Sunday, May 31, 2026

संघ मजबूत होता तो 1947 में देश का विभाजन नहीं होता, सुनील आंबेकर का बड़ा बयान

संघ

विभाजन को बताया देश की सबसे पीड़ादायक घटना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि 1947 में देश का विभाजन भारत के इतिहास की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक था। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के समय संघ उतना मजबूत नहीं था, जितना वह आज है।

आंबेकर ने कहा कि यदि उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज की तरह शक्तिशाली और संगठित होता, तो देश का विभाजन कभी नहीं होता। उनके अनुसार, उस दौर में संघ अपनी इच्छित शक्ति और व्यापक संगठनात्मक क्षमता तक नहीं पहुँच पाया था।

उन्होंने यह भी बताया कि सीमित शक्ति और संसाधनों के बावजूद संघ ने विभाजन के दौरान हिंदुओं की रक्षा और उनके पुनर्वास के लिए हरसंभव प्रयास किया। उस समय देशभर में तत्कालीन व्यवस्था के प्रति लोगों में भारी आक्रोश था।

विभाजन के दौर में हिंदुओं की रक्षा और पुनर्वास का प्रयास

सुनील आंबेकर ने कहा कि विभाजन के कारण लाखों लोगों को असहनीय पीड़ा, विस्थापन और असुरक्षा का सामना करना पड़ा। ऐसे कठिन समय में संघ कार्यकर्ताओं ने प्रभावित हिंदू समाज की सहायता, सुरक्षा और पुनर्वास के लिए अपने स्तर पर निरंतर काम किया।

उनके अनुसार, 1947 की परिस्थितियाँ केवल राजनीतिक निर्णयों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि समाज के व्यापक मनोबल, सुरक्षा और अस्तित्व से जुड़ी हुई थीं। विभाजन के बाद उत्पन्न संकट ने समाज के भीतर गहरी वेदना और असंतोष पैदा किया।

आंबेकर ने कहा कि उस समय की व्यवस्था के प्रति जनता में तीव्र नाराजगी थी। लोगों को लगता था कि देश का विभाजन केवल भूभाग का बँटवारा नहीं था, बल्कि एक गहरे राष्ट्रीय आघात के रूप में सामने आया था।

संघ के खिलाफ राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम फैलाने का आरोप

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर फैलाए जाने वाले आरोपों और भ्रांतियों पर सुनील आंबेकर ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए संघ के बारे में अनेक प्रकार की गलत जानकारियाँ फैलाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।

आंबेकर के अनुसार, संघ न तो किसी से घृणा करता है और न ही किसी को अपना शत्रु मानता है। संघ सभी को अपना मानता है और समाज के हर वर्ग के साथ संवाद बनाए रखने में विश्वास रखता है।

उन्होंने कहा कि संघ की मूल दृष्टि टकराव की नहीं, संवाद की है। इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हर व्यक्ति, हर वर्ग और हर समूह के साथ बातचीत और विचार विमर्श के लिए सदैव तैयार रहता है।

पाकिस्तान से संवाद पर संघ का दृष्टिकोण

दत्तात्रेय होसबाले की पाकिस्तान से संवाद से जुड़ी टिप्पणी पर सुनील आंबेकर ने कहा कि संघ के रुख को अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, संघ समस्याओं का समाधान जमीनी स्तर से और दीर्घकालिक दृष्टि से देखता है।

आंबेकर ने कहा कि लोगों के बीच संवाद और संपर्क कई बार उन समस्याओं को हल करने में सहायक हो सकता है, जिनका समाधान केवल औपचारिक या सरकारी स्तर पर तुरंत संभव नहीं हो पाता। इसी संदर्भ में होसबाले की बात को समझना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि दो देशों की सरकारों के बीच बातचीत पूरी तरह राजनीतिक और कूटनीतिक विषय है। सरकारें उस समय की परिस्थितियों, कूटनीतिक विचारों और विश्लेषण के आधार पर निर्णय लेती हैं। संघ ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष सलाह नहीं देता।

सरकारी वार्ता से अलग जनस्तरीय संपर्क की बात

सुनील आंबेकर ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच सरकार से सरकार की बातचीत राजनीतिक तथा कूटनीतिक निर्णयों पर निर्भर करती है। ऐसे निर्णय तत्कालीन परिस्थितियों, सुरक्षा चिंताओं, कूटनीतिक समीकरणों और व्यापक राष्ट्रीय हितों के आधार पर लिए जाते हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ ने न तो ऐसे मामलों में तत्काल किसी को सलाह दी है और न भविष्य में ऐसा करेगा। लेकिन जब आधिकारिक माध्यमों से बातचीत आगे नहीं बढ़ती, तब लोगों के बीच संपर्क बनाए रखना उपयोगी हो सकता है।

आंबेकर के अनुसार, दत्तात्रेय होसबाले का आशय यही था कि जहाँ सरकारी स्तर पर बातचीत नहीं हो रही हो, वहाँ समाज से समाज के बीच जो संपर्क अभी भी जारी हैं, उन्हें समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

व्यापार और संपर्क बनाए रखने की आवश्यकता

सुनील आंबेकर ने कहा कि कई मुद्दे लगातार सामने आते रहते हैं, लेकिन इसके साथ ही व्यापार और कुछ स्तरों पर आपसी संपर्क भी चलता रहता है। ऐसे संपर्क संबंधों को पूरी तरह टूटने से बचाने में भूमिका निभा सकते हैं।

उनके अनुसार, जब संबंधों की कुछ कड़ियाँ बनी रहती हैं, तो समय के साथ कुछ समस्याओं के समाधान की संभावना भी बनी रहती है। इसलिए लोगों के बीच संवाद और संपर्क को दीर्घकालिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

आंबेकर ने दोहराया कि संघ का दृष्टिकोण किसी के प्रति घृणा या शत्रुता का नहीं है। संघ समाज के हर वर्ग को अपना मानते हुए संवाद, संपर्क और जमीनी स्तर पर समाधान की प्रक्रिया को महत्व देता है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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