Friday, July 10, 2026

पीएचडी: बिहार में स्नातक के बाद सीधे होगी पीएचडी, नए नियमों से हुआ बड़ा बदलाव

पीएचडी

बिहार में उच्च शिक्षा के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए स्नातक उत्तीर्ण मेधावी विद्यार्थियों के लिए सीधे पीएचडी प्रवेश का रास्ता खोल दिया गया है। अब निर्धारित योग्यता पूरी करने वाले छात्र एक वर्षीय मास्टर डिग्री किए बिना शोध कार्यक्रम में दाखिला ले सकेंगे।

7.5 सीजीपीए वाले छात्रों को सीधा प्रवेश

नई व्यवस्था के अनुसार चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में 7.5 सीजीपीए या उससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी सीधे पीएचडी प्रवेश के पात्र होंगे। बिहार लोक भवन ने बिहार स्टेट यूनिवर्सिटीज पीएचडी ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशंस 2026 को औपचारिक मंजूरी दे दी है।

इस मंजूरी के साथ वर्ष 2017 से लागू पुराने पीएचडी नियम समाप्त हो गए हैं। राज्य के विश्वविद्यालयों में अब शोध प्रवेश, अवधि, पात्रता, पर्यवेक्षण और प्रशिक्षण की पूरी व्यवस्था नए प्रावधानों के अनुसार संचालित होगी। विश्वविद्यालयों को इसे वैधानिक निकायों से अपनाना होगा।

तीन वर्षीय स्नातक उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों को पीएचडी में जाने से पहले दो वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम पूरा करना होगा। चार वर्षीय स्नातक करने वाले विद्यार्थी एक वर्षीय मास्टर डिग्री के बाद पात्र बनेंगे, जबकि उच्च सीजीपीए वाले छात्रों को सीधे प्रवेश की सुविधा मिलेगी।

पीएचडी प्रवेश के लिए निर्धारित पात्रता

सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य किए गए हैं। आरक्षित वर्गों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार आवश्यक छूट मिलेगी। नई पीएचडी विनियमावली को यूजीसी के वर्ष 2022 में निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है।

नया नियम चार जुलाई 2026 से प्रभावी माना जाएगा। पीएचडी में प्रवेश केवल यूजीसी नेट, यूजीसी सीएसआईआर नेट या गेट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को दिया जाएगा। चयन प्रक्रिया में 80 प्रतिशत वेटेज नेट अथवा गेट अंकों और 20 प्रतिशत साक्षात्कार को मिलेगा।

सेवानिवृत्ति से पहले नए शोधार्थी लेने पर रोक

नई व्यवस्था में शोध निर्देशन को लेकर स्पष्ट सीमा तय की गई है। जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष से कम समय शेष होगा, वे नए पीएचडी शोधार्थियों को निर्देशन में नहीं ले सकेंगे। इसका उद्देश्य शोध अवधि में मार्गदर्शन की निरंतरता बनाए रखना है।

पीएचडी की अवधि तीन से छह वर्ष

पीएचडी कार्यक्रम की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और अधिकतम अवधि छह वर्ष निर्धारित की गई है। विशेष परिस्थितियों में शोधार्थी को दो वर्ष का अतिरिक्त समय मिल सकेगा। महिला शोधार्थियों और 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांग शोधार्थियों को भी दो वर्ष की अतिरिक्त छूट मिलेगी।

सभी पीएचडी शोधार्थियों के लिए शिक्षण, अकादमिक लेखन और शैक्षणिक प्रशिक्षण अनिवार्य होगा। नए नियम शोधार्थियों को केवल शोध प्रबंध तैयार करने तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उन्हें अध्यापन, प्रस्तुतीकरण, अनुसंधान लेखन और विश्वविद्यालयी शैक्षणिक दायित्वों के लिए भी व्यवस्थित रूप से तैयार करेंगे।

स्नातकोत्तर से पीएचडी तक बदली व्यवस्था

बिहार में स्नातकोत्तर से पीएचडी तक की पूरी शैक्षणिक संरचना में परिवर्तन किया गया है। लोक भवन ने एकरूप पीएचडी विनियम 2026, एक वर्षीय और द्विवर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रमों की नई रूपरेखा तथा चार वर्षीय सीबीसीएस स्नातक कार्यक्रम में संशोधन को स्वीकृति दी है।

नई रूपरेखा के तहत क्रिप्टिक क्रॉसवर्ड को दो क्रेडिट वाले क्षमता संवर्धन पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया है। इस बदलाव का उद्देश्य विद्यार्थियों में भाषा कौशल, तार्किक सोच, विश्लेषण क्षमता और समस्या समाधान की योग्यता को शैक्षणिक पाठ्यक्रम के भीतर विकसित करना है।

चार वर्षीय स्नातक में चरणबद्ध डिग्री व्यवस्था

चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में पहले वर्ष की पढ़ाई पूरी करने पर स्नातक प्रमाणपत्र और दूसरे वर्ष के बाद स्नातक डिप्लोमा दिया जाएगा। तीसरा वर्ष पूरा करने पर स्नातक उपाधि मिलेगी, जबकि चार वर्ष पूरे करने वाले विद्यार्थियों को ऑनर्स की डिग्री प्रदान की जाएगी।

छठे सेमेस्टर तक 7.5 या उससे अधिक सीजीपीए प्राप्त करने वाले विद्यार्थी चौथे वर्ष में ऑनर्स विथ रिसर्च का विकल्प चुन सकेंगे। इससे उन्हें स्नातक स्तर पर शोध अनुभव मिलेगा और आगे सीधे पीएचडी प्रवेश की पात्रता हासिल करने का अवसर भी प्राप्त होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप शैक्षणिक सुधार

कुलाधिपति सय्यद अता हसनैन ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप इन सुधारों को स्वीकृति दी है। नई व्यवस्था का लक्ष्य विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण, लचीली और शोधोन्मुख शिक्षा उपलब्ध कराना तथा विश्वविद्यालयों में पीएचडी प्रवेश और शोध संचालन के लिए समान मानक स्थापित करना है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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