नेपाल में फिर उठी हिंदू राष्ट्र की मांग: नेपाल में एक बार फिर देश की पहचान को हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की मांग चर्चा में आ गई है।
कभी दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र रहा नेपाल वर्ष 2008 में गणतांत्रिक व्यवस्था अपनाने के बाद धर्मनिरपेक्ष देश बन गया था।
अब करीब दो दशक बाद देश में हिंदू राष्ट्र की पहचान बहाल करने की मांग राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।
इस मुद्दे को लेकर नेपाली कांग्रेस के भीतर भी चर्चा तेज हुई है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के समर्थक गुट की एक महत्वपूर्ण बैठक में नेपाल की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की बात कही गई।
बैठक शुक्रवार को शुरू हुई और आज कई अहम फैसलों के साथ समाप्त हुई।
इस सम्मेलन में पार्टी की राजनीतिक दिशा, संविधान से जुड़े विषय,
अगले आम अधिवेशन की तैयारियों और देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति सहित कुल पांच प्रमुख मुद्दों पर निर्णय लिए गए।
इनमें धर्म और संस्कृति से जुड़ा फैसला घोषणापत्र के तीसरे बिंदु में रखा गया।
सनातन परंपरा को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की बात
देउबा गुट की ओर से जारी घोषणापत्र में कहा गया कि नेपाल की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं देश की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इन परंपराओं को केवल धार्मिक नजरिए से नहीं, बल्कि नेपाल के इतिहास और सामाजिक संरचना से जुड़े महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए।
घोषणापत्र में सनातन धर्म और नेपाल की पारंपरिक संस्कृति को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
हालांकि, इसमें केवल हिंदू धर्म की बात नहीं की गई, बल्कि नेपाल में लंबे समय से मौजूद अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर भी जोर दिया गया है।
हिंदू और बौद्ध परंपराओं के साथ किरात
नेपाल की धार्मिक पहचान काफी विविध रही है। यहां बड़ी संख्या में हिंदू और बौद्ध समुदाय रहते हैं।
इसके अलावा किरात और प्रकृति आधारित धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग भी देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
घोषणापत्र में इन सभी परंपराओं की रक्षा और सम्मान की बात कही गई है। इसमें कहा गया कि नेपाल में सदियों से चली आ रही धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखना जरूरी है।
साथ ही हर व्यक्ति और धार्मिक समुदाय को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता की रक्षा किए जाने की बात भी कही गई।
इससे संकेत मिलता है कि सनातन परंपराओं को बढ़ावा देने की मांग के साथ-साथ धार्मिक विविधता को भी महत्व देने की कोशिश की जा रही है।
नेपाल पहले हिंदू राष्ट्र था
नेपाल लंबे समय तक दुनिया का एकमात्र आधिकारिक हिंदू राष्ट्र माना जाता था। वहां राजशाही व्यवस्था के दौरान हिंदू धर्म को विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त था। लेकिन राजनीतिक बदलावों के बाद देश की व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया।
2006 में राजशाही के खिलाफ आंदोलन और राजनीतिक समझौतों के बाद नेपाल में लोकतांत्रिक बदलाव की प्रक्रिया तेज हुई।
2008 में संविधान सभा ने राजशाही को खत्म कर नेपाल को गणराज्य घोषित किया। इसी दौर में देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा दिया गया।
इसके बाद नेपाल की पहचान एक धर्मनिरपेक्ष और बहुधार्मिक देश के रूप में बनी रही। हालांकि, समय-समय पर हिंदू राष्ट्र की पहचान वापस लाने की मांग उठती रही है।
राजनीतिक बहस में फिर अहम हुआ मुद्दा
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग केवल धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीति और राष्ट्रीय पहचान से भी जुड़ी हुई है।
समर्थकों का मानना है कि नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को संविधान और राष्ट्रीय व्यवस्था में अधिक महत्व मिलना चाहिए।
दूसरी ओर, धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि नेपाल में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं और सभी को समान अधिकार मिलना जरूरी है।
इसी वजह से हिंदू राष्ट्र का मुद्दा नेपाल में लंबे समय से संवेदनशील राजनीतिक विषय रहा है।
अब नेपाली कांग्रेस के एक प्रभावशाली गुट के सम्मेलन में सनातन परंपराओं को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की बात सामने आने के बाद इस बहस के फिर तेज होने की संभावना है।

