स्मार्ट लॉक या मौत का जाल: देश के अलग-अलग हिस्सों से बीते कुछ सालों में सामने आई कई दर्दनाक दुर्घटनाओं ने एक गंभीर सुरक्षा सवाल खड़ा कर दिया है।
दिल्ली के ओल्ड राजिंदर नगर में बेसमेंट में पानी भरने की घटना हो, मालवीय नगर के एक होटल में लगी आग हो या फिर लखनऊ की एक लाइब्रेरी का अग्निकांड, इन सभी हादसों में एक भयावह समानता देखने को मिली।
आपात स्थिति के दौरान जैसे ही बिजली गुल हुई, बायोमेट्रिक और स्मार्ट लॉक वाले दरवाजे पूरी तरह जाम हो गए।
नतीजा यह हुआ कि लोग अंदर ही फंस गए और समय रहते बाहर न निकल पाने के कारण कई मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
हादसों ने उजागर की तकनीक की बड़ी खामी
जानकारों के मुताबिक, यह जानलेवा संकट स्मार्ट डोर्स की एक खास कार्यप्रणाली यानी मैकेनिज्म के कारण पैदा होता है।
आज के समय में बायोमेट्रिक दरवाजे मुख्य रूप से दो सिद्धांतों पर काम करते हैं पहला ‘फेल सिक्योर’ (Fail Secure) और दूसरा ‘फेल सेफ’ (Fail Safe)।
इनमें से ‘फेल सिक्योर’ तकनीक सबसे घातक साबित हो रही है। इस तकनीक का सीधा मतलब यह है कि बिजली रहे या न रहे, दरवाजा हर हाल में लॉक ही रहेगा।
जब बिजली पर निर्भर हो जाती है जिंदगी
ऐसे दरवाजों को खोलने के लिए बिजली का होना एक अनिवार्य शर्त है। सामान्य स्थिति में जब आप अपना थंब या फेस दिखाते हैं, तो बिजली का सिग्नल अंदर लगे मैग्नेट को एक्टिवेट करता है, स्प्रिंग पीछे हटता है और दरवाजा खुलता है,
लेकिन बिजली कटते ही यह सिस्टम पूरी तरह ठप हो जाता है। ऐसे में आग, धुआं या पानी भरने जैसी आपात स्थिति के दौरान बाहर निकलने का रास्ता भी बंद हो जाता है।
सुरक्षा का दूसरा मॉडल, जो बचा सकता है जान
इसके विपरीत ‘फेल सेफ’ लॉक्स बिल्कुल उल्टे सिद्धांत पर काम करते हैं। इसमें परमानेंट मैग्नेट दरवाजे को हर वक्त चिपका कर रखता है।
बायोमेट्रिक देने पर मैग्नेट की पावर कटती है और दरवाजा खुल जाता है। यानी अगर बिजली चली जाए तो ‘फेल सेफ’ दरवाजे अपने आप अनलॉक हो जाते हैं।
यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में सार्वजनिक स्थानों पर इस तकनीक को ज्यादा सुरक्षित माना जाता है।
संपत्ति की सुरक्षा बनाम इंसानी जिंदगी
भारत में इस सुरक्षित तकनीक का व्यापक इस्तेमाल न होने के पीछे सामाजिक अविश्वास को एक बड़ी वजह माना जाता है।
आम लोगों में यह धारणा है कि बिजली जाने पर यदि दरवाजा खुला रह गया तो चोरी या नुकसान का खतरा बढ़ जाएगा।
यानी कई मामलों में इंसानी सुरक्षा से ज्यादा संपत्ति की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।
यही सोच कई इमारतों, कोचिंग सेंटरों, लाइब्रेरी और व्यावसायिक परिसरों में फेल सिक्योर लॉक के इस्तेमाल को बढ़ावा देती है।
नियम मौजूद, लेकिन पालन नदारद
नियमों के मुताबिक, फेल सिक्योर दरवाजों का इस्तेमाल सिर्फ उन जगहों पर होना चाहिए जहां कोई बेहद महंगा एसेट सुरक्षित रखना हो, न कि इंसानी आवाजाही वाली जगहों पर।
इसके अलावा हर ऐसे स्मार्ट दरवाजे में एक ‘मैकेनिकल ओवरराइड’ यानी मैनुअल लॉक सिस्टम होना अनिवार्य है,
ताकि आपातकाल में उसे हाथ से खोला जा सके। लेकिन देश में सेफ्टी गाइडलाइंस की धज्जियां खुलेआम उड़ाई जा रही हैं।
आधुनिकता नहीं, जवाबदेही की है जरूरत
लखनऊ और दिल्ली के हादसों से साफ है कि कई जगहों पर बच्चों और आम लोगों की सुरक्षा से ज्यादा कीमती फर्नीचर और सामान की चिंता की गई।
इसका खामियाजा निर्दोष लोगों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। तकनीक का उद्देश्य जीवन को सुरक्षित बनाना है, न कि संकट के समय उसे और खतरनाक बना देना।
इसलिए अब जरूरत सिर्फ स्मार्ट लॉक लगाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि आपदा की घड़ी में वही दरवाजा लोगों के लिए बचाव का रास्ता भी बन सके।

