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लोकसभा अध्यक्ष के सामने पहुंचा विवाद
तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने दावा किया कि उन्होंने एक ऐसी पार्टी में विलय कर लिया है, जिसका देश में किसी भी स्तर पर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है। इस कदम ने दल बदल कानून की सीमा पर नया विवाद खड़ा कर दिया है।
यूसुफ पठान, सायोनी घोष, काकोली घोष दस्तीदार और सुखेंदु रे उन नेताओं में शामिल बताए जा रहे हैं, जिन्होंने तृणमूल नेतृत्व से अपनी नाराजगी जताई है। इन सांसदों का यह कदम साफ तौर पर दल बदल कानून के तहत संभावित अयोग्यता से बचने की कोशिश माना जा रहा है।
यह मामला इस साल दूसरी बार सामने आया है, जब सांसदों के एक समूह ने इसी तरह विलय का रास्ता चुनकर दल बदल कानून की कार्रवाई से बचने की कोशिश की है। इससे पहले राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने भी लगभग इसी तरह का कदम उठाया था।
पूरे विवाद का केंद्र राजनीतिक संख्या नहीं, बल्कि संविधान की वह अनसुलझी कानूनी व्याख्या है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट अब तक अंतिम निर्णय नहीं दे पाया है। सवाल यह है कि क्या विधायक या सांसद खुद विलय घोषित कर सकते हैं, या मूल राजनीतिक दल की सहमति जरूरी है।
दल बदल कानून क्या कहता है
भारत में दल बदल कानून संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत लागू किया गया था। यह प्रावधान 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए आया। इसका उद्देश्य उन राजनीतिक परिस्थितियों को रोकना था, जिनमें निर्वाचित प्रतिनिधि सत्ता बदलने या निजी लाभ के लिए बीच कार्यकाल में दल बदलते थे।
दसवीं अनुसूची के अनुसार, कोई विधायक या सांसद यदि स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में पार्टी के निर्देश के विपरीत मतदान करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। यही नियम राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए बनाया गया था।
इस कानून में शुरुआत में दो प्रमुख अपवाद रखे गए थे। पहला अपवाद विभाजन से जुड़ा था। यदि किसी दल के एक तिहाई विधायक या सांसद अलग हो जाते थे, तो उन्हें अयोग्यता से सुरक्षा मिल सकती थी। बाद में इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग सामने आया।
2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए विभाजन वाला अपवाद हटा दिया गया। इसके बाद दसवीं अनुसूची में केवल एक बड़ा अपवाद बचा, जिसे विलय कहा जाता है। इसी विलय प्रावधान की व्याख्या आज तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे मामलों में विवाद का केंद्र बनी हुई है।
विलय की शर्तें और कानूनी पेच
दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 में विलय से जुड़ी शर्तें तय की गई हैं। इसके अनुसार, अयोग्यता लागू नहीं होगी यदि मूल राजनीतिक दल किसी अन्य दल में विलय करता है और उस दल के विधायी समूह के कम से कम दो तिहाई सदस्य उस विलय से सहमत होते हैं।
इस भाषा से दो अलग शर्तें निकलती हैं। पहली, निर्णय मूल राजनीतिक दल के स्तर पर होना चाहिए। दूसरी, उस दल के विधायी समूह में कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति होनी चाहिए। विवाद इसी बात पर है कि दोनों शर्तें अनिवार्य हैं या केवल विधायी संख्या पर्याप्त है।
यदि केवल दो तिहाई विधायकों या सांसदों को पर्याप्त माना जाए, तो कोई भी बड़ा विधायी समूह अपने मूल दल से अलग होकर विलय का दावा कर सकता है। इससे वह उसी दल से अलग भी हो जाएगा और दल बदल कानून की अयोग्यता से बचने का दावा भी करेगा।
तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ऐसा करना मूल राजनीतिक दल की भूमिका को समाप्त कर देता है। पार्टी का तर्क है कि चुनाव चिन्ह, संगठन, प्रत्याशी चयन और व्हिप जारी करने का अधिकार राजनीतिक दल का होता है, केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों का नहीं।
