मध्य प्रदेश में कुपोषण का संकट: मध्य प्रदेश के दतिया जिले से सामने आई एक बच्ची की मौत ने एक बार फिर देश में बच्चों के कुपोषण और पोषण व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह घटना सिर्फ एक परिवार या एक जिले की समस्या नहीं है। देश के कई हिस्सों में आज भी ऐसे बच्चे हैं जिन्हें उम्र के हिसाब से पर्याप्त भोजन, जरूरी पोषक तत्व और समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पातीं।
कुपोषण का मतलब केवल भूखा रहना नहीं है। जब शरीर को बढ़ने और स्वस्थ रहने के लिए जरूरी ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते,
तो कुपोषण की स्थिति बन सकती है। बच्चों में इसे मुख्य रूप से तीन पैमानों से समझा जाता है—स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट।
कुपोषण के तीन बड़े पैमाने क्या हैं?
स्टंटिंग का मतलब है उम्र के हिसाब से बच्चे की लंबाई कम होना। यह लंबे समय तक पोषण की कमी का संकेत माना जाता है।
वेस्टिंग में बच्चे का वजन उसकी लंबाई के मुकाबले कम होता है। यह अक्सर हाल की पोषण कमी या बीमारी से जुड़ा होता है।
वहीं अंडरवेट का मतलब है उम्र के हिसाब से बच्चे का वजन कम होना। एक बच्चे में इनमें से एक या एक से ज्यादा समस्याएं एक साथ हो सकती हैं।
मध्य प्रदेश की तस्वीर क्यों चिंताजनक है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS-6 के 2023-24 के आंकड़े मध्य प्रदेश के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं।
राज्य में पांच साल से कम उम्र के 23.8 प्रतिशत बच्चे वेस्टिंग से प्रभावित हैं। यह राष्ट्रीय औसत 19 प्रतिशत से काफी ज्यादा है और राज्यों में सबसे ऊंचा आंकड़ा है।
अंडरवेट बच्चों की संख्या भी चिंता पैदा करती है। मध्य प्रदेश में 39.7 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। इस मामले में राज्य झारखंड के बाद दूसरे स्थान पर है। झारखंड में यह आंकड़ा 41.1 प्रतिशत है।
हालांकि एक सकारात्मक बदलाव भी सामने आया है। मध्य प्रदेश में स्टंटिंग की दर NFHS-5 के 35.7 प्रतिशत से घटकर NFHS-6 में 31.4 प्रतिशत हुई है।
यानी लंबे समय से चली आ रही पोषण समस्या में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन स्थिति अभी भी गंभीर है।
देश में किस राज्य की स्थिति सबसे खराब?
कुपोषण का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस पैमाने को देख रहे हैं। वेस्टिंग के मामले में मध्य प्रदेश 23.8 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर है।
वहीं अंडरवेट के मामले में झारखंड 41.1 प्रतिशत के साथ सबसे आगे है। झारखंड में वेस्टिंग की दर भी 22.3 प्रतिशत है।
इसलिए किसी एक राज्य को हर तरह के कुपोषण में नंबर वन कहना सही नहीं होगा। अलग-अलग संकेतकों में तस्वीर अलग है।
जिलों में भी हालात बेहद असमान
कुपोषण की समस्या राज्य स्तर के आंकड़ों से भी ज्यादा गंभीर तब दिखाई देती है, जब जिलों की तस्वीर सामने आती है। NFHS-5 के जिला आंकड़ों में उत्तर प्रदेश का चित्रकूट गंभीर स्थिति वाले जिलों में शामिल रहा।
वहां पांच साल से कम उम्र के 47.5 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड, 24.8 प्रतिशत वेस्टेड और 12 प्रतिशत गंभीर रूप से वेस्टेड पाए गए थे।
पुराने जिला आंकड़ों में झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम भी बेहद गंभीर स्थिति में रहा है, जहां स्टंटिंग का स्तर 60 प्रतिशत से ज्यादा दर्ज किया गया था।
गुजरात के डांग और तापी जैसे जिलों में भी वेस्टिंग की समस्या काफी अधिक रही है।
आखिर कुपोषण की वजह क्या है?
कुपोषण की वजह सिर्फ भोजन की कमी नहीं है। गरीबी, परिवार की आर्थिक स्थिति, भोजन में विविधता की कमी,
साफ पानी और स्वच्छता की समस्या, बार-बार होने वाली बीमारियां और मां-बच्चे की पर्याप्त देखभाल न होना इसके पीछे बड़ी वजहें हैं।
छोटे बच्चों के लिए केवल खाना मिलना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही उम्र पर सही मात्रा में और अलग-अलग पोषक तत्वों वाला भोजन चाहिए। NFHS-6 में छह से 23 महीने की उम्र के बच्चों के लिए पर्याप्त आहार पाने वाले बच्चों का अनुपात बढ़ा जरूर है,
लेकिन यह अभी भी बहुत कम है। राष्ट्रीय स्तर पर यह करीब 15.3 प्रतिशत बताया गया है।
आंगनवाड़ी व्यवस्था की भूमिका अहम
आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों और माताओं तक पोषण, स्वास्थ्य जांच और दूसरी जरूरी सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
देश में लाखों आंगनवाड़ी केंद्र हैं, लेकिन कई जगह भवन, कर्मचारियों, संसाधनों और नियमित पोषण आहार से जुड़ी समस्याएं सामने आती रहती हैं।
मध्य प्रदेश में भी पोषण आहार की आपूर्ति और व्यवस्था को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
दूसरी ओर सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि अलग-अलग जिलों में पोषण आहार की आपूर्ति और परिवहन के लिए टेंडर प्रक्रिया भी चलती रही है।
समाधान सिर्फ बजट बढ़ाने से नहीं होगा
कुपोषण से लड़ने के लिए केवल अधिक पैसा खर्च करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि पोषण आहार सही समय पर बच्चों तक पहुंचे,
आंगनवाड़ी केंद्रों में पर्याप्त कर्मचारी हों, बच्चों का नियमित वजन और लंबाई मापी जाए और गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को तुरंत स्वास्थ्य सेवाएं मिलें।
साथ ही गर्भवती महिलाओं की देखभाल, स्तनपान के बारे में सही जानकारी, छह महीने के बाद बच्चों को विविध आहार और साफ पानी-सफाई जैसी बुनियादी चीजों पर भी लगातार काम करना होगा।

