Sunday, June 14, 2026

मोहन भागवत के ट्रेन कोच पर चला पत्थर, सहयात्री पत्रकार ने सुनाई आपबीती

भागवत जी होना आसान नहीं…

पत्रकार सी.पी. सिंह का आंखों देखा वर्णन

11 जून 2026 को लखनऊ जक्शन के प्लेट फार्म नम्बर – 6 से ठीक 3.30 बजे शताब्दी एक्सप्रेस दिल्ली के लिए रवाना हुई। मै भी इसी शताब्दी एक्सप्रेस के एग्जीक्यूटिव कोच नंबर E-1 में सीट नम्बर -22 पर बैठा था।

ठीक 4.32 बजे ट्रेन उन्नाव स्टेशन पर रुकी। देखा कि तभी जेड प्लस श्रेणी ASL के चार कमांडो बम डिस्पोजल स्क्वायड के साथ कोच में सवार हुए। कमांडो ने पूरे कोच में गहनता से बम डिस्पोजल तंत्र से पूरे कोच को चेक किया। कही कुछ आपत्तिजनक नहीं मिला तो कमांडो टीम के चेहरे पर संतोष के भाव दिखे।

क्योंकि मैने काफी लंबे समय तक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला में क्राइम की पत्रकारिता की है तो मुझे समझने में देर नहीं लगी कि कोई जेड प्लस श्रेणी प्राप्त वीवीआईपी ट्रेन में अगले स्टेशन से बैठने वाला है।

लेकिन दिमाग में आया कि आखिर आज के समय में जहाँ अधिकांश ब्लॉक प्रमुख तक ट्रेन में चलने पर अपनी तौहीन समझते हैं, ऐसे समय में ऐसा कौन वीवीआईपी है जिसे जेड प्लस जैसी उच्च सुरक्षा प्राप्त हो, और वह ट्रेन से जायेगा, वह भी आम लोगों के बीच में। इसे लेकर कई पूर्व सीएम जिन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली है , इनके आने के कयास लगाए ।

लेकिन उनके रौब और रुतबे के सामने नहीं लगा कि वह ट्रेन से जाने वाले होंगे। आखिरकार मैने विचार किया कि क्यों माथा पच्ची की जाए। जो भी वीवीआईपी होंगे, वह कुछ देर में सामने आ ही जायेंगे। फिर मै उस महान विभूति के कोच में आने का इंतजार करने लगा।

ठीक शाम के 4 .57 बजे का समय था। ट्रेन कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर आकर रुकी। क्योंकि मेरी सीट विंडो साइड में थी तो स्टेशन पर कुछ हलचल सी दिखाई थी। मुझे भरोसा हो गया कि शायद आज भौकाली युग में जो वीवीआईपी ट्रेन से हमारे साथ जाने वीवीआईपी हो सकते। और मेरा अंदाजा भी सही निकला।

कुछ पल बाद ही साधारण से मिजाज के एक व्यक्ति जो साधारण खादी का कुर्ता और चप्पल पहने कोच में सवार हुए। एकदम शांत, चाल में कोई रौब और घमंड लेशमात्र नहीं, लेकिन चेहरे पर चमक साफ दिखाई दे रही थी।

मैने पहली नजर में पहचान लिया कि ये आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी हैं। क्योंकि मुझे एक बार सहारनपुर में उनका इंटरव्यू लेने सौभाग्य मिल चुका था।

वह मेरे सामने दूसरी साइड में पड़ने वाली विंडो सीट पर बैठ गए। इस तरह भागवत जी का चेहरा मुझे साफ दिखाई दे रहा था। आसपास की सीटों पर कमांडो बैठ गए।

भागवत जी ने भी आम यात्रियों की तरह ट्रेन में मिलने वाला पानी, नाश्ता और सूप भी लिया। खास बात ये रही कि कमांडो टीम ने भी कोच में कोई पैनिक क्रिएट नहीं किया। ट्रेन कर्मी और यात्री आसानी से आते जाते रहे।

क्योंकि मैं भागवत जी से पहले मिल चुका था तो इच्छा हुई कि ट्रेन में मुलाकात की जाए। लेकिन कमांडो कही रोक न दे, ये आशंका जरूर मन में आ रही थी। क्योंकि पत्रकारिता के कई बार वीवीआईपी के कमांडो से पाला पड़ता रहता है तो सोचा नहीं मिलने देंगे, जब देखा जाएगा।

मै भागवत जी की सीट तक गया और इन्हें प्रणाम किया। लेकिन मैने तो पत्रकारिता की आदत के मुताबिक जुबान से ही उन्हें प्रणाम किया था, लेकिन उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर मुझे नमस्कार किया। फिर सहज भाव से बोले मैने आपको कहीं देखा है।

तब मैने बताया कि सहारनपुर में पदमश्री भारत भूषण जी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आप और महामहिम गवर्नर साहिबा ने भाग लिया था। उस समय मैने आपका इंटरव्यू लिया था। इसके बाद वह मुस्कराये और कहा अब पहचान लिया। फिर उन्होंने घर परिवार की कुशलता के साथ पूछा कि अब कहा पर हो। मैने बता दिया लखनऊ में हूं।

इस दौरान मैने भागवत जी को ये भी बताया कि मैं अलीगढ़ के उस गांव सिंघारपुर का निवासी हूं जहां के केशव धाम में आपने तीन दिन तक प्रवास किया था। इसके बाद तो वह काफी खुश हुए। इसके बाद मै आकर अपनी सीट पर बैठ गया। मेरे बाद एक या दो लोगों ने भी हिम्मत करके उनके जाकर नमस्कार किया।

ट्रेन पर चला पत्थर

इसी बीच फिरोजाबाद की सीमा में शताब्दी दौड़ रही थी। तभी जिस E,-1 में भागवत जी और मै बैठे थे, शीशे पर एक पत्थर लगा। हालांकि पत्थर ट्रेन की राइट साइड की खिड़की पर लगा, जबकि संघ प्रमुख लेफ्ट साइड की विंडो सीट पर थे, इसलिए पूरी तरह सुरक्षित रहे।

उधर पत्थर लगते ही कमांडो हरकत में आ गए और पड़ताल की। अच्छी बात ये रही कि इस दौरान भागवत जी बड़े ही शांत भाव से बैठे रहे। ऐसा कोई कार्य नहीं जिससे यात्री परेशान हों।

भागवत जी ने काफी सहजता और सरलता से यात्रा की। भागवत जी होना आज के समय में कतई आसान नहीं है। साथ ही उनकी सादगी ने भी मुझे काफी प्रभावित किया।

सी पी सिंह (पत्रकार) जी के फेसबुक वॉल से साभार

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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