तृणमूल कांग्रेस में बगावत कैसे बढ़ी
तृणमूल कांग्रेस का यह संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद गहरा हुआ। उस चुनाव में भाजपा ने पहली बार राज्य में सरकार बनाई। इसके बाद तृणमूल की संसदीय इकाई के भीतर असंतोष तेजी से सामने आने लगा।
काकोली घोष दस्तीदार को चीफ व्हिप पद से हटाए जाने के बाद वह बागी खेमे का प्रमुख चेहरा बनकर उभरीं। उनके साथ पूर्व लोकसभा फ्लोर लीडर सुदीप बंदोपाध्याय, उपनेता शताब्दी रे और कई अन्य सांसदों के नाम भी जुड़े।
बागी सांसदों में अभिनेता दीपक अधिकारी, सायोनी घोष, जून मालिया, पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान और पूर्व भारतीय फुटबॉल कप्तान प्रसून बनर्जी जैसे नाम शामिल बताए गए हैं। इस सूची से साफ है कि यह केवल एक छोटे समूह की नाराजगी नहीं, बल्कि संसदीय दल में व्यापक विद्रोह है।
रविवार को 19 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने व्यक्तिगत रूप से अपने पत्र जमा किए। बीसवीं सांसद रचना बनर्जी ने मलेशिया से अपनी सहमति पत्र के जरिए भेजी। इन सभी ने दावा किया कि वे नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर चुके हैं।
NCPI को लेकर सवाल क्यों उठे
तृणमूल के बागी सांसदों ने जिस पार्टी में विलय का दावा किया है, उसका नाम नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI है। यह पार्टी 2022 में पंजीकृत हुई थी और 2023 में चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन फिलहाल उसके पास कोई निर्वाचित सीट नहीं है।
यह तथ्य विवाद को और गंभीर बनाता है। 20 सांसद ऐसे दल में विलय का दावा कर रहे हैं, जिसकी संसद, विधानसभा या किसी अन्य निर्वाचित निकाय में मौजूदगी नहीं है। यही कारण है कि इसे केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक पहेली माना जा रहा है।
बागी खेमे से जुड़े राजनीतिक हलकों में यह तर्क सामने आया कि NCPI का चयन इसलिए किया गया ताकि पश्चिम बंगाल से प्रतीकात्मक जुड़ाव बना रहे और पूर्वोत्तर तक राजनीतिक विस्तार का संकेत भी दिया जा सके। लेकिन कानूनी तौर पर यह चयन अपने आप में पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यदि लोकसभा अध्यक्ष इस विलय को मान्यता देते हैं, तो तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा में संख्या लगभग 28 से घटकर आठ रह जाएगी। राज्यसभा में पार्टी की संख्या पहले ही 13 से घटकर 10 हो चुकी है। इससे संसद में शक्ति संतुलन पर असर पड़ेगा।
NDA की संख्या पर संभावित असर
इस विलय को स्वीकार किए जाने की स्थिति में एनडीए की लोकसभा संख्या 294 से बढ़कर 314 हो जाएगी। हालांकि यह संख्या अभी भी दो तिहाई बहुमत से 46 सीट कम रहेगी। इसके बावजूद केंद्र की संसदीय स्थिति पहले से अधिक मजबूत हो सकती है।
ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में भी इसका व्यापक असर माना जा रहा है। वहां एनडीए दो तिहाई बहुमत की दहलीज से केवल आठ सीट दूर रह सकता है। इसलिए यह विवाद सिर्फ तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसदीय गणित से भी जुड़ गया है।
तृणमूल नेतृत्व ने रविवार को अपनी ओर से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। पार्टी के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि दसवीं अनुसूची में अब विभाजन का प्रावधान उपलब्ध नहीं है और तृणमूल एक अविभाज्य राजनीतिक दल है।
अभिषेक बनर्जी ने 2023 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का आधार लिया। उस फैसले में राजनीतिक दल और उसके विधायी दल के बीच स्पष्ट अंतर बताया गया था। तृणमूल इसी आधार पर बागी सांसदों के दावे को चुनौती दे रही है।
तृणमूल का कानूनी तर्क
तृणमूल कांग्रेस का मूल तर्क है कि सांसदों का समूह अपने स्तर पर अलग दल बनाकर या किसी अन्य दल से जुड़कर विलय का दावा नहीं कर सकता। पार्टी का कहना है कि मूल राजनीतिक दल अब भी वही है, जिसके टिकट पर ये सांसद चुने गए थे।
