ऑपरेशन अल मलिक: भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए देश के अंदर पनप रहे एक खतरनाक और संगठित कट्टरपंथी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है।
आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से शुरू हुई यह जांच अब एक व्यापक ऑपरेशन का रूप ले चुकी है, जिसने देश के छह से अधिक राज्यों में अपने पैर पसार लिए थे।
अल मलिक इस्लामिक यूथ नामक इस संगठन के तार न केवल स्थानीय स्तर पर कट्टरपंथ से जुड़े हैं, बल्कि इसके पीछे ISIS और अल-कायदा जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों की गहरी साजिश के संकेत भी मिले हैं।
ऑपरेशन की शुरुआत
इस बड़े खुलासे की नींव 24 मार्च 2026 को पड़ी, जब विजयवाड़ा पुलिस और आंध्र प्रदेश काउंटर-इंटेलिजेंस ने एक सटीक सूचना के आधार पर मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ को गिरफ्तार किया।
रहमतुल्लाह को इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड माना जा रहा है। उसकी गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए।
रहमतुल्लाह के साथ उसके दो करीबी सहयोगियों, मोहम्मद दानिश और मिर्जा सोहेल बेग को भी हिरासत में लिया गया।
इन शुरुआती गिरफ्तारियों ने एक ऐसे जाल की ओर इशारा किया जो पूरे भारत में फैला हुआ था और जिसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को गुमराह कर उन्हें राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में झोंकना था।
8 राज्यों तक फैला जांच का दायरा
विजयवाड़ा से शुरू हुई जांच की आंच जल्द ही देश के अन्य हिस्सों तक पहुंच गई। आंध्र प्रदेश पुलिस की विशेष टीमों ने तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और राजस्थान में छापेमारी की।
अब तक इस मामले में कुल 12 संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है। गिरफ्तार किए गए लोगों में अल-हकीम शुकूर, मोहम्मद हुजैफा, निंजा, हेमरॉक्सी, अबू मुहरिब और अबू बलुशी जैसे नाम शामिल हैं।
जांच एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क भारत के विभिन्न कोनों में सक्रिय था और एक-दूसरे से डिजिटल माध्यमों के जरिए जुड़ा हुआ था।
महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने की साजिश
ऑपरेशन अल मलिक: इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू खवातीन नामक महिला विंग का सामने आना है।
इस यूनिट का गठन विशेष रूप से महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें नेटवर्क के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने के उद्देश्य से किया गया था।
हैदराबाद की रहने वाली सईदा बेगम को इस महिला विंग की प्रमुख के रूप में पहचाना गया है। सईदा बेगम न केवल स्थानीय स्तर पर सक्रिय थी, बल्कि वह पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के संदिग्ध हैंडलर्स के साथ सीधे संपर्क में थी।
एजेंसियों का मानना है कि महिलाओं के जरिए यह नेटवर्क समाज के उन हिस्सों तक पहुंचना चाहता था जहां पुरुषों की पहुंच सीमित होती है, ताकि विचारधारा को जड़ों तक फैलाया जा सके।
डिजिटल जिहाद और सोशल मीडिया का मायाजाल
अल मलिक समूह ने युवाओं के दिमाग में जहर घोलने के लिए तकनीक और सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया था।
जांच में 40 से अधिक इंस्टाग्राम अकाउंट्स और कई एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का पता चला है।
इन प्लेटफॉर्म्स पर ओसामा बिन लादेन, अनवर अल-अवलाकी, जाकिर नाइक और इसरार अहमद शेख जैसे विवादित व्यक्तियों के वीडियो धड़ल्ले से शेयर किए जाते थे।
समूह के सदस्य अपनी पहचान छिपाने के लिए मास्क पहनकर और हाथ में ISIS के झंडे लेकर तस्वीरें पोस्ट करते थे।
वे वन उम्माह के नारे लगाते थे, जो एक वैश्विक खिलाफत स्थापित करने की उनकी मंशा को दर्शाता है।
इतना ही नहीं, यह समूह भारत की संप्रभुता पर चोट करने के लिए राष्ट्रीय ध्वज को जलाने और राष्ट्रगान का अपमान करने वाले भड़काऊ वीडियो भी प्रसारित करता था।
विदेशी हैंडलर्स और आतंकी प्रशिक्षण का ब्लूप्रिंट
एजेंसियों ने पाया है कि इस नेटवर्क की डोर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, बांग्लादेश और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में बैठे विदेशी आकाओं के हाथ में थी।
इन हैंडलर्स ने भारतीय युवाओं को हिजरत (देश छोड़कर बाहर जाना) के लिए उकसाया था। उन्हें वादा किया गया था कि विदेश जाने पर उन्हें पहले धार्मिक शिक्षा और फिर हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
बरामद किए गए डिजिटल दस्तावेजों में स्नाइपर राइफल चलाने, IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाने और ब्लैक पाउडर के इस्तेमाल की विस्तृत जानकारी मिली है।
विदेशी हैंडलर्स ने यह भी भरोसा दिलाया था कि भारत में बड़े हमलों को अंजाम देने के लिए हथियार और गोला-बारूद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रास्तों से उपलब्ध कराए जाएंगे।
साइबर आतंकवाद और हैकिंग की तैयारी
ऑपरेशन अल मलिक: यह नेटवर्क केवल बम और बंदूकों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे साइबर जिहाद की तैयारी भी कर रहे थे।
जांच में यह तथ्य सामने आया है कि इस गिरोह के सदस्य सरकारी वेबसाइटों को हैक करने और महत्वपूर्ण डेटा को नुकसान पहुंचाने की योजना बना रहे थे।
उनके पास से ऐसे ट्यूटोरियल और सॉफ्टवेयर मिले हैं जो साइबर हमलों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वे भारत की डिजिटल बुनियादी संरचना को निशाना बनाकर देश में अस्थिरता पैदा करना चाहते थे।
आगामी कार्रवाई
फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां इस नेटवर्क के आर्थिक स्रोतों की गहराई से जांच कर रही हैं। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि विदेशी हैंडलर्स किन माध्यमों (जैसे हवाला या क्रिप्टोकरेंसी) से भारत में पैसा भेज रहे थे।
यह फंडिंग आतंकी गतिविधियों को संचालित करने, नए सदस्यों की भर्ती करने और डिजिटल प्रोपेगेंडा फैलाने में इस्तेमाल की जा रही थी।
जांच एजेंसियों का मानना है कि अभी कई और चेहरे बेनकाब होना बाकी हैं। इस गिरोह के तार जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े हैं, उसने भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती पेश की है।
पुलिस और काउंटर-इंटेलिजेंस की टीमें अब उन युवाओं की पहचान कर रही हैं जो इस नेटवर्क के प्रभाव में आकर भटक गए थे, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी बड़े खतरे को टाला जा सके।
अल मलिक नेटवर्क का भंडाफोड़ भारत की सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी जीत है, लेकिन यह इस बात की चेतावनी भी है कि कट्टरपंथ के डिजिटल स्वरूप से निपटने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।
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