कानपुर आत्महत्या
कानपुर नगर के बर्रा थाना क्षेत्र अंतर्गत बरूण विहार निवासी 23 वर्षीय प्रियांशु श्रीवास्तव ने 23 अप्रैल 2026 को दोपहर लगभग 12 बजे कचहरी परिसर में आत्महत्या कर ली। प्रियांशु के पिता का नाम राजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव है। मृतक ने आत्महत्या से पूर्व एक विस्तृत सुसाइड नोट लिखा।
प्रियांशु ने कानपुर नगर से वर्ष 2025 में विधि स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल प्रयागराज से पंजीकरण प्रक्रिया के बीच ही उनकी जीवनलीला समाप्त हो गई। सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा कि समय की कमी के चलते वे बार काउंसिल से पंजीकरण प्राप्त नहीं कर सके थे।
बचपन से मानसिक प्रताड़ना का आरोप
सुसाइड नोट में प्रियांशु ने लिखा कि करीब पांच से छह वर्ष की उम्र से ही उन्हें मानसिक यातनाएं मिलनी शुरू हो गई थीं। फ्रिज में रखा आम का जूस चुपके से पी लेने पर उन्हें निर्वस्त्र कर घर से बाहर भगा दिया गया था। यह घटना उनके मन पर गहरी चोट छोड़ गई जो जीवन भर बनी रही।

वर्ष 2016 में कक्षा नौ में प्रवेश के समय पिता ने शर्त रखी कि यदि प्रियांशु ने कंप्यूटर विषय नहीं चुना तो उन्हें निर्वस्त्र कर घर से निकाल दिया जाएगा। दबाव में आकर उन्होंने अनिच्छा से कंप्यूटर विषय चुना जिसमें रुचि न होने के कारण नौवीं कक्षा में अपेक्षित अंक नहीं आ सके। घर निर्माण कार्य के चलते चार महीने पढ़ाई प्रभावित रही जिससे हाईस्कूल के परिणाम पर भी असर पड़ा।
मथुरा तक भाग गए थे प्रियांशु
हाईस्कूल परिणाम से पहले पिता ने धमकी दी कि कम अंक आए तो पहले जैसा व्यवहार दोहराया जाएगा। इस भय से प्रियांशु घर छोड़कर ट्रेन से मथुरा स्टेशन तक पहुंच गए थे। बचपन में एक दो रुपये का सिक्का टॉफी के लालच में चुरा लेने की घटना को पिता वर्षों बाद भी हर विवाद में उठाते और मोहल्ले में चिल्लाकर बेइज्जत करते थे।

वर्ष 2018 में इंटर की परीक्षा के दौरान भी घर में निर्माण कार्य के चलते चार महीने की पढ़ाई बर्बाद हुई और अंक साठ प्रतिशत तक सीमित रहे। प्रियांशु मध्यमवर्गीय परिवार से थे और घर पर बोझ न बनने की भावना उनमें शुरू से थी।
खुद कमाया, परिवार का खर्च उठाया, फिर भी अपमान
इंटर के बाद प्रियांशु ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और बाद में ऑनलाइन इंटरनेट वर्क भी शुरू किया। इस आमदनी से उन्होंने अपना मोबाइल, पिता का मोबाइल, बहन का मोबाइल, स्कूटी, घर के दैनिक खर्चे और बिजली बिल तक खुद वहन किए। पिता के कचहरी के कार्य में भी पूरे दिन सहयोग करते थे।
इन सब प्रयासों के बावजूद पिता उन्हें नामर्द, हिजड़ा, अपंग, विकलांग जैसी गालियां देकर मोहल्ले में बेइज्जत करते रहे। सुसाइड नोट में प्रियांशु ने लिखा कि उनका कोई गलत शौक नहीं था, कोई गलत संगत नहीं थी, फिर भी हर छोटे विवाद पर घर और दफ्तर छोड़ने की धमकी दी जाती थी।
हर पल निगरानी और घुटन
प्रियांशु ने लिखा कि हर मिनट पूछा जाता था कहां जा रहे हो, कब आओगे, किसका फोन आया, क्या बात हुई। जरूरत से अधिक जीवन में दखल और लगातार निगरानी से उनका जीवन घुटन भरा हो गया था। उन्होंने नोट में लिखा कि रोज घुट घुट कर मरने से बेहतर है एक दिन मर कर सब खत्म कर लेना।
माता पिता की पचीसवीं वर्षगांठ पर प्रियांशु ने अपनी क्षमता के अनुसार चांदी की अंगूठी उपहार देने की बात घर में बताई थी। इस पर भी पिता ने अपमानजनक टिप्पणी की। यह प्रसंग नोट में दर्ज है।
आत्महत्या की जगह कचहरी परिसर को चुना
प्रियांशु ने लिखा कि वे जानबूझकर कचहरी परिसर में आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि इतनी बंदिशों और बेइज्जती के साथ अब जीना संभव नहीं रहा। नोट के अंत में उन्होंने यह भी निवेदन किया कि उनकी मृत देह को उनके पिता न छुएं, साथ ही यह भी लिखा कि वे पिता के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं चाहते ताकि परिवार बर्बाद न हो।

नोट में लिखा, “मैं हार गया, पापा जीत गए, Congratulations to them” और अंत में मां और बहन के लिए प्रेम व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा “Love you Mammi and Behen.”
सामाजिक चेतना का प्रश्न
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। एक युवक जो कानून की पढ़ाई कर चुका था, जो परिवार का खर्च खुद उठा रहा था, जो पिता के कार्य में सहयोग कर रहा था, वह वर्षों की मानसिक प्रताड़ना और सार्वजनिक अपमान के बोझ तले टूट गया। आसपास कोई नहीं था जो उसकी बात सुनता।
प्रियांशु के सुसाइड नोट में बार बार सामाजिक प्रतिष्ठा और मोहल्ले में इज्जत का जिक्र है। यह उस पीड़ा का प्रमाण है जो सार्वजनिक अपमान से उत्पन्न होती है और भीतर ही भीतर इंसान को खोखला कर देती है। परिवार में संवाद की कमी और समाज की उदासीनता इस त्रासदी के दो बड़े कारण दिखते हैं।