इसलिए तृणमूल के अनुसार, बागी सांसदों को अभी भी पार्टी के व्हिप और अनुशासन के अधीन माना जाएगा। यदि वे सदन में पार्टी के निर्देशों के खिलाफ मतदान करते हैं, तो उनके विरुद्ध अयोग्यता की अतिरिक्त कार्रवाई का आधार बन सकता है।
स्वतंत्र सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी साफ कहा कि तृणमूल के विधायी दल के बागी सदस्य किसी राजनीतिक दल में विलय नहीं कर सकते। ऐसा तभी संभव है, जब तृणमूल कांग्रेस स्वयं ऐसा निर्णय ले। उनके अनुसार, बागियों को अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।
तृणमूल नेतृत्व ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। यह स्थिति आम आदमी पार्टी के उस विवाद से मिलती है, जिसमें अप्रैल में उसके सात सांसदों के भाजपा में जाने के बाद कानूनी चुनौती की तैयारी हुई थी।
संवैधानिक प्रश्न का केंद्र
आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस, दोनों मामलों में केंद्रीय सवाल एक ही है। क्या दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 में मूल राजनीतिक दल की वास्तविक सहमति जरूरी है, या विधायी दल के दो तिहाई सदस्य अपने दम पर विलय का दावा कर सकते हैं।
पैराग्राफ 4 में मूल राजनीतिक दल शब्द का इस्तेमाल हुआ है। इसका अर्थ केवल सदन में बैठे निर्वाचित सदस्य नहीं हैं, बल्कि वह व्यापक संगठन है जो चुनाव लड़ता है, उम्मीदवार तय करता है, प्रतीक देता है और निर्वाचित सदस्यों पर अनुशासन लागू करता है।
दसवीं अनुसूची राजनीतिक दल और विधायी दल के बीच संरचनात्मक अंतर रखती है। राजनीतिक दल वह संस्था है जो जनादेश प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार खड़ा करती है। विधायी दल उन चुने हुए सदस्यों का समूह है जो चुनाव के बाद सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यदि दोनों को एक समान मान लिया जाए, तो निर्वाचित सदस्य उस संगठन से अलग होकर भी संवैधानिक सुरक्षा मांग सकते हैं, जिसने उन्हें टिकट दिया और जिसके नाम पर मतदाताओं ने उन्हें चुना। यही आशंका इस विवाद को गंभीर बनाती है।
2023 महाराष्ट्र फैसले की अहमियत
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से जुड़े सुभाष देसाई बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, गवर्नर ऑफ महाराष्ट्र मामले में इस विषय से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे थे। हालांकि वह मामला प्रत्यक्ष रूप से विलय के दावे से संबंधित नहीं था।
उस निर्णय में अदालत ने कहा था कि विधायी दल राजनीतिक दल से स्वतंत्र होकर काम नहीं कर सकता। अदालत ने दसवीं अनुसूची में दोनों के बीच स्पष्ट विभाजन माना। विधायी बहुमत केवल अपने संख्या बल से राजनीतिक दल की पहचान या निर्णय तय नहीं कर सकता।
यदि विधायक केवल संख्या के आधार पर अलग व्हिप नियुक्त नहीं कर सकते या पार्टी की पहचान पर दावा नहीं कर सकते, तो इसी तर्क से वे अपने स्तर पर किसी अन्य दल में विलय भी नहीं कर सकते। तृणमूल इसी व्याख्या को अपने पक्ष में आधार बना रही है।
इसके बावजूद कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अलग अलग मामलों में अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। यही कारण है कि मौजूदा विवाद को अंतिम रूप से सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या ही तय कर सकती है।
गोवा मामले ने उलझन बढ़ाई
2022 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने गोवा में हुए दलबदल से जुड़े एक विलय दावे को स्वीकार किया था। उस मामले में अदालत ने यह माना कि यदि विधायी दल के दो तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में शामिल होते हैं, तो विलय प्रावधान लागू हो सकता है।
उस निर्णय में मूल राजनीतिक दल की अलग से सहमति या उसके औपचारिक विलय को अनिवार्य नहीं माना गया। इस व्याख्या के अनुसार पैराग्राफ 4(2) अपने आप में पर्याप्त प्रावधान है और दो तिहाई विधायी संख्या ही मुख्य शर्त है।
