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तेल बाजार में भारत की भूमिका पर बड़ा अनुमान
भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक तनावों और ऊर्जा संकटों के बीच लगातार मजबूती दिखा रही है। युद्ध, होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े जोखिम और अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की आर्थिक रफ्तार बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025 26 में देश की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.7 प्रतिशत दर्ज की गई है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और कई वैश्विक कंपनियां भी भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को स्वीकार कर चुकी हैं। ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत की भूमिका आने वाले वर्षों में निर्णायक मानी जा रही है।
2035 तक तेल मांग में भारत का दबदबा
रूसी ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट के सीईओ इगोर सेचिन ने भारत को लेकर बड़ा अनुमान जताया है। उन्होंने कहा है कि 2035 तक वैश्विक तेल मांग में होने वाली वृद्धि में अकेले भारत की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत रह सकती है।
सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुए इगोर सेचिन ने कहा कि वैश्विक तेल बाजार में भारत का विशेष स्थान है। उनके अनुसार अगले एक दशक में तेल की मांग बढ़ने पर दुनिया के ऊर्जा समीकरण में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।
तेल खपत आठ मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुमानों का हवाला देते हुए बताया गया कि 2035 तक भारत की तेल खपत लगभग आठ मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। यह मौजूदा स्तर की तुलना में लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
इसी अवधि में वैश्विक तेल मांग में कुल वृद्धि लगभग 5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इस आधार पर अगले दशक में दुनिया में तेल की मांग जितनी बढ़ेगी, उसका लगभग आधा हिस्सा भारत से आने की संभावना जताई गई है।
रूसी तेल से भारत और चीन को आर्थिक लाभ
इगोर सेचिन ने कहा कि अप्रैल 2022 से रूसी तेल आपूर्ति के कारण भारत और चीन को बड़ा आर्थिक लाभ हुआ है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार इस लाभ का मूल्य 40 अरब डॉलर से अधिक माना गया है।
उन्होंने कहा कि भारत और चीन के साथ रूस की आर्थिक साझेदारी ने स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की है। उनके अनुसार यह स्थिति बताती है कि रूस को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से अलग करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
ऊर्जा साझेदारी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला
रूस की ऊर्जा आपूर्ति ने एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए तेल उपलब्धता को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाई है। भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार के लिए ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन और परिवहन व्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई है।
सेचिन के बयान का संकेत है कि आने वाले वर्षों में भारत सिर्फ तेल खरीदार के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख देशों में शामिल होगा। बढ़ती आबादी, औद्योगिक विस्तार और ऊर्जा खपत इसका आधार बनेंगे।
होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई बाधित होने का खतरा
इगोर सेचिन ने होर्मुज स्ट्रेट से तेल और गैस आपूर्ति में संभावित व्यवधान को लेकर भी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि इस मार्ग से आपूर्ति बाधित होती है, तो उर्वरकों और खाद्य उत्पादों की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।
भारत को इस प्रभाव के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील देशों में शामिल माना गया है। इसके अलावा अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर भी इसका गहरा असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
उर्वरक कीमतों में उछाल और खाद्य संकट का जोखिम
साल के पहले चार महीनों में उर्वरक कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत तक उछाल दर्ज होने की बात कही गई है। आपूर्ति व्यवधान और प्रभावित बाजारों में रणनीतिक भंडार की कमी ने वैश्विक खाद्य संकट के जोखिम को और गंभीर बना दिया है।
ऊर्जा आपूर्ति, उर्वरक कीमतों और खाद्य उत्पादों की लागत आपस में गहराई से जुड़ी हैं। तेल और गैस बाजार में किसी भी बड़े झटके का असर खेती, खाद्य आपूर्ति, महंगाई और उपभोक्ता खर्च पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा क्यों अहम
भारत की बढ़ती तेल मांग आर्थिक विस्तार का संकेत है, लेकिन इससे ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती भी बढ़ती है। यदि वैश्विक आपूर्ति मार्ग बाधित होते हैं या कीमतों में तेज उछाल आता है, तो इसका असर परिवहन, उद्योग, कृषि और आम उपभोक्ता तक पहुंचेगा।
2035 तक तेल मांग में भारत की संभावित बड़ी हिस्सेदारी यह बताती है कि देश को दीर्घकालिक ऊर्जा नीति, विविध आपूर्ति स्रोतों और रणनीतिक भंडार पर अधिक ध्यान देना होगा। वैश्विक तेल बाजार में भारत की भूमिका अब और निर्णायक होती दिख रही है।

