इसे लागू किया जा रहा है, उसमें प्रक्रियात्मक न्याय, संतुलन और जवाबदेही की गंभीर कमी नजर आती है।

भेदभाव को समाप्त करने की कोशिश यदि अविश्वास, भय और वैचारिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे, तो शिक्षा संस्थान ज्ञान और विमर्श के केंद्र नहीं रह जाते। वे स्थायी संघर्ष और संदेह के क्षेत्र बन जाते हैं।

असली प्रश्न यही है कि क्या यह गाइडलाइन उच्च शिक्षा में वास्तविक समानता लाने में सक्षम होगी, या फिर यह एक और ऐसा प्रयोग साबित होगी जो शिक्षा को सामाजिक विभाजन की प्रयोगशाला में बदल देगा।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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