Monday, May 18, 2026

रूसी तेल की छूट हुई खत्म, होर्मुज में तेल संकट के बीच भारत में बढ़ सकती है कीमतें

रूसी तेल की छूट हुई खत्म: होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को झकझोर दिया है। भारत भी अब इस संकट की सीधी मार महसूस करने लगा है।

लंबे समय तक रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर भारत ने वैश्विक तेल संकट के असर को काफी हद तक संभाले रखा, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।

अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट खत्म होने के बाद भारत के सामने नई मुश्किल खड़ी हो गई है।

होर्मुज संकट से क्यों बढ़ी चिंता?

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में गिना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है।

हालिया तनाव और टैंकरों की धीमी आवाजाही के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है।

कुछ समय पहले तक करीब 72 डॉलर प्रति बैरल बिकने वाला कच्चा तेल अब 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है।

इसके साथ ही शिपिंग और इंश्योरेंस की लागत भी तेजी से बढ़ी है। इसका असर सीधे तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ रहा है।

भारत क्यों ज्यादा प्रभावित हो सकता है?

भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर सीधे देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ता है।

पेट्रोल, डीजल, एलपीजी सिलेंडर, हवाई किराया और ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने लगती है। इससे महंगाई बढ़ती है और घरेलू बजट पर दबाव आता है।

रूस बना था भारत का सबसे बड़ा सहारा

यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर तेल प्रतिबंध लगाए थे। हालांकि भारत और चीन ने रूस से तेल खरीद जारी रखी।

रूस ने दोनों देशों को डिस्काउंट पर कच्चा तेल दिया, जिससे भारत को बड़ी राहत मिली।

यही वजह रही कि दुनिया के कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने के बावजूद भारत में तेल सप्लाई स्थिर बनी रही।

पिछले दो वर्षों में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया।

केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 2.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था।

कई महीनों तक भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत तक रही।

अमेरिका ने क्यों खत्म की छूट?

अमेरिका ने पहले कुछ समय के लिए रूसी तेल खरीद से जुड़े नियमों में ढील दी थी ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर रह सके।

इसी वजह से भारत बिना किसी बड़े जोखिम के रूसी तेल खरीदता रहा।

लेकिन अमेरिका और यूरोप के कई नेताओं ने इस फैसले का विरोध किया। उनका कहना था कि इससे रूस को आर्थिक फायदा हो रहा है,

जबकि पश्चिमी देश उसे आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं।

अब यह छूट खत्म हो चुकी है और इसके बाद भारतीय रिफाइनर कंपनियों के सामने बड़ा जोखिम खड़ा हो गया है।

भारत के सामने बढ़ी दोहरी चुनौती

अगर भारत रूसी तेल की खरीद कम करता है तो उसे फिर से मध्य पूर्व के देशों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा।

लेकिन फारस की खाड़ी और होर्मुज क्षेत्र खुद अस्थिरता से गुजर रहे हैं।

ऐसे में सप्लाई बाधित होने और कीमतों में और बढ़ोतरी का खतरा बना हुआ है। इससे भारत का तेल आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है।

अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं तो उसका असर आखिरकार आम लोगों तक पहुंचेगा।

पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, हवाई किराया और लॉजिस्टिक खर्च और महंगे हो सकते हैं।

सरकार के पास क्या विकल्प हैं?

भारत सरकार के सामने फिलहाल आसान विकल्प नहीं हैं। सरकार चाहे तो टैक्स में कटौती कर सकती है या सब्सिडी बढ़ाकर कुछ राहत दे सकती है, लेकिन इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा।

दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सरकारी तेल कंपनियों को कुछ समय तक नुकसान सहने के लिए कहा जाए, लेकिन इससे उनकी वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है।

तीसरा विकल्प पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की अनुमति देना है, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।

क्या फिर लौट सकते हैं फ्यूल सेविंग उपाय?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं और सप्लाई प्रभावित होती रही, तो भारत को पुराने समय की तरह ईंधन बचत के उपायों पर भी विचार करना पड़ सकता है।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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