इस दृष्टिकोण की आलोचना करने वालों का कहना है कि इससे विलय अपवाद का संवैधानिक उद्देश्य कमजोर हो जाता है। यदि यही मानक स्वीकार हो जाए, तो संगठित दलबदल को केवल संख्या और औपचारिक विलय के जरिए वैध रास्ता मिल सकता है।
गोवा से जुड़े गिरिश चोडनकर बनाम स्पीकर, गोवा विधानसभा मामले में यह प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित है। उसी निर्णय से तय होगा कि पैराग्राफ 4 को संयुक्त रूप से पढ़ा जाएगा या अलग अलग शर्तों के रूप में समझा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित मामला यह तय कर सकता है कि विलय के लिए दो बातें जरूरी हैं या नहीं। पहली, मूल राजनीतिक दल का वास्तविक विलय। दूसरी, उस दल के विधायी समूह के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति।
यदि अदालत संयुक्त व्याख्या अपनाती है, तो बागी सांसदों या विधायकों के लिए अपने दम पर विलय का दावा करना कठिन हो जाएगा। यदि अदालत विधायी संख्या को पर्याप्त मानती है, तो भविष्य में बड़े पैमाने पर संगठित दलबदल का नया रास्ता खुल सकता है।
तृणमूल कांग्रेस का वर्तमान संकट इसी लंबित कानूनी प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर और तीखा बना रहा है। यह पहली बार नहीं है कि विलय अपवाद का इस्तेमाल विवाद में आया हो, लेकिन 20 सांसदों का एक साथ दावा संसद में व्यापक असर डाल सकता है।
इसलिए यह मामला केवल तृणमूल या पश्चिम बंगाल की राजनीति का नहीं है। यह संसदीय लोकतंत्र, दलगत अनुशासन, मतदाता जनादेश और संविधान की दसवीं अनुसूची की वास्तविक मंशा से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन गया है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका
तत्काल स्थिति में तृणमूल के 20 बागी सांसदों का भविष्य लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के निर्णय पर निर्भर करेगा। पहले वह सांसदों के हस्ताक्षर और सहमति की पुष्टि करेंगे। इसके बाद विलय दावे और संभावित अयोग्यता पर संवैधानिक निर्णय लिया जाएगा।
दल बदल कानून से जुड़े मामलों में लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति पहले संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में काम करते हैं। अदालतें आमतौर पर उनके निर्णय की समीक्षा करती हैं, लेकिन शुरुआती निर्णय की जगह सीधे अपना निर्णय लागू नहीं करतीं।
आम आदमी पार्टी से जुड़े राज्यसभा मामले में यही भूमिका राज्यसभा के सभापति के सामने होगी। तृणमूल मामले में लोकसभा अध्यक्ष को यह तय करना है कि NCPI से विलय का दावा दसवीं अनुसूची की कानूनी कसौटी पर टिकता है या नहीं।
निर्णय आने तक बागी सांसद एक असामान्य कानूनी स्थिति में रहेंगे। कागजों पर वे अभी भी उसी पार्टी के टिकट पर चुने गए सदस्य हैं, जिसके खिलाफ वे खड़े हुए हैं। इसलिए वे तृणमूल के व्हिप और अनुशासन से पूरी तरह मुक्त नहीं माने जा सकते।
निर्णय में देरी से बढ़ सकती है अनिश्चितता
दसवीं अनुसूची में यह तय नहीं है कि अध्यक्ष या सभापति को अयोग्यता याचिका पर कितने समय में निर्णय देना होगा। यही कमी कई बार राजनीतिक अस्पष्टता को लंबा खींच देती है और महत्वपूर्ण संसदीय कार्यवाही के दौरान अनिश्चित स्थिति बनी रहती है।
यदि बागी सांसदों पर निर्णय लंबित रहता है और इस बीच वे सदन में पार्टी निर्देश के खिलाफ मतदान करते हैं, तो उनके खिलाफ नई अयोग्यता याचिका का आधार बन सकता है। इससे कानूनी और राजनीतिक संघर्ष और जटिल हो सकता है।
2003 में विभाजन प्रावधान हटाने का उद्देश्य दल बदल कानून को मजबूत करना था। लेकिन अब विलय अपवाद वही जगह बनता दिख रहा है, जहां से संगठित दलबदल संवैधानिक सुरक्षा तलाश रहा है। यह प्रवृत्ति कानून की मंशा पर गंभीर सवाल उठाती है।
अप्रैल में आम आदमी पार्टी के सांसदों का मामला एक परीक्षा था। अब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों का विवाद दूसरी बड़ी परीक्षा है। एक ऐसी पार्टी में विलय का दावा, जिसके पास कोई सांसद नहीं है, इस बहस को निर्णायक मोड़ पर ले आया है।

