Wednesday, June 24, 2026

राखीगढ़ी से मिले मानव कंकालों की वैज्ञानिक जांच तेज, ASI ने अवशेष ANSI को सौंपे

राखीगढ़ी

हरियाणा के राखीगढ़ी पुरातात्विक स्थल से हाल में मिले मानव कंकाल अवशेषों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने विस्तृत वैज्ञानिक जांच के लिए भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण को औपचारिक रूप से सौंप दिया है। इस कदम से राखीगढ़ी पर बहुविषयक अध्ययन को नई गति मिलने की संभावना है।

सिंधु सरस्वती सभ्यता के बड़े केंद्र पर नए शोध की तैयारी

भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रोफेसर बी वी शर्मा ने बताया कि यह हस्तांतरण दोनों संस्थानों के बीच हाल में हुए समझौता ज्ञापन के तहत किया गया है। इससे सिंधु सरस्वती सभ्यता के महत्वपूर्ण शहरी केंद्रों में शामिल राखीगढ़ी पर वैज्ञानिक अनुसंधान का दायरा बढ़ेगा।

लगभग 550 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला राखीगढ़ी सिंधु सरस्वती सभ्यता की सबसे बड़ी ज्ञात बस्तियों में माना जाता है। यहां हुए उत्खनन में प्रारंभिक हड़प्पा काल से परिपक्व हड़प्पा काल तक लगातार बसावट के प्रमाण सामने आए हैं।

नियोजित बस्तियों से कब्रिस्तान तक मिले प्रमाण

राखीगढ़ी से अब तक नियोजित बस्तियों, जल निकासी व्यवस्था, शिल्प उत्पादन केंद्रों, व्यापार नेटवर्क और कब्रिस्तान से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं। ये प्रमाण बताते हैं कि यह स्थल प्राचीन शहरी जीवन, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वर्ष 2025 26 के क्षेत्र सत्र में ग्रेटर नोएडा स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उत्खनन शाखा दो ने यहां खुदाई की। इस दौरान पुरातत्वविदों ने टीला संख्या 7 में आठ कब्रें खोजीं, जिसे पहले से कब्रिस्तान क्षेत्र के रूप में पहचाना गया था।

तीन पूर्ण कंकाल और अन्य अवशेष प्रयोगशाला भेजे गए

खुदाई में मिले तीन पूर्ण मानव कंकालों को अन्य कब्रों से प्राप्त कंकाल टुकड़ों के साथ कोलकाता स्थित भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के प्राचीन मानव कंकाल भंडार और प्रयोगशाला में भेज दिया गया है। वहां इनकी विस्तृत वैज्ञानिक जांच की जाएगी।

अधिकारियों के अनुसार, इन स्थलों से प्राप्त शेष कंकाल सामग्री को भी कुछ दिनों में भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण की प्रयोगशाला में स्थानांतरित किए जाने की उम्मीद है। इससे उपलब्ध नमूनों का समेकित अध्ययन संभव होगा और निष्कर्ष अधिक व्यापक बन सकेंगे।

प्राचीन डीएनए से लेकर आहार और रोगों तक होगी जांच

शोधकर्ताओं का मानना है कि राखीगढ़ी से मिले ये अवशेष आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग का दुर्लभ अवसर देते हैं। इनमें प्राचीन डीएनए विश्लेषण, स्टेबल आइसोटोप अध्ययन, अस्थिविज्ञान संबंधी आकलन, पुरारोगविज्ञान जांच और पर्यावरण पुनर्निर्माण जैसी विधियां शामिल होंगी।

इन वैज्ञानिक तरीकों से हड़प्पा काल के लोगों की वंश परंपरा, प्रवास पैटर्न, आहार पद्धति, रोगों की व्यापकता और अनुकूलन रणनीतियों पर महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है। मानव और पर्यावरण के परस्पर संबंधों को समझने में भी यह अध्ययन उपयोगी रहेगा।

देश और विदेश के प्रमुख संस्थान होंगे शोध में शामिल

भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के अनुसार, यह शोध कई प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से आगे बढ़ाया जाएगा। इसमें लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े विशेषज्ञों की भागीदारी रहेगी।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की वह टीम भी इस अध्ययन से जुड़ेगी, जिसे प्राचीन डीएनए अनुसंधान में विशेषज्ञता प्राप्त है। इन संस्थानों के सहयोग से कंकाल अवशेषों के जैविक, आनुवंशिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक पहलुओं की गहन पड़ताल की जा सकेगी।

भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण की पुरानी शोध परंपरा

अधिकारियों ने बताया कि 1945 में स्थापना के बाद से भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण ने सिंधु सरस्वती स्थलों से प्राप्त अवशेषों पर अस्थिविज्ञान अनुसंधान की लंबी परंपरा बनाए रखी है। हालांकि विभिन्न चुनौतियों के कारण वर्षों में इस क्षेत्र की सक्रियता घटती गई थी।

हाल के वर्षों में संस्थान ने पुरामानवविज्ञान अनुसंधान को फिर से मजबूत करने के प्रयास शुरू किए हैं। इसके लिए समर्पित अनुसंधान टीमों का गठन किया गया है और वैज्ञानिक कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से नई तकनीकों के उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है।

पुरारोग विज्ञान अध्ययन के बाद नए प्रकाशन की तैयारी

भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण ने हाल में कई सिंधु सरस्वती स्थलों से मिले कंकाल अवशेषों पर पुरारोग विज्ञान संबंधी अध्ययन पूरा किया है। संस्थान इन निष्कर्षों के आधार पर वैज्ञानिक प्रकाशन तैयार कर रहा है, जिससे प्राचीन आबादी के स्वास्थ्य पक्ष पर नई जानकारी सामने आ सकती है।

राखीगढ़ी अवशेषों के स्थानांतरण से संस्थान की अनुसंधान क्षमता को विशेष रूप से प्राचीन डीएनए विश्लेषण के क्षेत्र में मजबूती मिलने की उम्मीद है। इससे पहले से चल रहे अस्थिविज्ञान और पुरारोग विज्ञान अध्ययनों को आनुवंशिक साक्ष्यों के साथ जोड़ने का अवसर मिलेगा।

अन्य वैज्ञानिक संगठनों से सहयोग बढ़ाने की योजना

भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण अब भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण और पुरातात्विक जलवायु पर काम कर रहे अनुसंधान समूहों के साथ सहयोग बढ़ाने की योजना बना रहा है। इससे राखीगढ़ी अध्ययन का दायरा और व्यापक हो सकेगा।

इन सहयोगों के माध्यम से शोधकर्ता प्राचीन मानव जीवन को केवल कंकाल अवशेषों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि वनस्पति, जीव जगत, भूगर्भीय स्थिति और जलवायु के संदर्भ में भी समझने का प्रयास करेंगे। इस तरह राखीगढ़ी पर बहुआयामी वैज्ञानिक चित्र उभर सकता है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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